जी-20 शिखर सम्मेलन के राजनीतिक निहितार्थ

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जी-20 का शिखर सम्मेलन दक्षिण अफ्रीका की राजधानी जोहान्सबर्ग में 22-23 नवम्बर को सम्पन्न हुआ। यह शिखर सम्मेलन हर वर्ष बारी-बारी से इसके सदस्य देश की अध्यक्षता में सम्पन्न होता है। इसके पहले 2022 में इण्डोनेशिया, 2023 में भारत और 2024 में ब्राजील इसकी अध्यक्षता कर चुके थे। इस वर्ष की अध्यक्षता दक्षिण अफ्रीका ने की। जी-20 का गठन 1999 में उस समय किया गया जब जी-7 के साम्राज्यवादी देशों ने वैश्विक आर्थिक संकट से निपटने के लिए अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को शामिल कर लिया था। पहले जी-20 की बैठकें मंत्री स्तर की होती थीं। लेकिन बाद में इसका दर्जा शीर्ष स्तर का, यानी राष्ट्राध्यक्ष या शासनाध्यक्ष स्तर का कर दिया गया। 
    
इस वर्ष के शीर्ष सम्मेलन की विशेषता यह थी कि यह पहली बार अफ्रीकी महाद्वीप के किसी देश में हुआ। इसकी दूसरी विशेषता यह थी कि इसका अमरीकी साम्राज्यवादियों ने बहिष्कार किया। अमरीकी साम्राज्यवादियों ने यह कहकर दक्षिण अफ्रीका में हुए शीर्ष सम्मेलन का बहिष्कार किया कि दक्षिण अफ्रीकी सरकार गोरे अल्पसंख्यक अफ्रीकनरों के साथ अन्याय कर रही है, उनको उनकी जमीनों से जबरन वंचित कर रही है और उनका उत्पीड़न कर रही है। दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने इन आरोपों को निराधार बताया और कहा कि अमरीकी सरकार शायद यह नहीं ध्यान दे रही है कि दक्षिण अफ्रीका की जनता को लम्बे समय तक रंगभेदवादी गोरी अल्पसंख्यक अफ्रीकनरों की सत्ता द्वारा अत्याचार, अन्याय और आतंकवादी दमन के पीड़ादायी लम्हों से गुजरना पड़ा था। दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा इसे स्पष्ट करने के लिए अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प से मिलने व्हाइट हाउस भी गये। लेकिन ट्रम्प ने उनकी एक नहीं सुनी और उनको वहां पर बेइज्जत किया। इसके बाद ट्रम्प ने दक्षिण अफ्रीका के राजदूत को वहां से निष्कासित कर दिया। 
    
दरअसल, दक्षिण अफ्रीका के साथ अमरीकी साम्राज्यवादियों के सम्बन्ध उसी समय खराब हो गये जब दक्षिण अफ्रीका ने अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में इजरायल द्वारा गाजापट्टी में फिलिस्तीनियों के किये जा रहे नरसंहार और व्यापक विनाश के लिए मानवता के विरुद्ध अपराध करने का मुकदमा दर्ज किया और ठोस सबूत पेश किये। अमरीकी साम्राज्यवादी इजरायली यहूदी नस्लवादी नेतन्याहू सरकार द्वारा किये जा रहे इस नरसंहार और व्यापक विनाश के भागीदार थे। वे दक्षिण अफ्रीका द्वारा अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में दायर किये गये मुकदमे और वहां पेश किये गये ठोस सबूतों के चलते दुनिया भर में अलगाव में पड़ गये थे। तब से वे दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध कदम उठा रहे थे। अमरीकी साम्राज्यवादियों ने दक्षिण अफ्रीका को आर्थिक मदद रोक दी। इधर दक्षिण अफ्रीका पर 30 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया। अब वे श्वेत अल्पसंख्यक अफ्रीकनरों के उत्पीड़न का बहाना बनाकर जी-20 शिखर सम्मेलन के बहिष्कार पर उतर आये। ट्रम्प ने यह भी घोषणा कर दी कि शिखर सम्मेलन में कोई सर्वसम्मति से प्रस्ताव नहीं पारित किया जायेगा, और कि सिर्फ अध्यक्षीय भाषण ही होगा। चूंकि अध्यक्षीय भाषण सम्मेलन का प्रस्ताव नहीं होता, इसलिए उससे कोई भी हिस्सेदार देश बंधा नहीं होता। 
    
ट्रम्प के बहिष्कार के बावजूद शिखर सम्मेलन ने एक व्यापक 122 सूत्रीय प्रस्ताव पारित किया। दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने अमरीका के इस बहिष्कार को अफसोसजनक करार दिया। लेकिन यह भी कहा कि बहिष्कार करके अमरीका अपना ही नुकसान कर रहा है। दक्षिण अफ्रीकी सरकार के प्रतिनिधि ने यह भी कहा कि दक्षिण अफ्रीका धमकियों के आगे नहीं झुकेगा। ट्रम्प के इस बहिष्कार का साथ सिर्फ एक दक्षिण अमेरिकी देश ने दिया। 
    
जी-20 के इस शीर्ष सम्मेलन में अफ्रीकी महाद्वीप के देशों की गरीबी, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक परेशानियों तथा कर्जों पर पहुंच की समस्याओं पर विशेष जोर देने के साथ ही दुनिया के पैमाने पर बढ़ रहे पर्यावरणीय संकट, ऊर्जा संकट तथा विज्ञान व प्रौद्योगिकी के क्षेत्र के विकास में सहभागिता और आर्थिक असमानता को दूर करने के उपायों पर चर्चा हुई।
    
हालांकि दुनिया जितने टकरावों और संघर्षों से गुजर रही है, उसमें इस शीर्ष सम्मेलन में पारित घोषणा पत्र से बहुत कुछ सकारात्मक निकलने की संभावना बहुत कम है, फिर भी इस शीर्ष सम्मेलन ने दक्षिण अफ्रीका की स्थिति को दुनिया के अधिकांश देशों विशेष तौर पर अफ्रीकी महाद्वीप के देशों के समक्ष एक मजबूत ताकत के रूप में स्थापित कर दिया है। इसने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि दक्षिण अफ्रीकी सरकार अमरीकी साम्राज्यवादियों के समक्ष आत्मसमर्पण करने को तैयार नहीं है। 
    
जी-20 की अगली अध्यक्षता अमरीकी साम्राज्यवादियों के हाथ में है। चूंकि अमरीकी साम्राज्यवादियों ने इसका बहिष्कार किया था, इसलिए अमरीकी राष्ट्रपति की कुर्सी खाली रखी गयी थी। शीर्ष सम्मेलन के अंत में मौजूदा अध्यक्ष अगले अध्यक्ष को जी-20 का एक हथौड़ा पेश करता है। इस बार अमरीकी साम्राज्यवादी चाहते थे कि उस हथौड़े को अमरीकी दूतावास के एक कनिष्ठ अधिकारी को पेश किया जाये। लेकिन दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने इसे प्रोटोकाल के विरुद्ध कहकर खारिज कर दिया। बाद में साधारण तरीके से इसे दक्षिण अफ्रीका के एक अधिकारी ने एक अमरीकी अधिकारी को सौंप दिया। 1 दिसम्बर से अमरीकी अध्यक्षता का कार्यकाल साल भर के लिए शुरू होगा। इसी दौरान ट्रम्प ने घोषणा कर दी है कि 2026 में अमरीका दक्षिण अफ्रीका को जी-20 की शीर्ष बैठक में आमंत्रित नहीं करेगा। ट्रम्प का कहना है कि दरअसल दक्षिण अफ्रीका को जी-20 से बाहर कर दिया जाना चाहिए। इसका कारण, वे दक्षिण अफ्रीका की श्वेत अल्पसंख्यक आबादी की जबरन जमीन छीनने की कार्रवाई को मुख्यतया बताते हैं। 
    
इससे अभी से यह स्पष्ट हो गया है कि जी-20 की उपयोगिता साम्राज्यवादी देशों के लिए कोई खास नहीं रह गयी है। एक समय में वैश्विक संकट को हल करने में साम्राज्यवादी इसकी भूमिका को देखते थे। हालांकि संकट के कारण विश्व साम्राज्यवादी-पूंजीवादी व्यवस्था में ही थे। लेकिन जब जी-20 के अन्य देश अलग-अलग क्षेत्रीय संगठनों में संगठित होकर अपनी सौदेबाजी की ताकत बढ़ाने लगे तो जी-7 के साम्राज्यवादियों विशेषतौर पर अमरीकी साम्राज्यवादियों को जी-20 में ज्यादा विरोध का सामना करना पड़ा। अमरीकी साम्राज्यवादियों के हितों में काम करने वाली वैश्विक संस्थायें- अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक- अपने भीतर परिवर्तन लाने के लिए तैयार नहीं हैं। वे अभी भी मूलतया अमरीकी साम्राज्यवादियों के हित साधन का औजार बनी हुई हैं। इसी प्रकार, विश्व व्यापार संगठन अमरीकी साम्राज्यवादियों की मनमानी करने को रोकने में अपंग है। संयुक्त राष्ट्र संघ ताकतवर देशों की मनमानी रोकने में असहाय और निष्क्रिय है। ऐसी हालत में जब एक नयी साम्राज्यवादी ताकत चीन तेजी से उभरकर सीधे अमरीकी साम्राज्यवाद सहित पश्चिमी साम्राज्यवादियों के लिए चुनौती बन कर आ उपस्थित हुआ हो तो वह रूसी साम्राज्यवादियों के साथ मिलकर वैश्विक पैमाने पर अलग-अलग गठबंधन बना रहा है, बल्कि बना चुका है। इनमें ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन तथा अन्य क्षेत्रीय संगठन हैं। ये संगठन नयी ताकत के साथ अमरीकी साम्राज्यवादियों के सामने आ उपस्थित हुए हैं। दरअसल, 2022 से 2024 तक, इन तीन वर्षों के दौरान जी-20 की अध्यक्षता ब्रिक्स देशों के पास या इनके सहयोगियों के पास थी। अमरीकी साम्राज्यवादी एक तरफ ब्रिक्स में दरार पैदा करने और उसे कमजोर करने की साजिशें कर रहे हैं। दूसरी तरफ, वे रूस और चीन के बीच दरार पैदा करने की कोशिश में लगे हैं। वे भारत पर दबाव बनाकर उसे रूस के विरुद्ध करने में लगे हैं। वे चीन और भारत के बीच विवादों को हवा दे रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद उन्हें सफलता मिलती दिखाई नहीं दे रही है। 
    
ऐसी स्थिति में जहां अमरीकी साम्राज्यवादियों का अपने सहयोगी यूरोपीय साम्राज्यवादियों के साथ मतभेद व टकराव बढ़ रहे हों, अमरीका और रूस के बीच, अमरीका और चीन के बीच तथा चीन और भारत के बीच तरह-तरह के विवाद और टकराव बढ़ते जा रहे हों, वहां जी-20 की एक सकारात्मक मंच के बतौर न तो अब साम्राज्यवादियों के लिए कोई खास उपयोगिता रह गयी है और न ही दूसरे साम्राज्यवादी देशों- चीन और रूस- के लिए इसकी प्रभावशाली भूमिका बनने की संभावना है। 
    
इसके बजाय ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय संगठन इनके हितों की ज्यादा अच्छी तरह से सेवा कर रहे हैं। चूंकि चीन इस संगठन (जी-20) और अन्य अंतर्राष्ट्रीय मंचों का इस्तेमाल अभी भी अपने वृहत्तर साम्राज्यवादी उद्देश्यों के लिए कर सकता है तो वह एक तरफ इन्हें मजबूत करने और इनमें आवश्यक बदलाव लाने की हिमायत करता है। दूसरी तरफ इन मंचों की उपयोगिता को नाकाफी समझता है। 
    
इसलिए यह देखा जा रहा है कि जी-20 जैसे मंचों में चीन ऐसे सवालों को उठाता है जो एशिया, अफ्रीका और लातिन अमरीका के शासकों की सौदेबाजी करने की क्षमता को बढ़ाते हुए लगते हैं। वहीं अमरीकी साम्राज्यवादी इसके कट्टर विरोधी के रूप में दिखाई पड़ते हैं। मसला जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी सी.ओ.पी.-30 में भाग लेने का हो तो अमरीकी साम्राज्यवादी इसमें भाग नहीं लेते। वे कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए सहमत नहीं होते। वे सतत विकास के 2030 के संयुक्त राष्ट्र संघ के लक्ष्य की दिशा में गरीब देशों को हरित ऊर्जा में संक्रमण करने में अपने योगदान को आगे बढ़ाने के लिए तैयार नहीं होते। यही कारण है कि अफ्रीकी देशों और व्यापक लातिन अमरीकी व एशियाई देशों के शासकों के बीच चीनी साम्राज्यवादियों की नीतियों की स्वीकार्यता बढ़ रही है। 
    
जहां एक तरफ जी-20 और अन्य बहुपक्षीय संगठनों/संस्थाओं में अधिकांश गरीब देशों के शासकों का अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ एक हद तक विरोध या टकराव है, वहीं खुद इन गरीब देशों के शासक पूंजीवादी शासक हैं और इनका अपने देश की मजदूर-मेहनतकश आबादी से दुश्मनाना रिश्ता है। चाहे दक्षिण अफ्रीका के रामफोसा हों, चाहे ब्राजील के लूला हों या चाहे भारत के शासक मोदी हों, ये सभी पूंजीपति वर्ग के प्रतिनिधि हैं। इनकी चारित्रिक विविधताओं के बावजूद ये सभी अपने-अपने देशों में पूंजीवाद की सेवा में लगे हुए हैं। ये विश्व पूंजीवादी व्यवस्था, साम्राज्यवादी व्यवस्था से घनिष्ठता से जुड़े हुए हैं। ऐसी स्थिति में, इनका भी व्यवहार विभिन्न जन कल्याण की नीतियों में पाखण्डपूर्ण रहता है। ये न तो कार्बन उत्सर्जन को रोक सकते हैं और न ही पेट्रोल-डीजल से उत्पन्न प्रदूषण को खत्म कर सकते हैं। ये न ही जंगलों की कटाई को रोकने में समर्थ हैं। इसका कारण मुनाफे की व्यवस्था है और ये उसी के प्रतिनिधि हैं। इसलिए अमरीकी साम्राज्यवादियों और अन्य साम्राज्यवादियों से एक हद तक विरोध के बावजूद, एक हद तक अंतरविरोध के बावजूद, ये उसी आदमखोर व्यवस्था के हिस्से हैं, जिसके अमरीकी व अन्य साम्राज्यवादी शिखर पर हैं। 
    
इसलिए कभी-कभी इनके साम्राज्यवादियों के साथ एक हद तक अंतरविरोध के चलते कुछ लोग इन्हें मजदूर-मेहनतकश आबादी का दोस्त समझने के भ्रम में हो जाते हैं। ये लोग खुद ऐसे भ्रम को पैदा करते हैं और प्रसारित करते हैं। साम्राज्यवादियों के बीच के अंतरविरोधों और टकरावों, साम्राज्यवादियों और एशिया, अफ्रीका, लातिन अमरीकी शासकों के बीच के अंतरविरोधों और टकरावों को स्वीकार करते हुए और इनके अंतरविरोधों का इस्तेमाल करते हुए भी इन्हें मजदूर-मेहनतकश आबादी के दोस्त समझने की भूल आत्मघाती होगी। 
    
जी-20 के शिखर सम्मेलन और ऐसे ही संगठनों के फैसलों का मजदूर-मेहनतकश आबादी के लिए यही राजनीतिक निहितार्थ है। 

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