हिटलर के वारिस

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ऐसा लगता है कि भाजपा के नेताओं को हिरासत शिविरों से ‘अति प्रेम’ है। कभी असम का मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा हिरासत शिविरों की  बात करता है तो कभी मुख्यमंत्री आदित्यनाथ। ऐसा अल्पसंख्यकों को डराने-धमकाने के लिए किया जाता है। औपचारिक तौर पर प्रधानमंत्री देश में किसी भी किस्म के हिरासत शिविरों की मौजूदगी से इंकार करते रहे हैं। हालांकि उनके दावों के विपरीत देश में कुछ राज्यों विशेषकर असम में हिरासत शिविर मौजूद हैं।
    
अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों को लक्षित कर भाजपा नेताओं के द्वारा ऐसे बयान दिये जाते हैं। ऐसे बयानों से एक ओर अल्पसंख्यकों में डर और तनाव पैदा होता है कि कहीं उन्हें विदेशी घोषित करके ऐसे शिविरों में न धकेल दिया जाये तो दूसरी ओर भाजपा नेता ऐसा प्रचार करके बहुसंख्यक आबादी के एक हिस्से (साम्प्रदायिक) को तुष्ट करने का खेल खेलते हैं। 
    
अभी हाल ही में दिल्ली विस्फोट के बाद उ.प्र. के मुख्यमंत्री ने जिलाधिकारियों को हर जिले में हिरासत शिविरों को बनाने का आदेश दिया। इसके साथ ही अपने आदेश में जिलाधिकारियों को अपने जिले में अवैध घुसपैठियों की पहचान करने को कहा है। 
    
इसमें यह अंतर्निहित है कि अवैध घुसपैठिये केवल मुसलमान ही होंगे अतः मुसलमानों में से घुसपैठियों को चिन्हित करके उन्हें हिरासत शिविरों में डाला जाये। रोहिंग्याओं व बांग्लादेशियों के नाम पर इस तरह के पहचान अभियान मुसलमान केन्द्रित ही होते हैं। देश के मुसलमानों को ऐसे अभियानों के तहत बार-बार अपमानित और प्रताड़ित किया जाता है। इन मुसलमानों में भी आमतौर पर वे ज्यादा परेशान किये जाते हैं जो मेहनतकश हैं। 
    
स्पष्ट है कि कोई यूरोपियन या अमेरिकी महाद्वीपीय देशों का नागरिक तो अवैध रूप से अमूमन रहेगा नहीं और अगर इन देशों का कोई नागरिक अवैध रूप से रह भी रहा होगा तो इन देशों के नागरिकों को हिरासत शिविरों में डालने की इन फासीवादियों में हिम्मत नहीं है। सो, ज्यादातर मामलों में तथाकथित घुसपैठिये पड़ोसी मुल्कों के बाशिंदे ही होंगे जो मेहनत मजदूरी की तलाश में सीमापार आये होंगे। कई बार सस्ते श्रम की खातिर इन लोगों को घुसने भी दिया जाता है। ऐसे मामले ज्यादातर सीमावर्ती क्षेत्रों में होते हैं। कई दफा सीमायें सुपरिभाषित न होने पर भी ऐसा हो जाता है और नागरिक एक-दूसरे की सीमाओं का उल्लंघन कर जाते हैं। नेपाल व भूटान जैसे पड़ोसी देशों के नागरिकों के लिए वैसे भी भारत आने के लिए बीजा अनिवार्य नहीं है। चीनी नागरिकों के मामले में भारत सरकार वही रुख रखने को मजबूर होगी जो यूरोपीय या अमरीकी नागरिकों के मामले में। सो ले देकर बांग्लादेश, बर्मा, पाकिस्तान व अफगानिस्तान ही रह जाते हैं। जहां तीन मुस्लिम बाहुल्य देश हैं तो बर्मा से रोहिंग्याओं को खदेड़ा गया है। 
    
यही परिस्थिति इन फासीवादियों के लिए अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने में मदद करती है। आमतौर पर बाहर से भारत आने वालों में तीन देशों के नागरिक ज्यादा हैं- बांग्लादेशी, रोहिंग्याओं के रूप में बर्मा और नेपाली। बस फर्क इतना है कि इनमें से दो अवैध हैं और तीसरे के नागरिक वैध। गरीबी के कारण अगर नेपाली नागरिकों पर भी वीजा शर्त जारी हो तो उनकी स्थिति बांग्लादेशियों से शायद अलग न होगी। और तब स्थितियां इन संघियों और भाजपाइयों के लिए इतनी मुफीद न होती। हिरासत शिविरों की बात इन भाजपाइयों की जुबान पर बार-बार इसलिए आती है क्योंकि देश के मुसलमानों के संदर्भ में वे ऐसा ही सोचते हैं। जाहिर है वे अपने असली रूप में धीरे-धीरे आ रहे हैं। समाज का साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण होने पर वे धीरे-धीरे यातना और संहार शिविरों की भी बातें करेंगे। संघी दुनिया में हिटलर के सच्चे वारिसों में से एक हैं। 
    
हालांकि देश के मुसलमानों के लिए उत्तर प्रदेश, असम जैसे राज्य पहले ही हिरासत शिविरों की तरह ही हैं। जहां आम मुसलमानों से कानूनेत्तर व्यवहार हो रहा है। सामान्य जनवादी मांगों को उठाने भर से ही उनके घरों, दुकानों या अन्य परिसम्पत्तियों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। सामान्य व शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर भी गोलियां व लाठियां चला दी जा रही हैं। इन राज्यों में मुसलमानों पर राज्य की हिंसा का न खत्म होने वाला तांडव चल रहा है। 
    
केवल इन राज्यों की सत्ता ही मुसलमानों के प्रति कानूनेत्तर व्यवहार नहीं कर रही है। नाजी दस्तों के समान संघी दस्ते भी मुसलमानों के साथ इन राज्यों में सुपर राज्य की तरह व्यवहार कर रहे हैं। ये संघी दस्ते मुसलमानों के विरुद्ध कहीं भी शारीरिक हिंसा और यहां तक कि हत्या (अखलाक आदि) भी कर देते हैं और राज्य इन हत्यारों (अखलाक के हत्यारों से मुकदमे वापस लेने की बातें हो रही हैं) से मुकदमों की वापसी की कवायद में लगा है। राज्य से स्वतंत्र और राज्य रक्षण इन संघी दस्तों की आपराधिक कार्यवाहियों ने एक मुस्लिम नागरिक के नागरिक अधिकारों को कब का समाप्तप्राय कर दिया है। 
    
देश के नागरिकों को इन हिरासत शिविरों को और सरकारों की कानूनेत्तर कार्यवाहियों का जवाब देने की जरूरत है। नहीं तो भले ही आज यह सब अवैध घुसपैठ के बहाने किया जा रहा हो, मुसलमानों को केन्द्रित रख कर किया जा रहा हो परन्तु हिटलर के वारिस इसे देश की गैर मुस्लिम मेहनतकश अवाम के विरुद्ध भी लागू करने से नहीं हिचकिचायेंगे। 

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