विविध

शीर्ष अदालत का शीर्षासन

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आजकल सबरीमाला मामले पर भारत के सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्यीय बेंच सुनवाई कर रही है। यह पीठ केरल के तीर्थस्थल में माहवारी वाली महिलाओं के प्रवेश पर उठे विवाद पर इससे संबंधित

ठंडी भट्टियां, सूनी जेबें और पलायन को मजबूर लाखों मजदूर

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अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान पर युद्ध थोपे जाने के बाद गैस-तेल संकट की वजह से औद्योगिक इलाकों में इन दिनों जो खामोशी पसरी है, वह सामान्य मंदी की नहीं, बल्कि गहरे संकट की नि

ये तो होना ही था

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अप्रैल माह में भारत के मजदूरों खासकर औद्योगिक मजदूरों के सब्र का बांध टूट गया। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एन सी आर) के मजदूर हजारों-हजार की संख्या में सड़कों पर उतर आये। श

पतित पूंजीवाद के दौर में शासक वर्ग और जनता

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मजदूर-मेहनतकश जनता की दुनिया भर में हो रही लूट के बंटवारे को लेकर शासकों में टकराव है जो भांति-भांति से प्रकट हो रहा है। यूक्रेन पर रूसी हमला तथा ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमला इसी का परिणाम है। पर स्वयं लूट के मामले में दुनिया भर के पूंजीवादी शासकों की एकता है। लूट के मामले में देशी-विदेशी पूंजी की एकता है जबकि लूूट के बंटवारे को लेकर इनके बीच टकराव है।

होरमुज जलडमरूमध्य - ईरान के हाथ में एक सशक्त हथियार

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एक बात निश्चित है कि इस युद्ध के दौरान ईरान पश्चिम एशिया में एक मजबूत बड़ी शक्ति के बतौर उभरा है। इसके हाथ में होरमुज जलडमरूमध्य का नियंत्रण आना एक बड़ा हथियार है। उसने इस हथियार का बखूबी इस्तेमाल किया है। इसने अमरीकी साम्राज्यवादियों की दादागिरी को चुनौती दी है। और इस चुनौती में होरमुज के हथियारीकरण की अहम भूमिका है। यह आणविक बम से भी अधिक कारगर भूमिका निभा रहा है। 

महिला हितैषी या पाखण्डी

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पिछले दिनों भारत की संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष में महिला हितैषी होने की प्रतियोगिता चली। मौका था महिला आरक्षण बिल व परिसीमन पर चर्चा का। एक चतुर चुनावबाज पर महिलाओं को

विद्युत संविदा कर्मचारियों का सम्मेलन सम्पन्न

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लखनऊ/ उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन निविदा/संविदा कर्मचारी संघ का चतुर्थ द्विवार्षिक सम्मेलन 4-5 अप्रैल 2026 को गांधी भवन प्रेक्षागृह कैसर बाग लखनऊ में आयो

एस आई आर के विरोध में सेमिनार

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क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन द्वारा जलियांवाला बाग हत्याकांड को याद करते हुए 12 अप्रैल को हल्द्वानी, मऊ, हरिद्वार, बरेली में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर सेमिनार आयोजित क

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

/amerika-aur-china-thyuusidaidsa-phaans

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

/cocaroach-janta-party-hindu-fascist-v-sahi-raah

जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

/hindu-fascist-chunav-aayog-and-vidhansabha-chunaav

हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।