मकरूह

Published
Sun, 08/16/2026 - 15:50
/makarooh

‘‘गत्ते बिछा लो खाना खा लेते हैं।’’ राम मोहन ने साथ में काम कर रहे लड़कों को संबोधित करते हुए कहा। रात के नौ बज चुके हैं। सभी लड़के लेथ मशीन में अपने-अपने काम पर लगे हुए हैं। राम मोहन इन लड़कों का टीम लीडर है और फस्र्ट स्टैप कटिंग मशीन आपरेटर है। 
    
गत्ते बिछाए गये। पानी लाया गया। आठ लड़के अपने-अपने घर से लाया हुआ टिफिन खोलकर बैठ गये हैं। ‘‘कल से नया वी.पी. आ रहा है। सुना है बड़ा स्ट्रिक्ट है।’’ मुन्ना ने बात शुरू की। सुनने में आया है कि नया कंपोनेंट आने वाला है जो सीधे बिना लेथ हुए ही जाएगा। सिर्फ विजुअल चैक होगा।’’ महेश ने बात आगे बढ़ाई।
    
राम मोहन- ‘‘नया वी.पी. पैसे बढ़ाने में अच्छा है। काम अच्छा करोेगे तो इंक्रीमेंट भी अच्छा करता है। ऐसा सुनने में आ रहा है। आगे देखो।
    
रात का खाना खत्म हुआ। सारे मजदूर अपनी-अपनी मशीन में काम पर लग गए हैं।
    
छह फुट का लम्बा-चैड़ा शरीर, बड़ी-बड़ी आंखें, चार-पांच देशों में काम का अनुभव, नया वी.पी. हरियाणा से है जो अपने साथ 25 किलो के पीस का आर्डर लाया है। उम्र करीब 65 वर्ष के आस-पास होगी। तीन लाख रुपये मासिक वेतन के साथ कमीशन अलग से तय हुआ है। 
    
‘‘तेरा क्या नाम है लम्बू’’ वी.पी. ने सामने खड़े राम मोहन से प्रश्न किया। ‘‘सर राम मोहन’’ जवाब आया। 
    
चेहरे पर चापलूसी के भाव को अनुभवी चेहरे ने भांप लिया। ‘‘मैं चाहता हूं तू आगे बढ़े। एक  नई कंपनी से डील हुई है तेरी जिम्मेदारी रहेगी डिस्पैच की। अब से तू बस दिन में आया करना। बता कर पाएगा।’’
    
‘‘सर बस आपका हाथ ऊपर रहना चाहिए। बाकी तो मैं देख लूंगा।’’ उसी चापलूसी भरे अंदाज में राम मोहन ने जवाब दिया। 
    
‘‘अपनी टीम तैयार कर ले और कोई दिक्कत हो तो सीधे मेरे पास आना अब जा।’’ पांव छूकर राम मोहन ने विदा ली। 
    
दो लोग लगातार एक के बाद एक कम्पोनेंट को ग्राइण्डर से घिसकर आगे बढ़ाते और राम मोहन एक-एक पीस उठाकर नीचे लाइन लगाता जाता। एक हेल्पर लगातार पीस लाकर देता जाता। 

‘‘तुम्हे वी.पी. साहब बुला रहे हैं।’’ गार्ड ने आकर राम मोहन को सूचना दी। राम मोहन वी.पी. के आफिस में पहुंच चुका है। 

वी.पी.- कितने पीस हो गये।

राम मोहन- साहब 80 पीस हो जायेंगे 8 बजे तक।

वी.पी.- मुझे 100 पीस चाहिए। पार्टी को बोल दिया है मैंने। बात खराब नहीं होनी चाहिए। 

राम मोहन- साहब 10 बजे तक हो पाएंगे। फिर 8 बजे तक तो मेरे 12 घण्टे पूरे हो जाते हैं। एक्स्ट्रा 2 घण्टे अलाऊ करवाने होंगे। 

वी.पी.- उसके लिए मैं बैठा तो हूं तू बस आर्डर पूरा कर।

राम मोहन- चेहरे पर चापलूसी वाली हंसी। सर हमारे बारे में तो 
कुछ सोचा नहीं आपने। 

वी.पी.- चेहरे पर कुटिलता, पांच सौ रुपये पकड़वाता है। जा ऐश कर, बाकी टेंशन मत ले। मैं हूं न जा डिस्पैच पूरी कर।
    
राम मोहन वापस काम पर आ चुका है। ‘‘आज 10 बजे तक कोई नहीं जाएगा। खाने की पर्ची बन गयी है और दो घण्टे का एकस्ट्रा ओवर टाइम भी मिलेगा।’’ राम मोहन आदेश के लहजे में बाकी टीम के मजदूरों को सूचित करता है। विरोध के कुछ मद्धिम स्वर उठे जो राम मोहन की दबंगई भरी तेज आवाज में दब कर रह गए।
    
नए वी.पी. ने चार साल इस कंपनी में बिताए। राम मोहन ने जिस डिस्पैच से शुरूआत 80 पीस से की थी वह अब 150 से ऊपर पहुंच चुकी थी। महीने में 30 दिन लगातार 12 से 14 कभी-कभी 16 घण्टे ड्यूटी। 5000 रु. अतिरिक्त तरक्की ठेकेदारों से कमीशन, कंपनी की पर्ची पर चाय-नाश्ता, मैनेजमेंट से नजदीकी। राम मोहन अब एक आम मजदूर न था जैसा हुआ करता था। जी हुजूरी, चापलूसी, चमचागिरी अब उसके चरित्र का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। 
    
वी.पी. के जाने के साथ पुराना सुपरवाइजर भी जा चुका है जिसकी जगह नया सुपरवाइजर आ चुका है।

नया सुपरवाइजर- राम मोहन एक कोने में उसे समझा रहा है। तुम मेरे साथ रहना। तुम मेरे साथ रहना, मैं नया हूं।

राम मोहन- सर आप टेंशन क्यूं लेते हो मैं हूं न! देखता हूं कौन मना करता है किसी काम को। एक आदमी से चार-चार काम लेंगे। तुम मेरे ऊपर छोड़ दो। मैं बताता रहूंगा तुम्हें किससे कैसे काम लेना है। राम मोहन ने बात खत्म की। 
    
दिन बीते महेश 25 साल का हृष्ट-पुष्ट नौजवान है। शाम होने को है भीषण गर्मी शरीर से पसीना सूखने नहीं देती। चार अलग-अलग जगह काम निपटा चुका। ‘‘अरे महेश ये काम छोड़ इस खाली बिन को भर दे माल बनाना है।’’ कहता हुआ सुपरवाइजर जाकर राम मोहन के पास बैठ गया।
    
‘‘तुम किसके कहने पर चल रहे हो सब जानता हूं।’’ महेश की तेज आवाज सुपरवाइजर और राम मोहन के कान पर पड़ी। 
    
‘‘क्या बोल रहा है बे?’’ राम मोहन की तेज आवाज 
    
‘‘क्या मैंने तेरा नाम लिया’’ क्रोध से भरा आवेग 

राम मोहन- आगे बढ़कर साले यहीं मारूंगा।

महेश- लाल आंखें, क्रोध से भरा चेहरा, तेरी औकात है तो हाथ लगा। अगर यहीं तुझे तेरी औकात न बता दी तो मैं भी अपने बाप की औलाद नहीं।
    
मक्कार लोमड़ी किसी कमजोर को अपना निवाला बना सकती है मगर जली हुयी मशाल से टकराने का अंजाम वह जानती है। घटना बीते महज आधा घंटा ही हुआ था। ‘‘अरे यार तू तो नाराज हो गया।’’ ‘‘तू सिर्फ नफरत के लायक है। तेरी हंसी मकरूह हंसी है’’। कहता हुआ महेश आगे बढ़ गया।                 -पथिक 

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