विश्व असमानता रिपोर्ट, 2026 : एक झलक

/world-inequality-riport-2026-ek-jhalak

अभी हाल ही में विश्व असमानता रिपोर्ट, 2026 प्रकाशित हुई है। इस रिपोर्ट को संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम, विश्व असमानता लैब और यूरोपीय संघ से सहायता प्राप्त एक अनुदान की मदद से तैयार किया गया है। इससे यह पता चलता है कि दुनिया के शासकों को इस बढ़ती भयावह असमानता से जिस बड़े खतरे का, दुनिया के मजदूरों-मेहनतकशों के आने वाले विद्रोहों का, पूर्वानुमान हो रहा है, उससे निपटने के लिए उन्हें कुछ न कुछ कदम उठाने की जरूरत है। हालांकि इस विस्फोटक स्थिति को पैदा करने, बढ़ाने में दुनिया भर के पूंजीवादी शासकों, विशेष तौर पर साम्राज्यवादी शासकों की भूमिका रही है। 
    
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि असमानता वैश्विक अर्थव्यवस्था में लम्बे समय से मौजूद रही है। लेकिन 2025 में यह एक ऐसी मंजिल में पहुंच गयी है कि इस पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। 
    
इसमें बताया गया है कि कमाने वाली वैश्विक आबादी के ऊपरी 10 प्रतिशत लोग बाकी 90 प्रतिशत लोगों की आय से ज्यादा कमाते हैं। सबसे गरीब 50 प्रतिशत आबादी कुल वैश्विक आय के 10 प्रतिशत से कम आय प्राप्त करती है। सम्पदा और भी ज्यादा केन्द्रित है। वैश्विक सम्पत्ति के 75 प्रतिशत का ऊपर की 10 प्रतिशत आबादी मालिक है, जबकि नीचे की 50 प्रतिशत आबादी के पास महज 2 प्रतिशत सम्पत्ति है। 
    
यह तस्वीर और ज्यादा भयावह उस समय दिखाई पड़ती है, जब पता चलता है कि दुनिया भर के 60 हजार से कम लोग, यानी वैश्विक आबादी का 0.001 प्रतिशत लोग, आज दुनिया की आधी आबादी की सम्मिलित सम्पदा से तीन गुना से ज्यादा के मालिक हैं। 
    
इस रिपोर्ट के अनुसार, सम्पदा का यह संक्रेन्द्रण न सिर्फ जारी है, बल्कि यह लगातार बढ़ता जा रहा है। 1990 के दशक से, अरबपतियों और करोड़पतियों की सम्पत्ति सालाना लगभग 8 प्रतिशत की दर से बढ़ी है, जो नीचे की 50 प्रतिशत आबादी की तुलना में लगभग दो गुना दर है।
    
इसका परिणाम एक ऐसी दुनिया है जिसमें आबादी का एक अत्यन्त छोटा हिस्सा अभूतपूर्व वित्तीय संसाधनों पर नियंत्रण रखता है जबकि अरबों लोग बुनियादी आर्थिक स्थायित्व से भी बाहर हो गये हैं। 
    
जलवायु परिवर्तन एक सामूहिक चुनौती है। इस रिपोर्ट के अनुसार, इसका प्रभाव भी असमान है। वैश्विक आबादी के 50 प्रतिशत गरीब लोग निजी पूंजी के मालिकाने के साथ जुड़े सिर्फ 3 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं (और 10 प्रतिशत उत्सर्जन उपभोग से जुड़ने के लिए जिम्मेदार हैं।) जबकि ऊपर की 10 प्रतिशत आबादी निजी पूंजी मालिकाने से जुड़े कार्बन उत्सर्जन के लिए और उपभोग आधारित उत्सर्जन के लिए क्रमशः 77 प्रतिशत और 47 प्रतिशत जिम्मेदार हैं। 
    
इससे भी बढ़कर बात यह है कि जो लोग सबसे कम उत्सर्जन करते हैं, वे ही जलवायु परिवर्तन के आघातों को सर्वाधिक झेलते हैं। विशेष तौर पर कम आमदनी वाले देशों की बड़ी आबादी इसे सबसे ज्यादा झेलती है। जो लोग ज्यादा उत्सर्जन करते हैं वे इससे निपटने के लिए चाक-चौबंद रहते हैं उनके पास ऐसे संसाधन होते हैं कि वे जलवायु परिवर्तन के परिणामों को नजरअंदाज कर सकें। यह असमान जिम्मेदारी जोखिम का असमान वितरण भी होता है। जलवायु असमानता दोनों- पर्यावरणीय और सामाजिक- संकट होती है। 
    
असमानता महज आय, सम्पदा या उत्सर्जन का प्रश्न नहीं है। यह रोजाना के जीवन के ढांचे में भी गुंथा हुआ है। यह पुरुषों और महिलाओं के बीच असमानता में लगातार और व्यापक रूप से दिखाई पड़ता है। 
    
वैश्विक पैमाने पर महिलायें सकल वैश्विक आय का महज चौथाई से थोड़ा ज्यादा प्राप्त करती हैं। यह स्थिति 1990 से लगभग बनी हुयी है। यदि क्षेत्रीय तौर पर देखा जाए तो पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका में महिलाओं का हिस्सा महज 16 प्रतिशत, दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया में 20 प्रतिशत, उप-सहारा अफ्रीका में 28 प्रतिशत और पूर्वी एशिया में 34 प्रतिशत है। यूरोप, उत्तरी अमरीका और ओसीनिया के साथ-साथ रूस और मध्य एशिया में स्थिति थोड़ा बेहतर है।, यहां वे कुल श्रम आय का लगभग 40 प्रतिशत प्राप्त करती हैं।
    
महिलायें पुरुषों से ज्यादा काम करती हैं और कम प्राप्त करती हैं। महिलायें पुरुषों की तुलना में ज्यादा घण्टे काम करती हैं। महिलायें औसतन 53 घण्टे प्रति सप्ताह काम करती हैं जबकि पुरुष औसतन 43 घण्टे प्रति सप्ताह काम करते हैं। महिलाओं के काम को लगातार कम करके आंका जाता है। यदि गैर-भुगतान वाले काम को छोड़ दिया जाये तो महिलायें पुरुषों की प्रति घण्टे आय का महज 60 प्रतिशत कमाती हैं। यदि गैर भुगतान किये गये श्रम को जोड़ दिया जाये तो यह पुरुषों की प्रति घण्टे आय का महज 32 प्रतिशत रह जाता है। ये असमान जिम्मेदारियां महिलाओं के कैरियर के अवसरों को बाधित करती हैं, राजनीतिक हिस्सेदारी को बाधित करती हैं और धन संग्रह को धीमा करती हैं।
    
वैश्विक औसत क्षेत्रों के बीच व्यापक अंतर को छिपा देता है। उत्तरी अमरीका और ओसीनिया में एक औसत व्यक्ति उप-सहारा अफ्रीका के एक औसत व्यक्ति से 13 गुना ज्यादा कमाता है और वैश्विक औसत से तीन गुना अधिक कमाता है। जहां उत्तरी अमरीका और ओसीनिया की औसत दैनिक आय 125 यूरो है, वहीं उप सहारा अफ्रीका की औसत दैनिक आय महज 10 यूरो है। और यह औसत है, प्रत्येक क्षेत्र के भीतर बहुत सारे लोग और भी कम में जीवन-यापन करते हैं। 
    
2025 में उप सहारा अफ्रीका में प्रति बच्चा शिक्षा के मद में खर्च 220 यूरो (क्रय शक्ति समतुल्यता) रहा है जबकि यूरोप में प्रति बच्चा 7430 यूरो और उत्तरी अमरीका व ओसीनिया में 9020 यूरो रहा है। यहां 40 गुने तक का अंतर है। 
    
इसी प्रकार स्वास्थ्य सेवाओं और सुविधाओं में भारी फर्क है। 
    
वैश्विक वित्तीय प्रणाली में असमानता बहुत गहराई से जड़ जमाये हुए है। यह मौजूदा ढांचा ऐसा बना हुआ है जो सिलसिलेवार तरीके से असमानता को बढ़ाता है। वे देश जो रिजर्व मुद्रा जारी करते हैं। वे लगातार कम दरों पर उधार लेते हैं और ज्यादा दरों पर उधार देते हैं और इस प्रकार वैश्विक बचत पर कब्जा करते हैं। इसके विपरीत गरीब देश लगातार कर्जों के बोझ से दबे रहते हैं। और उनकी आय का निरंतर बाहर जाना जारी रहता है।
    
इस तरह यह रिपोर्ट असमानता से जुड़े हुए तथ्यों को पेश करती है और यह सुझाव के तौर पर बताती है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो ऐसे कदम उठाये जा सकते हैं और ढांचागत सुधार किये जा सकते हैं जिससे कि सभी क्षेत्रों में असमानता कम हो सके। 
    
यह रिपोर्ट पूंजीवादी शासकों को ऐसा ही सुझाव देती है कि सरकारें धनी लोगों पर ज्यादा कर लगायें व उसे सार्वजनिक भलाई की मदों में खर्च करें। श्रम अधिकारों को मान्यता दें और ऐसी दुनिया बनायें जहां भेड़िये भी हों और भेड़ भी। भेड़िये को शिकार करने की आजादी हो और भेड़ को बचने के रास्ते बताये जायें।
    
यही इस रिपोर्ट का मूल मंतव्य है, जिसे सबसे पहले कहा जा चुका है। बढ़ती असमानता के चलते जनता के आसन्न विस्फोटों-विद्रोहों को कुछ नीम हकीमी से टालने का प्रयास ही ऐसी रिपोर्ट कर सकती है।        

आलेख

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा। 

/ameriki-iimperialism-ka-trade-war-cause-&-ressult

लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?

/iran-par-mandarate-yuddha-ke-badal

इस तरह पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा बना हुआ है। यह खतरा ईरान के लिए प्रत्यक्ष है और यह दूर की बात नहीं है। इस अमरीकी आक्रमणकारी युद्ध के क्षेत्रीय और वैश्विक आयाम हैं। क्षेत्रीय ताकतों के अपने-अपने आपसी अंतरविरोध हैं

/prashant-bhushan-ka-afsos-and-left-liberal-ka-political-divaliyapan

गत 26 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहली पुण्यतिथि थी। सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने इस अवसर पर एक ट्वीट कि