बुर्किना फासो का एक लोकप्रिय सैनिक तानाशाह

/burkina-phaso-ka-ek-popular-military-dictator

बुर्किना फासो पश्चिमी अफ्रीका का जमीन से घिरा एक देश है। इसकी सीमा उत्तर पश्चिम में माली, उत्तर पूर्व में नाइजर, दक्षिण-पूर्व में बेनिन, दक्षिण में टोगो और घाना और दक्षिण-पश्चिम में आइवरी कोस्ट से लगती है। यह 1958 तक फ्रांसीसी उपनिवेश था। 1983 में एक सैनिक तख्तापलट के जरिए थामस संकरा सत्ता में आये थे और 1984 में इसका नाम अपर वोल्टा गणराज्य से बदल कर बुर्किना फासो कर दिया था। बुर्किना फासो का मतलब सच्चे लोगों का देश होता है। 
    
बुर्किना फासो में 2022 में एक सैनिक तख्तापलट के जरिए इब्राहीम ट्राओरे सत्ता में आये। इब्राहीम ट्राओरे के पहले 1983 में इसी तरीके से थामस संकरा सत्ता में आये थे। इब्राहीम ट्राओरे अपना आदर्श थामस संकरा को मानते हैं। थामस संकरा 1983 से 1987 तक वहां के राष्ट्रपति थे। अपने राष्ट्रपतित्व काल में थामस संकरा ने बुर्किना फासो की जमीनों का राष्ट्रीयकरण किया था। विदेशी खदान कम्पनियों का राष्ट्रीयकरण करने की कोशिश की थी। यह ज्ञात हो कि बुर्किना फासो में यूरेनियम, और कई अन्य खनिज पदार्थों का भण्डार है। बुर्किना फासो को फ्रांस से आजादी मिलने के बाद भी वहां की अर्थव्यवस्था, राजनीति और मुद्रा में फ्रांस का वर्चस्व रहा है। फ्रांस के साथ-साथ अमरीकी साम्राज्यवादियों की भी बुर्किना फासो में काफी दखलंदाजी रही है।     
    
इब्राहीम ट्राओरे ने सत्ता में आने के बाद सबसे पहले फ्रांसीसी सेनाओं को अपने देश से बाहर करने का फैसला लिया। फ्रांसीसी सेनायें बुर्किना फासो में आतंकवाद से लड़ने के नाम पर तैनात थी। लेकिन दरअसल फ्रांसीसी सेनायें वहां पर फ्रांसीसी प्रभुत्व को बरकरार रखने के लिए थीं। इसके अतिरिक्त विभिन्न इस्लामी आतंकवादी संगठनों को वे प्रश्रय देकर बुर्किना फासो के भीतर लगातार आतंकी हमलों को बढ़ावा देकर उसे विभाजित और कमजोर करती रही हैं। 2022 में इब्राहीम ट्राओरे के सत्तासीन होते समय बुर्किना फासो के 40 प्रतिशत इलाकों में कई अलग-अलग आतंकी संगठन और युद्ध सरदार कब्जा किये हुए थे और देश लगातार गृहयुद्ध की सी जैसी स्थिति में था। इब्राहीम ट्राओरे ने जैसे ही फ्रांसीसी सेनाओं को देश से बाहर करने का फैसला लिया, वैसे ही फ्रांसीसी साम्राज्यवादी और अमरीकी साम्राज्यवादी इब्राहीम ट्राओरे की हुकूमत को हटाने की साजिश में सक्रिय हो गये। कई बार इब्राहीम ट्राओरे की हत्या कराने की साजिश रची गयी और तख्तापलट कराने की कोशिशें तो अभी तक लगातार जारी हैं। चूंकि फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों का लम्बे समय से वहां वर्चस्व रहा है, इसलिए बुर्किना फासो की राज्यसत्ता में और समाज के ऊपरी सम्पन्न तबकों के बीच फ्रांसीसी समर्थक लोगों की कमी नहीं है। यह वह सामाजिक आधार है जो बुर्किना फासो में इब्राहीम ट्राओरे की सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए काम कर रहा है। 
    
इसके अतिरिक्त, बुर्किना फासो में यूरेनियम और अन्य खनिज सम्पदा के भण्डार हैं। इनका दोहन फ्रांसीसी, अमरीकी, कनाडाई और आस्ट्रेलियाई बहुराष्ट्रीय कम्पनियां करती रही हैं। इस दोहन से जहां बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अरबों-खरबों डॉलर की सम्पदा यहां से लूट कर ले जाती हैं, वहीं बुर्किना फासो की मजदूर-मेहनतकश आबादी भयावह गरीबी और कंगाली में जीवन बसर करने को अभिशप्त रही है। 
    
इब्राहीम ट्राओरे ने जमीन के नीचे पायी जाने वाली सम्पदा के हकदार बुर्किना फासो के निवासी हैं, विदेशी नहीं का आह्वान करते हुए सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बुर्किना फासो की सरकार के साथ नये समझौते करने के लिए बाध्य कर दिया। इससे इन खदान कम्पनियों में बुर्किना फासो की सरकार की हिस्सेदारी बढ़ी और सरकार को मिलने वाले राजस्व में बढ़ोत्तरी हुई। इसके पहले खनन से बुर्किना फासो की सरकार के कई लोगों तथा चंद धनपतियों का फायदा होता था। जन साधारण के लिए इससे कुछ नहीं मिलता था। 
    
ट्राओरे के इन कदमों से जहां साम्राज्यवादी बौखला गये वहीं साम्राज्यवादियों के सामने घुटने टेकने वाले अफ्रीकी राज्यों के शासक भी परेशान हो गये। लेकिन समूचे अफ्रीकी देशों के नौजवानों और न्यायप्रिय लोगों की निगाह में इब्राहीम ट्राओरे एक नायक के रूप में स्थापित होने लगे। उनकी यह तस्वीर साम्राज्यवाद विरोधी के रूप में आने से एक साहसी अफ्रीकी नेता के रूप में वे स्थापित होने लगे। 
    
अपने तीन वर्ष के शासन काल में इब्राहीम ट्राओरे ने कृषि में सुधार किये। कृषि का यंत्रीकरण किया। इससे कृषि की उत्पादकता बढ़ी। भुखमरी के देश से वह आत्मनिर्भर देश की ओर आगे बढ़ा। ट्राओरे ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक की कर्जों की शर्तों को धता बताकर उसे ठुकरा दिया। 
    
उसने शिक्षा के क्षेत्र में और सड़क, परिवहन, भारी व हल्के वाहनों के निर्माण, जल की सुविधा देने के काम में बुर्किना फासो में चमत्कार सा पैदा किया। इन सब कारणों से वे बुर्किना फासो की अवाम में एक लोकप्रिय शासक के बतौर स्थापित हो गये। 
    
जब ट्राओरे सैनिक तख्तापलट के जरिए सत्ता में आये थे, उस समय इनको अफ्रीकी संघ और इकोवस से बाहर कर दिया गया था। क्यांकि अफ्रीकी संघ के नियमों के अनुसार असंवैधानिक रास्तों से सत्तासीन होने वालों को वह सरकार की मान्यता नहीं देता है। इसके पहले माली में तख्तापलट के जरिए सत्ता आयी थी और इसके एक साल बाद नाइजर में भी तख्तापलट के जरिए सत्ता स्थापित हुई थी। ये तीनों देश फ्रांसीसी उपनिवेश रह चुके थे और तख्तापलट के पहले इन सभी देशों में फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों का वर्चस्व था। तख्तापलट के बाद इन तीनों देशों ने फ्रांसीसी सेनाओं को अपने-अपने देशों से निकाल बाहर करने का फैसला किया। इन तीनों देशों ने यह भी फैसला किया कि वे अपने यहां चल रही फ्रांसीसी मुद्रा फ्रांक को हटा देंगे और उसके स्थान पर अपनी मुद्रायें कायम करेंगे। 
    
पश्चिमी साम्राज्यवादियों और अफ्रीकी संघ के देशों ने इन सैनिक तख्तापलटों की निंदा की। साम्राज्यवादी प्रचारतंत्र ने बुर्किना फासो के विरुद्ध व्यापक प्रचार अभियान चलाया। लेकिन जितना अधिक वे इब्राहीम ट्राओरे के विरुद्ध प्रचार अभियान चला रहे हैं, उनकी लोकप्रियता उतनी ही अधिक जनता के बीच बढ़ती जा रही है। 
    
सबसे सनसनीखेज घटना उस समय सामने आयी जब इब्राहीम ट्राओरे ने ट्रम्प के प्रथम राष्ट्रपतित्व काल में ट्रम्प द्वारा बुर्किना फासो में काम कर रही बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को वहां पर काम करने के एवज में लाखों डालर की रकम वसूलने का पर्दाफाश किया था। ट्रम्प ने इस पर्दाफाश से पहले ट्राओरे को धमकी दी थी। इस पर मुकदमा चला। और अमरीकी कोर्ट के सामने वीडियो कानफ्रेंसिंग के जरिए ट्राओरे ने वे तमाम सबूत पेश किये जो ट्रम्प को दोषी साबित करते थे। इस मुकदमे के दौरान न सिर्फ बुर्किना फासो में न सिर्फ अफ्रीकी देशों में बल्कि अमरीका सहित समूचे लैटिन अमरीकी देशों में लोग ट्राओरे के पक्ष में और अमरीकी साम्राज्यवाद के विरोध में जगह-जगह प्रदर्शन करने लगे। इससे अमरीकी साम्राज्यवाद की दुनिया भर में किरकिरी हुई। 
    
जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि बुर्किना फासो के 40 प्रतिशत हिस्से पर विभिन्न आतंकवादी समूहों का कब्जा रहा है। और वे लगातार लोगों की हत्यायें करते रहे हैं और बुर्किना फासो की सेना तथा इन आतंकवादी समूहों के बीच खूनी संघर्ष होते रहे हैं। ट्राओरे ने सत्ता में आने के बाद इन आतंकवादी समूहों से बात की और इनमें कुछ के साथ युद्ध विराम लागू करके उन इलाकों में शिक्षा, अस्पताल और तबाह-बर्बाद हुए घरों को ठीक कराने का काम शुरू किया। इससे एक हद तक आतंकवाद कमजोर पड़ा और कई आतंकवादी समूह के लोग पुनः अपनी जिंदगी में वापस आये तथा उनको खेती-बारी करने में ट्राओरे की सरकार ने मदद की।
    
ये कुछ ऐसे कदम थे जो तीन वर्षों के भीतर ही बुर्किना फासो को पूंजीवादी दायरे में सकारात्मक तौर पर आगे बढ़ाने की ओर ले गये।
    
इब्राहीम ट्राओरे यह जानते हैं कि वे दुनिया के सबसे ताकतवर और सबसे खूंखार पश्चिमी साम्राज्यवादियों का सामना कर रहे हैं। न सिर्फ बुर्किना फासो बल्कि समूचे अफ्रीका के अपमान को समाप्त करने में और अफ्रीकी स्वाभिमान को स्थापित करने में उनकी यह भूमिका है। वे अपनी इस भूमिका को तब तक आगे नहीं बढ़ा सकते थे जब तक इस साम्राज्यवादी-पूंजीवादी विश्व में इन साम्राज्यवादियों के विरुद्ध उनकी लड़ाई में अन्य साम्राज्यवादी ताकतें उनके साथ नहीं खड़ी होतीं। उनकी इस लड़ाई में रूसी और चीनी साम्राज्यवादी उनके साथ खड़े हो रहे हैं। रूसी और चीनी साम्राज्यवादी अमरीकी और यूरोपीय साम्राज्यवादियों को दुनियाभर में चुनौती देने के लिए मौजूद हैं। वे अपने स्वार्थों के चलते बुर्किना फासो, माली और नाइजर में अमरीकी और फ्रांसीसी प्रभुत्व को खत्म करने में योगदान कर रहे हैं। फ्रांसीसी सेना को हटाकर माली और नाइजर में रूस की वैगनर निजी सेना वहां आ गयी है। सोने की खदानों के ठेके रूस को मिल रहे हैं। चीनी बेल्ट और रोड परियोजना के तहत साहेल क्षेत्र में (इसमें माली, बुर्किना फासो और नाइजर समेत कई देश आते हैं) पश्चिम से पूर्व के देशों को जोड़ने वाली रेल लाइन का निर्माण कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त इन देशों में कई अवरचनागत उद्योगों को खड़ा करने में चीनी साम्राज्यवादी अपना जाल फैला रहे हैं। दरअसल बुर्किना फासो का मौजूदा सैन्य नेतृत्व रूसी-चीनी साम्राज्यवादियों के साथ निकटता का इस्तेमाल पश्चिमी साम्राज्यवादियों से निपटने में कर रहे हैं। हालांकि यह निकटता उन्हें एक मगरमच्छ से मुक्त हो दूसरे मगरमच्छ का शिकार बनने की ओर ले जा सकती है। रूसी-चीनी साम्राज्यवादियों से ट्राओरे की निकटता आज जगजाहिर है। ट्राओरे देश के मीडिया को नियंत्रित कर सरकार के खिलाफ पश्चिम साम्राज्यवादियों के दुष्प्रचार को रोकने के साथ अपनी सरकार की हर आलोचना को भी रोक रहे हैं। मीडिया ट्राओरे के कुछ सुधारवादी कदमों को बढ़ा चढ़ा कर पेश कर उनकी नायक छवि गढ़ रहा है। चुनाव कराने के वायदे को ट्राओरे टाले जा रहे हैं। 
    
मौजूदा समय में बुर्किना फासो में इब्राहीम ट्राओरे की सैनिक सत्ता सकारात्मक भूमिका निभाता लग रहा है और इसे बुर्किना फासो की मजदूर-मेहनतकश आबादी का समर्थन भी काफी हद तक प्राप्त है। इसी को ध्यान में रखकर या इसका फायदा उठाकर ट्राओरे ने अपनी सैनिक सत्ता को जारी रखने का फैसला लिया है और चुनावों को बेकार घोषित कर दिया है। 
    
लेकिन बुर्किना फासो साम्राज्यवादी-पूंजीवादी दुनिया का हिस्सा है। बुर्किना फासो में भी पूंजीवाद ही मजबूत हो रहा है। वहां भी पूंजीवादी समाज के सारे अंतरविरोध क्रमशः तीव्र से तीव्रतर होते जायेंगे। यह किसी की इच्छा की बात नहीं है। यह पूंजीवादी समाज का बुनियादी चरित्र है। बुर्किना फासो की मजदूर-मेहनतकश आबादी का वहां के पूंजीपति वर्ग और अंतर्राष्ट्रीय पूंजी के साथ बुनियादी टकराव तीव्र से तीव्रतर होना ही है। 
    
इसलिए इब्राहीम ट्राओरे या कोई भी सत्ता जब तक पूंजीवाद की सेवा करेगी उसे देर-सबेर मजदूर-मेहनतकश आबादी के आने वाले संघर्षों का सामना करना पड़ेगा। ट्राओरे के कदम कुछ लोकलुभावन सुधारों के साथ देश के पूंजीपति वर्ग के एक हिस्से की ही सेवा करते हैं। साथ ही तानाशाही के रूप में जनता के जनवादी अधिकार भी छीन लेते हैं। 
    
आज के नायक इब्राहीम ट्राओरे पूंजीवाद के पक्ष में खड़े होने के चलते कल के खलनायक बनने को अभिशप्त होंगे और बुर्किना फासो की जनता उन्हें वैसे ही अपना दुश्मन मानेगी जैसे आज के फ्रांसीसी और अमरीकी साम्राज्यवादियों को मानती है। ट्राओरे और रूसी-चीनी साम्राज्यवादियों के प्रति जनता की गफलत जल्द ही दूर होगी। 

आलेख

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

/amerika-aur-china-thyuusidaidsa-phaans

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

/cocaroach-janta-party-hindu-fascist-v-sahi-raah

जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

/hindu-fascist-chunav-aayog-and-vidhansabha-chunaav

हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।