युवा मजदूर

Published
Sat, 05/16/2026 - 15:50
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घर से निकलते ही रुंधे गले से
मां ने पीछे से आवाज दी थी
रुक जा, मत जा मेरे लाल
शहर में कौन रखेगा तेरा खयाल,
क्या खायेगा? क्या पियेगा?
तुझे कुछ भी बनाना नहीं आता
कैसे रहेगा? कैसे जियेगा?
बाप ने भी आंसुओं को रोकते हुए
सिर पर हाथ रखकर पुचकारा था
गले लगाकर पीठ पर हाथ फेरते हुए दुलारा था
कंधे पर हाथ रखकर धीरे से कहा था
एक बार फिर सोच ले मेरे बेटे
जितना पैदा हो जाता है उसी में जी लेंगे
रुखी सूखी खाकर ठंडा पानी पी लेंगे।

उदास मन से शहर की ओर चल पड़ा था
क्योंकि दिल में कुछ सपने थे
जो वाकई मेरे अपने थे
शहर जाकर दर दर भटका
तब जाकर कहीं काम मिला
बारह-बारह घंटे खटकर भी
मेहनत का नहीं दाम मिला
मेरे जैसे कितने ही मजदूर
दिन-रात मशीन चलाते हैं
पेट काटकर किसी तरह बस
जीवन की नाव चलाते हैं
बूढ़े मां-बाप की चिंता में खोया है
कोई बहन की शादी की फिक्र में डूबा है
हंसी ठिठोली भूल गए सब
चेहरा पतझड़ सा सूखा है।

वेतन बढ़ाने की बात करना भी
आजकल साजिश करना कहलाता है
मालिक, प्रशासन से मिलकर मजदूरों को पिटवाता है
झूठे आरोप लगाकर जेलों में डलवाता है
निर्मम शोषण है, क्रूर दमन है
फासीवाद का दौर है
वो डरे हुए हैं मजदूरों से
ये बात भी काबिलेगौर है

जब मेहनताना मांगना भी गुनाह बन जाता है
जब काम के घंटों की सीमा हद पार कर जाय
जब रोज कुआं खोदना और पानी पीना
जिंदगी की जरूरी शर्त बन जाय
तब रास्ता ही क्या बचता है?
संघर्ष के सिवाय।।         -भारत सिंह

आलेख

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