अमेरिकी साम्राज्यवाद व उसके पिट्ठू इजराइल का पुतला दहन

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फरीदाबाद/ 17 जून 2025 को लखानी चौक पर इंकलाबी मजदूर केंद्र द्वारा अमेरिका व इजरायल के युद्ध परस्त गठजोड़ द्वारा ईरान पर हमले के खिलाफ उनका पुतला दहन किया गया।
    
इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि इजरायल द्वारा अमेरिका की सरपरस्ती में पिछले सालों में लगातार फिलिस्तीन व गाजा पट्टी में मजदूरों-मेहनतकशों व महिलाओं-दुध मुंहे बच्चों का नरसंहार व आम जनता का कत्लेआम किया गया है। अब वह यही कत्लेआम ईरान पर युद्ध थोप कर कर रहा है।
    
यह युद्ध न सिर्फ पश्चिम एशिया बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले हैं। गरीब देशों के शासक भी इसका बोझ अपनी-अपनी देश की मजदूर मेहनतकश जनता के ऊपर लाद रहे हैं। 
    
भारत व दुनिया के तमाम मजदूरों-मेहनतकशों को न सिर्फ इन युद्धों का विरोध करना चाहिए बल्कि इनके खिलाफ सशक्त संघर्ष भी खड़ा करने का प्रयास करना चाहिए। और अपने-अपने देशों में उनकी सरकारों के द्वारा मजदूर मेहनतकशों के ऊपर संकटों के बोझ को लादे जाने के खिलाफ भी आवाज उठानी चाहिए।
    
मऊ (यूपी) में कलेक्ट्रेट आफिस पर 17 जून को इजरायल द्वारा किए जा रहे फिलिस्तीनियों के नरसंहार के विरोध में साझा प्रदर्शन किया गया व राष्ट्रपति को संबोधित ज्ञापन सिटी मजिस्ट्रेट को सौंपा गया। इस प्रदर्शन में इंकलाबी मजदूर केंद्र व क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन ने भागीदारी की।         
            -विशेष संवाददाता
 

आलेख

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

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गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।