एक सजायाफ्ता लंपट ने समूची दुनिया को बर्बादी के मुहाने पर ला खड़ा किया है। उसने ईरान के खिलाफ जो हमला बोला है वह ब्लैकहोल बनकर समूची दुनिया को अपने में खींच सकता है। यह अपराधी, यह लंपट जो बडबड़ा रहा है वह बेमतलब हो सकता है पर उसका परिणाम भीषण है।
पर इस सजायाफ्ता लंपट ने पूरी मानवता की एक बड़ी सेवा भी की है। उसने बाकी सारे शासकों के चेहरे से नकाब खींच दिया। उसने दिखा दिया कि केवल एक ही राजा नंगा नहीं है, बल्कि सारे ही राजा नंगे हैं। उसने दिखा दिया कि बाग में केवल एक उल्लू नहीं बैठा है बल्कि हर शाख पर उल्लू बैठा है।
अभी बहुत दिन नहीं गुजरे जब कनाडा में प्रधानमंत्री कार्नी अरबपतियों के गैंग के सामने वर्तमान विश्व व्यवस्था की शोचनीय हालत के बारे में अच्छी-अच्छी बातें कर रहे थे। उनके प्रवचन पर दुनिया भर के स्वनामधन्य भोले लहालोट हो गये थे। उन्हें लगा कि दुनिया को एक नया राजनेता मिल गया है जो सच को सच कह सकता है। जो कह सकता है कि दुनिया का राजा नंगा है। पर अभी उसके भाषण के स्वर दुनिया में गूंजने बंद भी नहीं हुए थे कि उसने खुद ही जता दिया कि उसका प्रवचन किसी भाड़े के टट्टू की कलम से निकला था। उसे अपने प्रवचन में विश्वास नहीं था। वह बिल्कुल भारत के बाबाओं की तरह निकला जिनके प्रवचन बस उनके भक्तों के कानों के लिए होते हैं। न बाबा को अपने प्रवचन पर विश्वास होता है और न भक्तों पर। अपने प्रवचन के बामुश्किल महीने भर के भीतर कार्नी उसी सजायाफ्ता लंपट के पीछे गोलबंद हो गये। उन्होंने कनाडा को ईरान पर अमरीकी हमले का समर्थक बना दिया। ऐसा करते हुए उन्होंने पूरी बेशरमी से कहा कि वे प्रवचन पर कायम हैं। कि विश्व व्यवस्था टूट रही है और ईरान पर यह हमला उसी का द्योतक है।
कार्नी की तरह यूरोप के ज्यादातर शासकों ने भी स्वयं को सजायाफ्ता लंपट के पीछे गोलबंद कर दिया। इन्होंने अपनी करतूत से साबित कर दिया कि अमरीकी इन्हें यूं ही हिकारत की नजर से नहीं देखते। सजायाफ्ता लंपट इन्हें यूं ही नहीं बेइज्जत करता रहता है। इन्होंने स्वयं को और अपने देशों को वहां पहुंचा दिया है जहां हर तरह के युद्ध अपराधी और लंपट इन्हें लतियाते रहते हैं। चार साल पहले अमरीकियों ने रूस का यूक्रेन युद्ध इनके सिर पर थोपा और आज वे इसे स्वयं ढो रहे हैं। अमरीकी आज उस युद्ध में अपने खर्चे की सारी कीमत इनसे वसूल रहे हैं। इनकी इतनी हिम्मत नहीं है कि रूस से समझौता कर वे यह युद्ध बंद करा दें।
अगर इन साम्राज्यवादियों की यह स्थिति है तो पिछड़े देशों के और भी ज्यादा धन्य शासकों का व्यवहार समझा जा सकता है। ज्यादातर ने कबूतरों की तरह आंख बंद कर ली है और इंतजार कर रहे हैं कि बिल्ली का पेट किसी और से भर जाये। भारत के संघी लंपट तो और आगे गये हैं। उनकी सारी बहादुरी या देशभक्ति देश के मुसलमानों के सामने ही प्रकट होती है। अंतर्राष्ट्रीय पैमाने पर उन्होंने सचेत तौर पर खुद को और इस तरह देश को दुनिया में सबसे बदनाम लोगों के पीछे खड़ा कर दिया है। उन्हें लगता है कि दुनिया में नरसंहार करने वाले ही आज वास्तविक खिलाड़ी हैं और बेहतर होगा कि उनका चमचा बन लिया जाये। विश्व गुरू का जुमला चुपचाप अपनी जेब में रखकर वे अपने हर कारनामे से दिखा रहे हैं कि वे सजायाफ्ता लंपट का हर हुक्म मानने को तैयार हैं।
इन्हीं स्थितियों में यह हो सका कि ईरान पर अमरीकी हमले पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद एक बयान भी जारी न कर सकी पर उसने ईरान द्वारा आत्मरक्षा में खाड़ी देशों में स्थित अमरीकी सैनिक ठिकानों पर हमले पर निन्दा प्रस्ताव पास कर दिया। एक देश पर बिना किसी उकसावे पर हमला तथा उसके नेताओं की हत्या निंदा योग्य नहीं पाया गया। उसे उसकी संप्रभुता का उल्लंघन नहीं माना गया। पर उस देश द्वारा आत्मरक्षा में किया गया प्रत्याक्रमण निन्दा योग्य मान लिया गया। अपने देश की संघी सरकार को भी ईरान पर अमरीकी हमला ईरान की संप्रभुता का उल्लंघन नहीं लगा। न ही उसके नेताओं की हत्या। वह इन पर चुप्पी साध कर बैठी रही। पर जब ईरान ने खाड़ी देशों में स्थित अमरीकी सैन्य ठिकानों पर जवाबी हमला किया तो चुप्पी साध कर बैठे संघी प्रधानमंत्री को इन देशों की संप्रभुता की चिन्ता हो आई। वे ईरान के जवाबी हमले की निन्दा करने लगे।
सजायाफ्ता लंपट ने ईरान पर हमला कर सारी दुनिया की जनता के लिए स्पष्ट कर दिया कि देशों की संप्रभुता शासकों के लिए सुविधा की चीज है और यह कि आज शासक और मजदूर-मेहनतकश जनता अलग-अलग दुनिया में जी रहे हैं।
अमरीकी सजायाफ्ता लंपट ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया और बाकी दुनिया के ज्यादातर शासकों ने उस पर चुप्पी साध ली। उन्होंने उस लंपट पर दबाव नहीं बनाया कि वह मदुरो को वापस करे। तब भी नहीं जब उसने खुलेआम घोषित कर दिया कि उसने यह वेनेजुएला के तेल के लिए किया है। उसके बाद अभी दो महीने भी नहीं बीते कि उसी तरह ईरान पर हमला कर दिया। यहां एक नेता के अपहरण से बात नहीं बन सकती थी क्योंकि बाकी नेता आत्मसमर्पण करने को तैयार नहीं थे। इसलिए उसने शीर्ष नेताओं के एक बड़े समूह को मार दिया। उम्मीद यही थी कि इससे या तो वर्तमान शासन ध्वस्त हो जायेगा या बचे हुए नेता आत्म-समर्पण कर देंगे। पर यहां ऐसा नहीं हुआ। और अब खून के प्यासे हत्यारे, ईरान में भी गाजा की तरह का नरसंहार करने पर आमादा हैं।
ईरान पर हमला किसी भी पैमाने पर उसकी सम्प्रभुता का उल्लंघन है। यहां तक कि सजायाफ्ता लंपट गैंग भी, जिसे एप्स्टीन गैंग भी कहा जा रहा है, इसे जायज नहीं ठहरा पा रहा है। इस गैंग के पीछे गोलबंद शासक भी इसे जायज नहीं ठहरा पा रहे हैं। यदि वे मुंह खोलते हैं तो बस उससे यही साबित होता है कि देशों की सम्प्रभुता का कोई मतलब नहीं रह गया है। यदि झूठे-फर्जी बहाने से किसी देश पर हमले को जायज ठहराया जा सकता है तो फिर ईरान ही क्यों? फिर पुतिन का यूक्रेन पर हमला क्यों जायज नहीं है। अपने हमले को जायज ठहराने के लिए पुतिन के पास जायज कारण हैं। और यह इतनी अजीब बात नहीं है कि ‘युद्ध अपराधी’ पुतिन अब ईरान से अमरीकियों के निकल भागने का रास्ता तलाश रहे हैं।
सारे शासक अब इस जुगाड़ में हैं कि आई बला को टाल दें तथा अपनी खाल बचा लें। इस प्रक्रिया में कुछ इधर-उधर सट रहे हैं तो कुछ हाल-फिलहाल आपदा में अवसर भी तलाश कर रहे हैं। ऐसा करते हुए वे यह साबित कर रहे हैं कि न तो उन्हें किन्हीं उसूलों की चिन्ता है और न ही किसी नैतिकता की। बस वे अपना तात्कालिक फायदा या हित देख रहे हैं। ऐसा करते हुए वे अपने और सबके सर्वनाश का रास्ता साफ कर रहे हैं।
शासकों के मुकाबले दुनिया की मजदूर-मेहनतकश जनता दूसरे छोर पर खड़़ी है। वह अपनी सहज चेतना से ईरान पर अमरीकी हमले के खिलाफ है। उसे ईरान के शिया शासन से कोई प्यार नहीं है। आम समय में वह वहां के शासन के खिलाफ मजदूर-मेहनतकश जनता के संघर्षों का समर्थन करती है और उससे खुश होती है। पर आज उसके लिए साफ है कि ईरान पर अमरीकी साम्राज्यवादियों और उसके गुर्गे इजरायल का यह हमला ईरान की मजदूर-मेहनतकश जनता की मुक्ति के लिए नहीं है। इस मुक्ति की बानगी वह पहले ही अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, लीबिया, इत्यादि में देख चुकी है। उसे जरा भी शक नहीं है कि यह साम्राज्यवादी लूटपाट और कब्जे के लिए हमला है। इसीलिए वह इस हमले का विरोध करती है।
भारत में ईरान के प्रति सहानुभूति और अमरीकी हमले के प्रति नफरत का आलम यह है कि सरकार के भोंपुओं को भी ईरान के प्रतिरोध को सलाम करना पड़ रहा है। इन भोंपुओं की स्वाभाविक गति तो यही है कि वे एक मुसलमान देश ईरान की तौहीन करें, भले ही भारत के ईरान से सभ्यतागत ऐतिहासिक रिश्ते रहे हों। और खासकर जब संघी सरकार खुलेआम हमलावरों के साथ हो तब तो यह और भी स्वाभाविक हो जाता है। पर मजदूर-मेहनतकश जनता की भावनाओं ने इन्हें मजबूर कर दिया है कि वे ईरान के प्रतिरोध को सलाम करें।
बात केवल भारत की नहीं है। स्वयं हमलावर देश यानी उस देश में भी जिसका राष्ट्रपति उक्त सजायाफ्ता लंपट है, तीन चौथाई लोग इस हमले के खिलाफ हैं। वे इस या उस बहाने से सारी दुनिया में अमरीकी हमलों से थक गये हैं। वे मांग कर रहे हैं कि शासक उनकी बदहाल होती जाती जिन्दगी को बेहतर बनाने पर ध्यान दें। यह सजायाफ्ता लंपट मजदूर-मेहनतकश जनता की इसी भावना का इस्तेमाल कर ही राष्ट्रपति पद का चुनाव जीता। उसने लोगों से वायदा किया था कि वह दुनिया भर में चल रहे अमरीकी युद्धों को बंद करेगा। लेकिन इस लंपट ने गद्दी पर बैठते ही उल्टा करना शुरू कर दिया। उसने साल भर में सात देशों पर बमबारी की। ईरान पर हमला इसमें सबसे बड़ा है। यह इस बड़बोले लंपट की सनक का ही मामला नहीं है। इससे ज्यादा इसकी डोर खींचने वाले इस सनकी की आड़ लेकर ये हमले कर रहे हैं। पर लोग इन हमलों के खिलाफ हैं। वे जानते हैं कि यह युद्ध उनके हित में नहीं है।
यही बात खाड़ी के देशों की जनता के बारे में भी सच है। इन देशों में बाहर से काम के लिए आई जनता तो नहीं ही चाहती है कि युद्ध से उनका रोजगार छिन जाये। स्वयं इन देशों की स्थानीय आबादी भी अपने शासकों के खिलाफ है। वह जानती है कि उनके देशों के शासक अमरीकियों के पिट्ठू हैं। कि अमरीकियों ने उनके देशों में सैनिक अड्डे बनाकर इस पूरे क्षेत्र को युद्ध का मैदान बना रखा है। कि इस क्षेत्र के लिए आफत बना इजरायल जितना एक देश है, उतना ही अमरीका का सैनिक अड्डा। बल्कि वह इस क्षेत्र में अमरीका की सैनिक चौकी है। लोग इस सबके खिलाफ हैं। उनके लिए जरा भी शक नहीं है कि गाजा में नरसंहार करने वालों का चरित्र क्या है। इसीलिए वे इस क्षेत्र में ईरान के जवाबी हमलों पर ऐतराज नहीं जता रहे हैं। अक्सर तो वे खुशी जाहिर कर रहे हैं।
शासकों और मजदूर-मेहनतकश जनता का यह द्वैध यूं ही नहीं है। पिछले तीन-चार दशकों में, उदारीकरण-वैश्वीकरण के दशकों में जो एकीकृत पूंजीवादी व्यवस्था चल रही है उसमें शासक पूंजीपति वर्ग एक खेमे में है तो मजदूर-मेहनतकश जनता दूसरे खेमे में। स्वभावतः ही लुटेरे शासकों में लूट के लिए मतभेद है, मारकाट भी है। पर कुल मिलाकर उनके हित एक हैं। उनके लिए देशभक्ति या देशों की संप्रभुता जनता को बेवकूफ बनाने का साधन मात्र है। उनके लिए उनकी पूंजी का मुनाफा ही सब कुछ है। उसके लिए वे सबकुछ दांव पर लगाने को तैयार हैं।
दूसरी ओर है सारी दुनिया की मजदूर-मेहनतकश जनता। उसके हित दुनिया भर के पूंजीवादी शासकों के खिलाफ हैं। वह पतित पूंजीवादी शासकों की लूट-खसोट से तंग आ चुकी है। वह उनकी राष्ट्रभक्ति के जुमलों से तंग आ चुकी है। वह उनकी सारी चिकनी-चुपड़ी बातों से तंग आ चुकी है। वह देख रही है कि सारे ही देशों में सजायाफ्ता लंपट की प्रजाति के लोग ही सत्ता में बैठे हैं। कि वे अपने शासन की खातिर सारी दुनिया को महाविनाश के गर्त में धकेलने को तैयार हैं। कि इन लंपटों के पीछे जो असली खिलाड़ी हैं यानी पूंजीपति वर्ग वह और भी ज्यादा पतित है। वह इस दुनिया का काल बन चुका है।
इसके पहले कि दुनिया की हर शाख पर बैठे उल्लू समूचे चमन को बर्बाद कर दें, इनका इंतजाम करना होगा।