आशीष नंदी देश के जाने-माने समाजशास्त्री रहे हैं। वे कोई माक्र्सवादी या वामपंथी समाजशास्त्री नहीं हैं। वे उस तरह के समाजशास्त्री हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपनी बातों से वह बौद्धिक माहौल तैयार किया जिससे बौद्धिक जगत में हिन्दू फासीवादी विचारों को जगह मिली।
इन्हीं आशीष नंदी ने 1998 में नरेन्द्र मोदी से एक साक्षात्कार के बाद उन्हें ‘कापीबुक फासिस्ट’ कहा था यानी एक ऐसा फासीवादी जिसमें किताबों में गिनाए गये फासीवादी के सारे लक्षण मौजूद हों। गौरतलब है कि तब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री भी नहीं थे, देश के प्रधानमंत्री की तो बात ही क्या?
नरेन्द्र मोदी के ‘कापीबुक फासिस्ट’ के इस चरित्र के कारण ही 2002 के गुजरात दंगों के बाद उन पर यूरोप व अमेरिका में प्रवेश पर प्रतिबंध लग गया था हालांकि तब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे। तब सभी लोगों का मानना था कि इन दंगों में मुसलमानों के नरसंहार में या तो मोदी का सीधा हाथ था या फिर उन्होंने इसे होने दिया था। हिन्दू साम्प्रदायिकों में इसी से उनकी ‘हिन्दू हृदय सम्राट’ की छवि बननी शुरू हुयी थी।
लेकिन इस छवि से तब देश के बड़े पूंजीपति बहुत खुश नहीं थे। उन्हें खुश करने के लिए मोदी ने मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश की दौलत उन पर लुटानी शुरू की। वैसे भी मोदी हमेशा से ही बड़े पूंजीपतियों के मुरीद रहे हैं। अपने ऊपर दौलत न्यौछावर होता देख बड़े पूंजीपतियों का रुख बदलने लगा। ‘नैनो’ कार वाले रतन टाटा को जब सिंगूर से खदेड़ा गया तब मोदी ने उन्हें गुजरात में सारी सहूलियतों के साथ शरण दी। परिणामस्वरूप टाटा मोदी के गुण गाने लगे। वे उनमें प्रधानमंत्री के तत्व देखने लगे। ये वही टाटा थे जिन्होंने 2002 दंगों के समय गुजरात में सेना तैनात करने की वकालत की थी। समय के साथ अनिल अंबानी और अन्य बड़े पूंजीपतियों ने उनके सुर में सुर मिलाया। 2011-12 तक देश का बड़ा पूंजीपति वर्ग उन्हें दिल्ली की गद्दी पर बैठाने का तय कर चुका था। उसके मुंह से लार टपक रही थी कि प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी उस पर क्या कुछ नहीं लुटा देंगे।
इसके बाद मोदी की छवि चमकाने का अभियान चल पड़ा। मोदी ने स्वयं अपने सरकारी तंत्र का इस्तेमाल कर यह किया तो बड़े पूंजीपतियों ने अपने प्रचारतंत्र से। बड़ी-बड़ी विदेशी ‘पी आर’ कंपनियों को इसके लिए अरबों रुपये देकर काम पर लगाया गया। इस सबका परिणाम यह हुआ कि 1998 का ‘कापीबुक फासिस्ट’ और 2002 का दंगाई व्यक्ति देश का विकास पुरुष हो गया। उसका ‘गुजरात माडल’ देश का आदर्श बन गया।
यह सब हवा-हवाई था जो देश के बड़े पूंजीपति वर्ग के पैसे व प्रचारतंत्र से तथा मोदी के ‘पी आर’ अभियान से गढ़ा गया था। पर इससे मोदी की जो छवि चमकी उससे वे दिल्ली की गद्दी पर आसीन हो गये। इसमें कांग्रेस के दस साल के कुशासन तथा इसके खिलाफ ‘अन्ना आंदोलन’ का भी खासा हाथ था।
तब से लेकर अब तक मोदी की इस हवा-हवाई छवि को बनाये रखने के लिए हर संभव प्रयास किये गये हैं। इसके लिए केन्द्र सरकार के खजाने से दसियों हजार करोड़ रुपये लुटाये गये हैं। इसके अलावा बड़े पूंजीपतियों के प्रचारतंत्र ने एक स्वर से मोदी का दिन-रात गुणगान किया है। मोदी की ‘पी आर’ कंपनियां विशाल पैमाने पर सक्रिय हैं और इसके लिए बड़े पूंजीपति खूब पैसा दे रहे हैं।
पर अब यह सब नाकामयाब होने लगा है। मजदूर-मेहनतकश जनता की दिनों-दिन बदहाल होती जाती जिन्दगी लोगों को अपने अनुभव से इस गढ़ी गयी नकली छवि की असलियत को समझने की ओर ले जा रही है। इसमें एक गुणात्मक छलांग जुलाई में छात्र-युवा आंदोलन के दौरान लगी। करोड़ों युवाओं ने मोदी को जमकर कोसा और उनका मजाक उड़ाया। खुद को ‘नान-बायोलाजिकल’ कहने वाले मोदी युवाओं के सामने घुटने टेकने को मजबूर हो गये।
छात्र-युवा आंदोलन से मोदी की जो छवि तार-तार हुई उससे मोदी एण्ड कंपनी घबरा गये हैं। उन्हें अपनी नैया डूबती नजर आ रही है। इसीलिए वे इस छवि पर फिर से रंग-रोगन करने का उद्यम कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने मोदी के जन्मदिन पर पूरे एक महीने का व्यापक कार्यक्रम बनाया है। वे उम्मीद कर रहे हैं वे एक बार फिर मजदूर-मेहनतकश जनता को, खासकर छात्र-युवा को बेवकूफ बनाने में कामयाब होंगे।
इच्छाएं यदि घोड़े होते तो उन पर चढ़कर कहीं भी जाया जा सकता था। पर ऐसा होता नहीं। इसीलिए मोदी एण्ड कंपनी की ख्वाहिशें पूरी नहीं होने वालीं। उनकी नकली छवि में जो दरारें पड़ी हैं वे दिनों-दिन चैड़ी होती जायेंगी। वे अधिकाधिक अपने वास्तविक रूप में आते जायेंगे- एक ‘कापीबुक फासिस्ट’ जो बड़े पूंजीपतियों का ‘प्रधान सेवक’ और ‘चैकीदार’ है तथा टाटा-बिड़ला, अंबानी-अडाणी का घर-दफ्तर ही जिसका ‘सेवा तीर्थ’ है।