कभी अरस्तू ने कहा था कि एक आदर्श के तौर पर शासन की सबसे अच्छी प्रणाली लोकतंत्र है पर इसकी दिक्कत यह है कि यह जल्दी ही भीड़तंत्र में रूपान्तरित हो जाता है। इसलिए स्वयं अरस्तू ने व्यवहारिकता के मद्देनजर प्रबुद्ध एकतंत्र को तरजीह दी जिसमें कोई दार्शनिक राजा निष्काम भाव से समाज के समग्र हित में शासन करता है।
अरस्तू के ये विचार कोई ख्याली विचार नहीं थे बल्कि यूनान के नगर राज्यों के वास्तविक इतिहास पर आधारित थे। इनमें अक्सर यह देखा गया था कि किसी जन विद्रोह के बाद जनतंत्र स्थापित हुआ था (केवल स्वतंत्र नागरिकों का जनतंत्र क्योंकि गुलाम इससे बाहर होते थे) पर जल्दी ही यह भीड़तंत्र में रूपान्तरित हो गया। कुछ ऐसे नेता सामने आते थे जो लोकलुभावन बातें कर जनता को भड़काते थे और अपने हित में स्वयं जन-तंत्र की ऐसी-तैसी कर देते थे। इसके बाद फिर एकतंत्र या अल्पतंत्र (थोड़े से लोगों का शासन) कायम हो जाता था। कई बार यह चक्र दोहराता था। इसके फलस्वरूप यूनान में इतिहास की चक्रीय गति का एक सिद्धान्त ही पैदा हो गया था।
यूनान के नगर राज्य इतिहास की एक विशेष परिघटना थे और उनका जनतंत्र भी एक खास चीज था। फिर उनकी चर्चा यहां क्यों हो रही है? इसलिए कि बिहार के चुनाव परिणामों के मद्देनजर लोकतंत्र बनाम भीड़तंत्र का मुद्दा एक बार फिर मुखर हो गया है।
बिहार में भाजपा एण्ड कंपनी की जीत के बाद विरोधियों में कुछ ने चुनाव आयोग को कोसा तो कुछ ने बिहार की जनता को। कुछ ने दोनों को कोसा। जिन लोगों ने बिहार की जनता को कोसा उनका कहना था कि उसे शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार नहीं चाहिए। उसे शासक के तौर पर पढ़े-लिखे लोग नहीं चाहिए। उसे जाति-धर्म चाहिए। उसे मुफ्त का राशन चाहिए। उसे चुनाव के समय हजार-दो हजार की घूस चाहिए। पांच साल तक उसे लतियाने के बाद यदि चुनाव के समय उसे कुछ पैसे दे दिये जायें तो वह लतियाने वालों को फिर वोट दे देगी।
इस तरह की बात करने वाले प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी का खास तौर पर हवाला देते हैं। इन्होंने पढ़ाई-लिखाई, शिक्षा-स्वास्थ्य को ही प्रमुख मुद्दा बनाया था। इन्होंने पढ़े-लिखे लोगों को अपना उम्मीदवार बनाया था। इनका राजद की तरह ‘जंगलराज’ का अतीत भी नहीं था। पर इन्हें मुश्किल से तीन प्रतिशत वोट मिले। अनपढ़-गुण्डे चुनाव जीत गये पर पढ़े-लिखे चुनाव हार गये। पढ़े-लिखे भलेमानस लोगों को यह खास तौर पर बुरा लगा।
प्रशांत किशोर और उनकी जन-सुराज पार्टी पर भांति-भांति के सवाल हैं। उनका समूचा राजनीतिक अस्तित्व संदेहों के दायरे में है। इसी तरह उनके द्वारा खर्च किया जाने वाला अकूत पैसा भी। ज्यादातर लोग उन्हें भाजपा के एजेण्ट के तौर पर देखते हैं और उनका अतीत इसे बल प्रदान करता है। पर पिछले दो सालों से उन्होंने जो मुद्दे उठाये हैं वे जनहित के मुद्दे हैं, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। इसीलिए इन पर जनता की नकारात्मक प्रतिक्रिया भलेमानस लोगों में स्वयं जनता के प्रति नकारात्मक भाव पैदा करती है। वे जनता पर व्यंग्य करने से लेकर उसे खारिज करने तक चले जाते हैं।
ऐसे लोग स्वयं से एक सरल सा सवाल नहीं करते। वह सवाल यह हैः पूंजीवादी पार्टियों और नेताओं के पिछले पचहत्तर सालों के इतिहास को देखते हुए जनता इन पर विश्वास क्यों करे? स्वयं इस चुनाव में तेजस्वी यादव ने बिहार के हर परिवार को सरकारी नौकरी तथा भाजपा ने एक करोड़ सरकारी नौकरी का वायदा किया। क्या जनता इन पर भी विश्वास कर ले? जब भाजपा ने पिछले बीस साल के शासन में तथा राजद ने उसके पहले के पन्द्रह साल के शासन में यह नहीं किया तो अब वे कैसे और क्यों करेंगे? तब फिर इन वायदों को महज जुमला क्यों न माना जाये? और ठीक इसी कारण प्रशांत किशोर व जन सुराज पार्टी की बातों को भी महज जुमला ही क्यों न माना जाये? उन पर क्यों विश्वास किया जाये?
प्रशांत किशोर और उनकी टीम के लोग पढ़े-लिखे हो सकते हैं। पर केजरीवाल एण्ड कंपनी भी तो पढ़ी-लिखी थी। उन्होंने भी अनपढ़ नेताओं के मुद्दे को खूब उछाला था और अपनी पढ़ाई-लिखाई का खूब ढिंढोरा पीटा था। पर दिल्ली और पंजाब में सत्ता में आने पर उन्होंने क्या किया? दिल्ली और बिहार में काम करने वाले लाखों बिहारी उनकी सच्चाई को अपने प्रत्यक्ष अनुभव से जानते हैं। ‘व्यवस्था बदलने’ की उनकी सारी बातें अंत में थोड़ी सी मुफ्त बिजली और झुग्गी बस्तियों में पीने के पानी तक सिमट कर रह गयी। दस साल बाद भी दिल्ली में यह आधा-तीहा ही हो पाया।
पूंजीवादी पार्टियों और नेताओं के इस रिकार्ड को देखते हुए जनता इनके जुमलों के बदले हजार-दो हजार रुपयों को क्यों ठोस हकीकत न समझे? दस हजार रुपये की एकमुश्त रकम तो बहुत होती है। यदि ये नेता और पार्टियां चुनाव की रात हजार-पांच सौ रुपया तथा शराब की बोतलों की एवज में वोट हासिल करने की उम्मीद करती हैं तो दस हजार रुपये से यह क्यों नहीं हो सकता? और जनता झूठे-मक्कार लोगों के झूठ वायदों के बदले दस हजार रुपये को ज्यादा तवज्जो क्यों न दे? ऐसा व्यवहार करने पर उसे क्यों कोसा जाये? कोसने का काम वही लोग कर सकते हैं जिनके लिए दस हजार रुपयों का कोई खास महत्व न हो। जो अपने वोट को पवित्र मानते हों। या जिन्हें गुमान हो कि वे अपने एक वोट से सरकार बना या बिगाड़ सकते हैं? पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी कंगाली का जीवन जीने वाले भला ऐसा गुमान कैसे पाल सकते हैं?
हिन्दू फासीवादियों या उनकी राजनीतिक पार्टी भाजपा ने भारत की पूंजीवादी राजनीति की इस हकीकत को गहरे से आत्मसात कर इसे ही अपना हथियार बना लिया है और इसके जरिये विरोधियों को पस्त कर रहे हैं। यह उनकी आम दृष्टि और परियोजना के अनुरूप भी है।
फासीवादी हमेशा से ही ‘महामानव’ और ‘लघु मानव’ में विश्वास करते रहे हैं। उनका नेता महामानव होता है और लघु मानवों की भीड़ को उसके पीछे चलना होता है। यदि नरेन्द्र मोदी खुद को अजैविक मानते हैं तथा उनके भक्त उन्हें अवतारी पुरुष मानते हैं तो यह अनायास नहीं है। यह फासीवादियों की आम दृष्टि के अनुरूप है।
विश्व-इतिहास के वर्तमान मोड़ पर यह यूं ही नहीं हो जाता। हर इंसान जन्मजात बराबर है, इस धारणा को पैदा हुए अब दो सौ से ज्यादा साल हो गये हैं। वर्तमान पूंजीवादी लोकतंत्र का आधार यही है जिसकी कसम स्वयं मोदी भी खाते हैं। ऐसे में जब समाज में यह धारणा हो कि हर इंसान जन्मजात बराबर होता है तथा यही संविधान-कानून में भी दर्ज हो तब एक को ‘महामानव’ तथा बाकियों को ‘लघुमानव’ बनाना काफी कठिन हो जाता है। इसमें बहुत मेहनत करनी पड़ती है और बहुत पैसा खर्च करना पड़ता है। और यह संघ जैसे सांगठनिक तंत्र तथा बड़े पूंजीपति वर्ग के पैसे व प्रचारतंत्र के बिना नहीं हो सकता। पिछले दशकभर में हिन्दू फासीवादियों ने इसे हासिल किया है। उन्होंने ‘लघु मानव’ को भक्त और भीड़ में रूपान्तरित किया है। उन्होंने एक ‘महामानव’ भी स्थापित किया है। यह अलग बात है कि अगले महामानव के लिए इनके बीच प्रतिद्वन्द्विता बहुत तीखी है जो आत्मघाती भी साबित हो सकती है।
पूंजीवाद में ‘लघु मानवों’ की आबादी कुल आबादी की दस-पन्द्रह फीसदी से ज्यादा नहीं होती। इसके नीचे मजदूर-मेहनतकशों का वह विशाल बहुमत है जो हमेशा से ही जनवाद की लड़ाई का प्रमुख स्तम्भ रहा है। यह याद रखना होगा कि पूंजीवाद में जनवाद की सारी लड़ाई मजदूर वर्ग ने लड़ी है। यह तबका एक लम्बे समय तक हिन्दू फासीवादियों की पहुंच से दूर रहा और परिणामस्वरूप हिन्दू फासीवादी लम्बे समय तक भारत की पूंजीवादी राजनीति में भी हाशिये पर रहे।
लेकिन पिछले दस सालों में हिन्दू फासीवादियों ने कम से कम वोट के स्तर पर इसमें अपनी पहुंच बनाई है और उन्होंने यह किया है जनवाद की लड़ाई लड़ने वालों को ‘लाभार्थी’ में रूपान्तरित करके। यह पैसा या ‘लाभ’ दो और वोट लो का सीधा समीकरण है। यह पूंजीवाद की आम खरीद-बेच के पूर्णतया अनुरूप है।
बहुत सारे लोग मोदी सरकार की ‘लाभार्थी’ नीतियों को कल्याणकारी बताते हैं। कुछ के अनुसार तो मोदी सरकार नेहरू सरकार से भी ज्यादा ‘समाजवादी’ है। पर ऐसे लोग कल्याणकारी कदमों और ‘लाभार्थी’ योजनाओं में बुनियादी फर्क नहीं समझ पाते। कल्याणकारी राज्य में कल्याणकारी कदम जनता के अधिकार के तौर पर लिए जाते हैं। इतिहास में जनता ने वास्तव में संघर्षों के जरिये ही यह हासिल किया था और उन्हें अपना अधिकार मानती थी। उदारीकरण-वैश्वीकरण के दौर में जब इन कल्याणकारी कदमों पर व्यापक तौर पर हमला बोला गया तो इसका एक लक्ष्य यह भी था कि इन्हें जनता के अधिकार के बदले खैरात में बदल दिया जाये। अब कल्याणकारी कदम जनता के अधिकार के बदले सरकार द्वारा दिये जाने वाले खैरात में बदल गये जो सरकार की मेहरबानी पर निर्भर थे और जिनके लिए जनता को सरकार का एहसानमंद होना चाहिए।
मोदी सरकार ने उदारीकरण के जमाने की इस आम चीज को खास रूप में ढाला। उसने इसे विशेष तौर पर मोदी की सौगात के रूप में प्रचारित किया। सारी योजनाओं में ‘पी एम’ नाम जोड़ दिया गया। हर योजना पर मोदी की तस्वीर चिपका दी गयी। यहां तक कि कोविड का टीका भी मोदी की सौगात बन गया जिसके प्रमाणपत्र पर मोदी की तस्वीर छपी होती थी। देश के आम जन, खासकर गरीब लोग खैराती या ‘‘लाभार्थी’’ बन गये जिसके लिए उन्हें मोदी का एहसानमंद होना था। अब सरकार की कल्याणकारी योजनाएं राज्य की कल्याणकारी योजनाएं नहीं थीं जिन पर सरकार बदलने से कोई फरक नहीं पड़ता। अब योजनाएं मोदी की थीं जिन्हें वे कभी भी बदल सकते थे या रद्द कर सकते थे। अब पांच किलो मुफ्त राशन 2013 के खाद्य सुरक्षा कानून का परिणाम नहीं था बल्कि मोदी की मेहरबानी का परिणाम था जिसे मोदी जारी रख सकते थे या खत्म कर सकते थे।
राज्य के कल्याणकारी कदमों को खैरात में बदलने का एक भीषण परिणाम हो सकता था और मोदी ने ठीक इसी ओर कदम बढ़ाये। वह यह था कि जनता को अधिकाधिक कंगाली में ढकेला जाये जिससे वह जिन्दा रहने के लिए अधिकाधिक सरकारी खैरात पर निर्भर रहे। इसके दोहरे फायदे होने थे। एक ओर इस कंगाली से पूंजीपति वर्ग को मालामाल होना था। दूसरी ओर कंगाल जनता को कुछ खैरात बांटकर उसे एहसानमंद बनाया जा सकता था जो फिर मोदी को धन्यवाद स्वरूप वोट देती। समय के साथ मोदी सरकार ने अपने इस माडल को मुकम्मल किया है। इसी से यह अद्भुत परिघटना पैदा हुई है कि कंगाल जनता स्वयं को कंगाली की ओर ढकेलने वाली पार्टी या नेता को वोट दे रही है।
यह सही है कि मजदूर-मेहनतकश जनता का अल्पमत ही मोदी एंड कंपनी के इस फरेब का शिकार है पर यह अल्पमत उन्हें सत्ता में बनाये रखने में सहायक साबित हो रहा है।
मजदूर-मेहनतकश जनता के इस हिस्से को मोदी एण्ड कंपनी अथवा हिन्दू फासीवादियों के चंगुल से निकालने के लिए केवल चुनावी वायदे पर्याप्त नहीं होंगे जो आज जुमलों से ज्यादा हैसियत नहीं रखते। यदि विपक्षी पार्टियों को इनके वोट मिल भी जाते हैं तो उन पर किसी विश्वास की वजह से नहीं, बल्कि केवल विकल्पहीनता में।
मजदूर-मेहनतकश जनता को ‘लाभार्थी’ या भीड़ में बदलने का जो प्रयास पूंजीवादी पार्टियों ने आम तौर पर तथा हिन्दू फासीवादियों ने खास तौर पर किया है उसे देखते हुए उसे वापस नागरिकता की जमीन पर लाना एक कठिन काम बन जाता है। लेकिन जो लोग समाज के क्रांतिकारी रूपान्तरण के हामी हैं उन्हें इस कठिन चुनौती को स्वीकार करना होगा। और यह काम पूंजीवादी लोकतंत्र की हिफाजत को लक्ष्य बनाकर नहीं किया जा सकता क्यांकि उसकी आम प्रवृत्ति भीड़तंत्र में बदलने की है। यह काम पूंजीवादी लोकतंत्र से पार जाने का लक्ष्य बनाकर ही किया जा सकता है और यह विकल्प केवल समाजवादी लोकतंत्र ही हो सकता है। अरस्तू की व्यवहारिकता के विपरीत आज एक और ऊंचे आदर्श को सामने रखने का समय है- समाजवादी लोकतंत्र का आदर्श!