अमरीकी साम्राज्यवादी ज्यादा आक्रामकता के साथ देशों पर हमले कर रहे हैं। उन्नीसवीं सदी का मोनरो सिद्धांत इक्कीसवीं सदी के डोनरो उपसिद्धान्त के साथ लागू किया जा रहा है। मोनरो सिद्धांत के मुताबिक लातिन अमरीका अमरीकी साम्राज्यवादियों का विशेष प्रभाव क्षेत्र रहा है। ट्रम्प ने उसे सिर्फ पुनर्जीवित ही नहीं किया है, बल्कि उसका विस्तार किया है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो और उनकी पत्नी का अपहरण करके उन्हें अमरीकी डिटेन्शन सेण्टर में हथकड़ी और बेड़ियों से जकड़कर ले जाया गया। उनके ऊपर आरोप है कि वे ड्रग तस्करी के कार्टेल के मुखिया और आतंकवाद को प्रश्रय देने वाले हैं। वेनेजुएला पर इस अचानक हमले में राष्ट्रपति के अंगरक्षकों सहित 80 से ज्यादा लोग मारे गये हैं। अब ट्रम्प बहुत ही बेशर्मी के साथ कह रहे हैं कि वेनेजुएला के तेल पर कब्जा करना उनका मकसद रहा है। इसके पहले वे कैरेबियन सागर में वेनेजुएला की नौकाओं पर हमला करके 100 से अधिक लोगों की हत्या कर चुके हैं। वेनेजुएला से रूस का झण्डा लगे जहाज पर अमरीकी साम्राज्यवादियों ने कब्जा कर लिया है। हद तो यह हो गयी है कि अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने आप को वेनेजुएला का कार्यवाहक राष्ट्रपति घोषित कर दिया है। अब वे क्यूबा, कोलम्बिया और मैक्सिको को धमकी दे रहे हैं। क्यूबा की सरकार को उन्होंने चेतावनी दी है कि वे समय रहते अमरीकी साम्राज्यवादियों के सामने आत्मसमर्पण करके उनकी शर्तें मान लें। अन्यथा नतीजा भुगतने के लिए तैयार हो जायें। इसी प्रकार, उन्होंने कोलम्बिया के राष्ट्रपति को धमकी दी है कि वे अमरीकी साम्राज्यवादियों के हितों के विपरीत काम करना बंद करें नहीं तो उनका अंजाम और बुरा होगा। मैक्सिको पर हमला करने की बातें वे पहले से ही कर रहे थे।
ऐसा नहीं है कि अमरीकी साम्राज्यवादी लातिन अमरीकी देशों और अन्य स्थानों पर सैनिक तख्तापलट कराकर या अन्य तरीकों से अपनी पिट्ठू सरकारें नहीं बनाते रहे हैं। वे उन्नीसवीं सदी से लेकर अभी तक यह काम लगातार करते रहे हैं। इन देशों के धनी लोगों का और सेना व नौकरशाही में उच्च पदों पर मौजूद लोगों का एक हिस्सा इनके पिट्ठुओं की तरह काम करता रहा है। लेकिन इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में एक सम्प्रभु देश के राष्ट्रपति का अपहरण करके ले जाना और खुद को उस देश का कार्यवाहक राष्ट्रपति घोषित करना एक हद दर्जे का मनमानापन है। यह सभी अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का सीधा उल्लंघन है। वैसे अमरीकी साम्राज्यवादी अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और संस्थाओं की पहले भी कोई परवाह नहीं करते थे। लेकिन वे अभी तक अपने हमलों के लिए कोई न कोई उचित लगने वाला बहाना बनाते थे। कभी मानव अधिकारों के हनन, जनतंत्र की स्थापना के लिए, अल्पसंख्यकों का दमन व नरसंहार व व्यापक विनाश के हथियार रखने का बहाना बनाते थे। जबकि असली कारण कुछ और ही होते थे। लेकिन ट्रम्प को किसी बहाने की जरूरत नहीं पड़ी। वे खुलेआम घोषित कर रहे हैं कि वेनजुएला के तेल और खनिज सम्पदा पर वे अपना अधिकार कायम कर रहे हैं।
ट्रम्प ने अपने राष्ट्रपति पद के चुनाव प्रचार के दौरान अमरीकी बड़ी तेल कम्पनियों से वायदा किया था कि वे वेनेजुएला के तेल भण्डार पर उनका नियंत्रण फिर से कायम कर देंगे। ट्रम्प के चुनाव प्रचार में इन बड़ी तेल कम्पनियों ने भारी धन चंदे के रूप में दिया था। वेनेजुएला में ह्यूगो चावेज ने इन कम्पनियों की नियंत्रणकारी स्थिति को समाप्त करके राज्य के मालिकाने की कम्पनी बना दी थी। अब ये तेल कम्पनियां राष्ट्रीयकरण किये जाने के बाद अपने नुकसान के हरजाने की मांग करेंगी। सबसे बढ़कर तो अब वेनेजुएला के तेल भण्डार पर इनका कब्जा होगा।
लेकिन ये इजारेदार तेल कम्पनियां ऐसा दिखावा कर रही हैं कि वेनेजुएला के तेल उद्योग का तानाबाना बहुत पिछड़ा हुआ है और इसे आधुनिक बनाने के लिए कम से कम 100 अरब डालर का खर्च करना पड़ेगा। इतने बड़े पैमाने पर खर्च करना लाभकारी नहीं होगा। उनके इन दावों में कोई सच्चाई नहीं है। ये एकाधिकारी तेल कम्पनियां वस्तुतः ट्रम्प प्रशासन के इन अप्रत्याशित और अवैध कदमों से दूरी बना कर अपने को पेश कर रही हैं। लेकिन असली फायदा इन्हीं एकाधिकारी तेल कम्पनियों को होना है और वे अपने इस फायदे को पूरा हासिल करने की जी-तोड़ कोशिश कर रही हैं।
अमरीकी साम्राज्यवादियों के वेनेजुएला के राष्ट्रपति के अपहरण और खुद को कार्यवाहक राष्ट्रपति घोषित करने के कदमों से दुनियाभर में एक खलबली सी मच गयी है। कई देशों के शासक सोचने लगे हैं कि कहीं उनका नम्बर तो नहीं आ रहा है। दूसरी तरफ, रूसी और चीनी साम्राज्यवादी जुबानी तौर पर वेनेजुएला के पक्ष में खड़े हैं और वेनेजुएला से अमरीकी साम्राज्यवादियों के बाहर जाने की मांग कर रहे हैं व उसके राष्ट्रपति और उनकी पत्नी की रिहाई की मांग कर रहे हैं। इसी प्रकार क्यूबा, कोलम्बिया सहित कई लातिन अमरीकी देश वेनेजुएला पर अमरीकी कार्रवाई की निंदा कर रहे हैं। वेनेजुएला के अंदर अमरीकी कार्रवाई के विरोध में बड़े-बड़े प्रदर्शन आयोजित हुए हैं। खुद अमरीकी साम्राज्यवादियों के यहां मजदूर-मेहनतकश आबादी के विरोध प्रदर्शन कई शहरों में आयोजित हुए हैं जहां मांग की गयी है कि अमरीकी साम्राज्यवादी वेनेजुएला से बाहर जाओ। रूसी साम्राज्यवादियों का वेनेजुएला की मौजूदा सत्ता के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है और वे वेनेजुएला के साथ एकजुटता दिखा रहे हैं। इसी के साथ ही चीनी साम्राज्यवादियों का वेनेजुएला में बड़ा पूंजी निवेश है। यह लातिन अमरीका में अमरीकी और चीनी व रूसी साम्राज्यवादियों के बीच एक टकराव की ओर ले जा सकता है। इस समय रूसी और चीनी साम्राज्यवादी उचित मौके व जगह की तलाश में हैं। वे ब्रिक्स और अन्य क्षेत्रीय संगठनों की मदद से अमरीकी साम्राज्यवादियों की घेरेबंदी करने की कोशिश कर रहे हैं।
ट्रम्प के नेतृत्व में अमरीकी साम्राज्यवादी इतने भर से नहीं रुक रहे हैं। ट्रम्प बार-बार घोषणा कर चुके हैं कि ग्रीनलैण्ड पर अमरीका अपना अधिकार कर लेगा। ग्रीनलैण्ड आर्कटिक सागर में स्थित क्षेत्र है जो डेनमार्क का हिस्सा माना जाता है। यह डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है। अमरीकी साम्राज्यवादी घोषणा कर चुके हैं कि ग्रीनलैण्ड अमरीकी सुरक्षा के लिए आवश्यक है। पहले वे इसे खरीदने की बात कर रहे थे, अब उस पर कब्जा करने की घोषणा कर रहे हैं। यह ध्यान में रखने की बात है कि डेनमार्क नाटो का सदस्य देश है। नाटो के अन्य देश अमरीकी साम्राज्यवादियों के समक्ष सैनिक टकराव करने की क्षमता नहीं रखते। इसलिए वे उनके सामने गिड़गिड़ा रहे हैं और साथ ही ग्रीनलैण्ड में नाटो सैनिकों की तैनाती की बात कर रहे हैं। अमरीकी साम्राज्यवादियों की निगाह ग्रीनलैण्ड के तेल और गैस भण्डार तथा दुर्लभ मृदा (रेयर अर्थ) जैसे खनिजों पर है। अमरीकी साम्राज्यवादी रूसी और चीनी साम्राज्यवादियों द्वारा इन खनिजों पर संभावित कब्जे को रोकने की बात करते हैं और आर्कटिक सागर के नौपरिवहन रास्ते पर रुकावट डालने के लिए अमरीकी साम्राज्यवादी यूरोपीय साम्राज्यवादियों को भय दिखाकर उनका समर्थन चाहते हैं। लेकिन ग्रीनलैण्ड पर नाटो के यूरोपीय देश कमोबेश तौर पर डेनमार्क के साथ खड़े हैं लेकिन ट्रम्प को इसकी कोई परवाह नहीं है। वे जानते हैं कि यूरोपीय नाटो के देश फौजी तौर पर उनका सामना नहीं कर सकते। वे ग्रीनलैण्ड के मसले पर अमरीकी साम्राज्यवादियों के सामने गिड़गिड़ाते और बिलखते हैं। लेकिन उनका जोर यूक्रेन के मसले पर रूसी साम्राज्यवादियों के विरुद्ध अमरीकी साम्राज्यवादियों की सक्रिय हिस्सेदारी कराने पर है। वे रूस के विरुद्ध जंग में यूक्रेन की हर तरह की मदद की घोषणा करते रहे हैं और अभी हाल ही में हुए पेरिस शिखर सम्मेलन में उन्होंने अमरीकी युद्धमंत्री पीटर हेगसेथ से रूस के विरुद्ध यूक्रेन की मदद करने की गुहार लगाई। लेकिन पीटर हेगसेथ ने कोई वायदा नहीं किया। इस मामले में अमरीकी साम्राज्यवादी यूक्रेन की हारी हुई जंग में उलझने से बचने की कोशिश कर रहे हैं और वे रूसी साम्राज्यवादियों के साथ किसी न किसी समझौते पर इस तरह पहुंचना चाहते हैं जिससे रूसी और चीनी साम्राज्यवादियों के बीच दरार पैदा कर सकें। लेकिन ऐसा लगता है कि विश्व के शक्ति संतुलन में दोनों साम्राज्यवादियों- रूसी और चीनी- के हित एक साथ रहने में हैं। इसलिए ट्रम्प कभी पुतिन को धमकी देते हैं और कभी मान-मनौवल की कोशिश करते हैं। ग्रीनलैण्ड पर कब्जे के कदम से जहां एक ओर अमरीकी साम्राज्यवादियों और यूरोपीय साम्राज्यवादियों के बीच सम्बन्धों में खटास आ सकती है वहीं लम्बे समय में यह कब्जा अमरीकी और चीनी व रूसी साम्राज्यवादियों के बीच आर्कटिक महासागर के नौपरिवहन को लेकर एक बड़ी टकराहट का कारण बन सकता है।
संघर्ष और टकराहट का एक नया देश ईरान है। अमरीकी साम्राज्यवादी व यहूदी नस्लवादी इजरायली हुकूमत ईरान पर नये हमले की तैयारी कर रहे हैं। पश्चिम एशिया में ईरान की इस्लामी हुकूमत अमरीकी साम्राज्यवादियों और इजरायली शासकों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द रही है और अभी भी है। इस समय ईरान की इस्लामी हुकूमत के विरुद्ध व्यापारियों व छात्रों-नौजवानों का गुस्सा एक बार फिर से भड़क उठा है। महंगाई की मार और बेरोजगारी ने ईरानी मजदूरों-मेहनतकशों का जीना दुश्वार कर रखा है। लोगों में बेचैनी है। आक्रोश है। यह आक्रोश बार-बार मुल्लाओं की भ्रष्ट नौकरशाही के विरुद्ध व्यक्त होता रहा है। इस बार भी यह गुस्सा उस समय भड़क उठा जब ईरानी मुद्रा का अवमूल्यन कर दिया गया। छात्र-नौजवान और व्यापारी अपना विरोध-प्रदर्शन तकरीबन ईरान के सभी शहरों में करने लगे। इसका फायदा अमरीकी साम्राज्यवादियों और इजरायली हुकूमत ने उठाने की कोशिश की। ट्रम्प ने घोषणा की कि यदि ईरानी हुकूमत लोगों के आंदोलन को बलपूर्वक कुचलेगी तो अमरीका चुप नहीं बैठेगा बल्कि वह ईरान पर हमला करेगा। इसी प्रकार इजरायली हुकूमत ने भी ईरानी जनता के आंदोलन का समर्थन किया और ईरानी हुकूमत को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया। ईरानी हुकूमत का कहना है कि वे लोगों की जायज मांगों के आंदोलन का समर्थन करते हैं और वे इन्हें यथासंभव हल करने की कोशिश करेंगे। लेकिन अमरीकी साम्राज्यवादियों की संस्था सीआईए और इजरायली गुप्तचर संस्था मोसाद के एजेण्ट ईरान में उथल-पुथल व असंतोष को भड़काकर हिंसक रूप दे रहे हैं, इसे ईरानी हुकूमत बर्दाश्त नहीं करेगी। इन हिंसात्मक कार्यवाहियों में सैकड़ों लोग मारे गये हैं और कई हजार गिरफ्तार किये गये हैं। ईरानी हुकूमत का दावा है कि उसने मोसाद के नेटवर्क के सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया है।
अमरीकी और इजरायली हमले की तात्कालिक संभावना के मद्देनजर ईरानी हुकूमत ने ईराकी सीमा पर सेना के साथ-साथ वायु रक्षा प्रणाली तैनात कर दी है। रूस से हथियारों की खेप ईरान आ रही है। इसमें सिकंदर मिसाइलें भी हैं। ईरान के साथ रूसी, चीनी और उत्तर कोरिया की हुकूमत सीधे तौर पर खड़ी हैं। ईरान की हुकूमत ने यह भी कहा है कि यदि ईरान पर अमरीकी-इजरायली हमला होता है तो पश्चिम एशिया में मौजूद अमरीकी सैन्य ठिकानों पर ईरान सीधे हमला करेगा। ईरान की नौसेना होरमुज पर चौकसी कर रही है। वह कैस्पियन सागर से अदन की खाड़ी के रास्ते को खुला रखने के लिए रूस के साथ तालमेल कर रही है। यदि अमरीकी साम्राज्यवादी अजरबैजान की तरफ से हवाई हमला करते हैं तो ईरानी वायु रक्षा प्रणाली उत्तरी सीमा में तैनात है। ट्रम्प ने ईरान पर हमले की धमकी दी है, और अब एक-एक दिन गिने जा रहे हैं कि कब हमला होगा। इसी हमले के मद्देनजर रूसी-चीनी-उत्तर कोरियाई और ईरान का एक मजबूत गठबंधन सामने दिखाई पड़ रहा है। इस गठबंधन की ताकत और ईरान की जमीनी तैयारी को देखकर हो सकता है कि अमरीकी साम्राज्यवादी फिलहाल हमला करने की हिम्मत न करें। ईरान की हुकूमत ने यह भी दावा किया है कि वह 24 घण्टे में परमाणु बम बना सकता है। ईरान के इस दावे के बाद इजरायल में भय व्याप्त हो गया है और अमरीकी साम्राज्यवादी भी हमला करने से पहले सोचने के लिए बाध्य होंगे।
पश्चिम एशिया में टकराव का एक नया अखाड़ा यमन में खुल गया है। यहां एक समय के सहयोगी साऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात एक-दूसरे के विरुद्ध यमन के दक्षिणी-पूर्वी हिस्से में टकराव में हैं। संयुक्त अरब अमीरात के समर्थन से दक्षिणी संक्रमणकालीन परिषद नामक संस्था यमन के कुछ उन इलाकों पर कब्जा कर रही थी जिन इलाकों में यमन की कानूनी लेकिन नदारद सरकार का कब्जा था। यमन की कानूनी सरकार का समर्थन साऊदी अरब कर रहा है। इससे दोनों ताकतवर देशों के बीच टकराव की स्थिति हो गयी है। साऊदी अरब ने दक्षिणी संक्रमणकालीन परिषद के सदस्यों पर हवाई हमला किया और उन्हें पीछे धकेल दिया। संयुक्त अरब अमीरात द्वारा भेजे गये हथियारों को नष्ट कर दिया। संक्रमणकालीन परिषद के नेता को भागकर संयुक्त अरब अमीरात में शरण लेनी पड़़ी। यहां यह ज्ञात हो कि संयुक्त अरब अमीरात इजरायल के साथ अब्राहम समझौते से बंधा हुआ है, जबकि साऊदी अरब के इजरायल के साथ सामान्य सम्बन्ध अभी तक नहीं हैं। साऊदी अरब इस क्षेत्र का सबसे बड़ा और धनी देश है। वह पश्चिम एशिया में अपना वर्चस्व चाहता है। संयुक्त अरब अमीरात भी धनी देश है, लेकिन वह आकार और जनसंख्या में छोटा है। संयुक्त अरब अमीरात व्यापार परिवहन के रास्ते के बंदरगाहों पर अपना निवेश कर रहा है। इन दोनों देशों की टकराहट प्रभाव क्षेत्रों पर वर्चस्व के लिए अदन की खाड़ी, लाल सागर से लेकर अफ्रीकी देशों तक व्याप्त है।
हालांकि इन दोनों देशों पर अमरीकी साम्राज्यवादियों का प्रभाव है, फिर भी साऊदी अरब के ईरान के साथ लम्बे समय की टकराहट के बाद सामान्य सम्बन्ध बहाल हुए हैं। यदि साऊदी अरब और ईरान की एकता और ज्यादा मजबूत होती है तो इससे इस क्षेत्र में अमरीकी साम्राज्यवादियों का प्रभाव और कमजोर होगा। इस क्षेत्र में चीनी साम्राज्यवादियों का व्यापक निवेश मौजूद है। इसलिए अमरीकी साम्राज्यवादियों को आर्थिक-व्यापारिक क्षेत्र में चीनी साम्राज्यवादियों से बड़ी चुनौती मिल रही है।
अमरीकी नेता ट्रम्प बार-बार यह दावा कर रहे हैं कि उन्होंने कई युद्धों को रुकवाने का काम किया है। वे शांति के लिए काम करने वाले राष्ट्रपति के बतौर अपने को घोषित करते रहते हैं। लेकिन इस शांति के मसीहा का दावा करने वाले राष्ट्रपति ने दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की ओर धकेलने का काम किया है। यह संप्रभु देशों पर कब्जा कर रहा है। इसकी धमकियों में प्रतिबंध, आर्थिक नाकेबंदी से लेकर सैनिक नाकेबंदी और हमले सभी शामिल हैं।
ट्रम्प प्रतिस्पर्धी साम्राज्यवादी देशों की बढ़ती हुई ताकत से घबड़ा गया है। उसके ये आक्रामक तेवर इसकी बढ़ी हुयी ताकत के नहीं बल्कि विश्वव्यापी पैमाने पर तुलनात्मक रूप से गिरती हुई ताकत की पहचान है। यह शांति का नोबेल पुरुस्कार पाने का लालची राष्ट्रपति अपने प्रतिरक्षा बजट को 15 खरब डालर तक करने की योजना बना रहा है जो इस समय के 10 खरब डालर से डेढ़ गुना है। अमेरिका के बाद सबसे ज्यादा प्रतिरक्षा बजट वाले 25 देशों का संयुक्त बजट भी इतना नहीं है।
यह है इस शांति के मसीहा की असलियत। यह शांति का नहीं आक्रामक युद्धों का, अनैतिक और गैर कानूनी युद्धों को छेड़ने वाला शैतान है। इसने और इसके जैसे लोगों ने दुनिया को विनाश की ओर धकेलने का काम किया है।