सरकार को झुकाने को अनवरत् संघर्ष जरूरी

Published
Mon, 02/16/2026 - 06:00
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12 फरवरी की आम हड़ताल पिछले कुछ वर्षों की हड़तालों से कहीं अधिक सफल रही। स्कीम वर्कर्स, गिग मजदूरों-सरकारी कर्मियों के साथ कई जगह निजी क्षेत्र की यूनियनों ने भी हड़ताल की। देश के हर छोटे-बड़े शहरों में मजदूरों का लाल झण्डा लहराता नजर आया। सरकार के हमलों के खिलाफ मजदूर वर्ग आक्रोशित है व सरकार से मुकाबले को तैयार है। सड़कों पर उतरे मजदूरों के सैलाब ने इस बात को उजागर कर दिया। 
    
सड़कों पर एक साथ उतर इंकलाब के नारे लगाते मजदूरों को इस हड़ताल ने अपनी सामूहिक ताकत का अहसास कराया। मजदूर अकेले-अकेले कुछ नहीं है, उसकी ताकत ही समूह व संगठनबद्ध होने में है। संगठनबद्ध होकर, एकजुट होकर वह दुनिया बदल डालने की क्षमता रखता है। 
    
हड़ताल की सफलता से केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशनें खुश हैं कि इस आयोजन से सरकार के हमलों के प्रति मजदूरों के आक्रोश को सड़कों पर उतार दिया। इससे आगे संघर्ष करने की उनकी न तो दृष्टि है और न ही इच्छा। वे अब इस शक्ति प्रदर्शन के दम पर सरकार से कुछ रियायत की उम्मीद कर रहे हैं। एक ऐसी सरकार जो अम्बानी-अडाणी के इशारों पर नाच रही है, से रियायत की उनकी उम्मीद खुद को व मजदूर वर्ग को धोखे में रखने सरीखी है। 
    
हकीकत यही है कि मजदूरों के इस सैलाब से फासीवादी सरकार के मजदूर विरोधी कदमों पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। केन्द्रीय फेडरेशनों के अब तक के रवैय्ये से भी सरकार आश्वस्त है कि ये एक दिन के संघर्ष से अधिक कुछ नहीं करने वाले। ऐसे में सरकार को पीछे धकेलने के लिए जरूरी है कि संघर्ष को आगे बढ़ाया जाये। संघर्ष को एक दिन से आगे बढ़ा अनिश्चितकालीन हड़ताल-अनवरत् संघर्ष की ओर बढ़ाया जाये। केवल तभी सरकार को पीछे हटने को मजबूर किया जा सकता है। 
    
इस दिशा में आगे संघर्ष बढ़ाने में सबसे बड़ी बाधा खुद केन्द्रीय फेडरेशनें व उनका नेतृत्व है। यह सुधारवादी-पूंजीवादी नेतृत्व सरकार से सीधे टकराने, जेल जाने को तैयार नहीं है। यह मजदूर वर्ग के संघर्ष को पूंजीवादी-कानूनी दायरे में बांधे रखने की सोच से लैस है। यह किसी वास्तविक-निर्णायक संघर्ष की ओर बढ़ने को तैयार नहीं है। 
    
दूसरी बाधा इन फेडरेशनों द्वारा मजदूरों में की जा रही सुधारवादी राजनीति है। ये मजदूर वर्ग को अर्थवाद-सुधारवाद-कानूनवाद के चंगुल में बनाये रखते हैं। ये इंकलाब का नारा जरूर लगाते हैं पर इंकलाब के लिए मजदूर वर्ग को तैयार करना व इंकलाब पर भरोसा करना ये काफी पहले छोड़ चुके हैं। इनका इंकलाब संसद की सीढ़ियों में ही सिमट चुका है। ऐसे में मजदूर वर्ग को उसके ऐतिहासिक मिशन समाजवाद-साम्यवाद से परिचित कराने व मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी भूमिका से उसे परिचित कराने का काम ये बंद कर चुके हैं। परिणाम यह निकलता है कि इनकी यूनियनों में संघबद्ध मजदूर भी एक हद से ज्यादा संघर्ष-कुर्बानी को तैयार नहीं हैं। सरकारी कर्मियों-बैंक-बीमा कर्मियों की आम हड़ताल में कमजोर भागीदारी इसी वजह से है। 
    
ऐसे में जरूरी है कि मजदूर वर्ग में उसकी क्रांतिकारी विचारधारा, मजदूर वर्ग के ऐतिहासिक मिशन, इंकलाब में उसकी नेतृत्वकारी भूमिका को फिर से स्थापित किया जाये। उसे आर्थिक से आगे बढ़कर राजनैतिक संघर्षों के लिए तैयार किया जाये। इसके साथ ही केन्द्रीय फेडरेशनों पर रस्मी संघर्ष से आगे बढ़कर जुझारू संघर्ष के लिए दबाव डाला जाये। ये दोनों काम साथ-साथ चलने वाले व एक-दूसरे को प्रभावित करने वाले होंगे। मजदूर जिस हद तक अपने ऐतिहासिक मिशन पर खड़े होंगे उतना ही अपने पतित नेतृत्व पर संघर्ष करने का दबाव डाल पायेंगे। इस प्रक्रिया में केन्द्रीय फेडरेशनों को या तो मैदान से हट जाना होगा या फिर इसके नेतृत्व में संघर्षशील तत्व काबिज हो जायेंगे। 
    
मजदूर वर्ग पर सरकार के बढ़ते हमले, उसके जीवन की बढ़ती दुर्दशा उसे संघर्ष की ओर धकेल रहे हैं। 4 श्रम संहिताओं के हालिया हमले से मजदूर वर्ग में सरकार के प्रति गुस्सा बढ़ा है। जरूरत है कि इस गुस्से को क्रांतिकारी चेतना से लैस किया जाये। मजदूर वर्ग को इंकलाब के लक्ष्य पर खड़ा किया जाये। समाजवादी क्रांति के लक्ष्य से मजदूर वर्ग द्वारा छेड़ा गया क्रांतिकारी संघर्ष ही शासकों को पीछे हटने को मजबूर कर सकता है। 
    
आज भले ही मजदूर एक दिन के लिए सड़कों पर उतरे हों। आने वाले वक्त में हम सड़कों पर मजदूर वर्ग का जुझारू अनवरत् सैलाब देखेंगे। यह सैलाब सड़कों से आगे बढ़कर सत्ता प्रतिष्ठानों तक पहुंच जायेगा। यह सैलाब पूंजीवादी व्यवस्था के अंत की कथा रचेगा। मजदूर वर्ग की जीत व शासक वर्ग की हार तय है। 

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