बहन! जिस दिन से तुमने भैंस खरीदी है तब से हमारा दूध का खर्चा बच गया है। कुछ कृतज्ञता के साथ तुलसी ने कहा। जिस पर सुमन केवल मुस्कुरा दी। बीते कई साल से सुबह-सुबह दूध का लोटा हर रोज यूं ही तुलसी के घर पहुंचता आया है लेकिन सुमन के मन के भीतर एहसान जैसे किसी विचार ने एक भी दिन दस्तक न दी थी। घर में बनने वाली सब्जी बाकी खाने पीने का आदान-प्रदान वर्षों से इन पड़ोसियों के व्यवहार का हिस्सा रहा है।
आज दिन भर क्या रहा? पंखा झलते हुए सुमन ने पति रामनाथ से प्रश्न किया। ज्यादा आदमी फैक्टरी के बाहर हड़ताल में बैठ गए हैं। जवाब! पड़ोस के क्या हाल हैं? सुना है परकुसुवा (प्रकाश लाल) अन्दर नौकरी कर रहे हैं। सुमन के प्रश्नों में जिज्ञासा, संदेह, तिरस्कार बहुत से भाव हैं। हां! वो अंदर ही काम करेंगे। जिसकी जैसी मर्जी। कोई जबरदस्ती हड़ताल में किसी को थोड़े ही ला सकता है। पानी का गिलास उठाते हुए रामनाथ ने जवाब दिया।
दुगलवा, कुछ हिकारत से सुमन ने कहा। ऐसा क्यों कहती हो? किसी की क्या मजबूरी है कौन जानता है। क्या मालूम घर की कोई परेशानी या नौकरी जाने का डर, कौन जाने क्या सही बात है। रामनाथ ने प्रतिवाद किया। क्यूं तुम्हारा और बाकी लोगों का परिवार, बच्चे नहीं हैं? सुमन ने प्रत्युत्तर में कहा। बिना कोई उत्तर दिए रामनाथ हाथ धोने बाहर चले जाते हैं।
‘‘पैसा तो ठीक-ठाक ही मिल गया सभी को’’। हड़ताल खत्म होने के बाद 10-12 मजदूर रामनाथ के घर पर इकठ्ठे हुए हैं। हां, लेकिन सब को नौकरी पर रख लेता तो ज्यादा बेहतर था। रामनाथ की बात पर सबने हामी भरी। संघर्ष के गीतों के बीच चलने वाले जीत का जश्न देर रात तक चला। और बीच-बीच में दोगला, गद्दार, डरपोक ये शब्द भी उठते रहे। सुमन इन इशारों का संकेत जानती है।
अब आगे क्या करोगे? नाश्ता करते समय सुमन ने प्रश्न किया। बंबई में एक बड़ी कंपनी में बात हो गई है। अगले हफ्ते बुलाया है। बेरोजगार रामनाथ ने जवाब दिया। ‘‘तुम्हारी शुगर की बीमारी, ब्लड प्रेशर, खाने पीने का ध्यान, ये सब कैसे होगा? चिंता गहरे लगाव से पूछे गए प्रश्न का रामनाथ के पास जवाब न था मगर खामोशी में सर को धीरे से हिलाया मानो कह रहे हों, चिंता मत करो सब ठीक हो जाएगा।
कुछ दिन बाद रामनाथ बाम्बे प्रस्थान कर जाते हैं। तनख्वाह अच्छी थी तो माली हालत में कोई परेशानी नहीं आई।
‘‘आज दूध निकालने में भैंस दिक्कत कर रही है’’। दूध का लोटा तुलसी को पकड़ाते हुए सुमन ने कहा। कोई नहीं बहन! तुलसी ने जवाब स्वरूप कहा। रामू के बाबा सुबह दुकान गए थे, आते-आते पैकेट वाला दूध ले आए थे।
इससे पहले कई बार देरी होने पर तुलसी पूरे अधिकार भाव से आवाज लगाती थी। परस्पर अपनत्व और मैत्री ने उसे ये अधिकार दिया था। लेकिन हड़ताल अपनी गति में बहुत से आत्मसंचित अधिकारों को भी बहा ले गई। मनोभावों के इन बदलाव का कारण दोनों के लिए अपरिचित नहीं था।
रामनाथ को बाम्बे काम करते हुए एक दशक बीत चुका है। इससे पहले दो बार हृदयाघात के बाद तीसरा आघात जीवन का अंतिम आघात साबित हुआ। सोमवार की रात आए हृदयाघात की सूचना मंगलवार को हजार किलोमीटर दूर पहुंची।
प्रचंड आघात ने एक झटके में परिवार की खुशियों को छीन लिया। आंसुओं का दौर तो कुछ महीनों में थम गया लेकिन वियोग की पीड़ा को ताउम्र साथ रहना था। अब परिवार के संरक्षक की नई जिम्मेदारी सुमन के ऊपर थी।
आज पड़ोस में घमासान छिड़ा हुआ है। दोनों तरफ से तर्कों-कुतर्कों की बाढ़ आई हुई है। प्रकाश लाल वहीं मौजूद हैं और कुछ धीरे-धीरे फुसफुसा रहे हैं। समझ से परे है कि वो पत्नी के पक्ष में हैं या विपक्ष में। तुलसी के व्यंग्यों में आज जो तीव्रता है, जो लड़ाकू तेवर हैं वो एकदम नए हैं। तुलसी के इस नए रूप से सुमन हतप्रभ है। असहायता ने अंततः आंसुओं का रूप ले लिया लेकिन वो तुलसी के ऊपर बेअसर था।
नियति कब क्या रूप ले ले कोई नहीं जानता। ‘‘बहन लो रचित की नौकरी लग गई है’’ कहते हुए सुमन ने मिठाई का डिब्बा तुलसी को देते हुए कहा। ‘बधाई हो’ के कथन के साथ एक मंद मुस्कान सुमन के चेहरे पर भी आ गई। सुमन आज खुश है और शायद इसलिए भी खुशी ने ज्यादा आकार ग्रहण किया हुआ है क्योंकि रचित की नौकरी पिता वाली फैक्टरी में लगी है। और कि रचित की पोस्ट प्रकाश लाल से ऊपर है।
लेकिन काम के दौरान रचित खुद को प्रकाश लाल के सामने नवागंतुक के रूप में ही प्रस्तुत करता और प्रकाश लाल का व्यवहार भी रचित के प्रति पुत्र सदृश सहयोग का ही रहता। पुरानी स्मृतियां परस्पर विलुप्त होने की तरफ अग्रसर हो रही हैं।
प्रकाश लाल को किसी ने कभी ज्यादा बोलते हुए नहीं सुना। यूं लगता मानो एकांतवासी है। समाज से कटे हुए प्रकाश अपने परिवार तक ही सीमित रहे। और अब 60 साल के हो चुके हैं। आज उनका विदाई समारोह है। हर मजदूर कुछ न कुछ तोहफा लाया है।
‘‘अंकल हाथ आगे करो’’। ये रचित की आवाज है। कलाई घड़ी धीरे-धीरे हाथों में बांधी जा रही है। प्रत्यक्ष घटनाक्रम को हृदय में उठने वाला संवेदन महसूस करता है जिसकी अभिव्यक्ति आंखों के किनारे से शुरू होती हुई जलधारा का रूप ले लेती है। रुंधे हुए गले से सिर्फ इतने ही शब्द निकले ‘‘आज तेरे पापा होते तो वो घड़ी पहनाते’’ देखते-देखते रचित की आंखें नम हैं।
विदाई समारोह अभी चल रहा है, जिसमें शामिल होने के लिए रामनाथ की बड़ी बेटी मौजूद है। फूल माला लेकर खड़ी बड़ी बेटी की आंखों से अश्रु धारा फूट पड़ती है और साथ में शुरू होता है बूढ़े अंकल का फूट फूटकर रोना। बूढ़े प्रकाश लाल जो आज तक खुल कर बोले नहीं थे आज निश्छल बाल हृदय की मानिंद बन चुके हैं।
ये कौन है जो इतने वर्षों से मन में गहरी पीड़ा दबा के बैठा था। ऐसी वेदना जो उमड़ उठने को व्याकुल है। ये कौन सा लम्हा, कौन सा प्रदर्शन है जिसमें सच्चाई है, पवित्रता है। जिसके आगे किसी तर्क या सफाई की जरूरत नहीं महसूस हो रही है। या फिर शायद ये वो सच्ची अनुभूति है जो इंसानियत की सच्ची धरोहर है, जिसके आत्मसात होते ही मन के सब मैल धुल जाते हैं।
सारे पड़ोस के खाना की जिम्मेदारी आज सुमन की देख-रेख में है। आज वर्षों बाद सुमन को किसी ने नाचते हुए देखा है। देवर-भाभी को साथ में नाचते हुए लम्हे को रचित हमेशा के लिए कैद कर देना चाहता है। और इन सब के बीच तुलसी बैठकर खुशी से ताली बजा रही है और उसके हाथ बीच-बीच में आंखों तक पहुंच जाते हैं। इन दो पड़ोस में रहने वाले इंसानों की नम आंखों के मर्म को शब्दों में बयां करना कठिन है। -पथिक