हमारे देश में एक राज्य की पुलिस का नारा (स्लोगन) या प्रचार वाक्य है, ‘सुरक्षा आपकी, संकल्प हमारा’ और एक राज्य की पुलिस का नारा है ‘सेवा, सुरक्षा, सहयोग’, तो एक का ‘शांति, सेवा, न्याय’ और एक का ‘मित्रता, सेवा, सुरक्षा’ है। जिस पुलिस का नारा ‘सुरक्षा आपकी, संकल्प हमारा’ है, उस राज्य में, पूरे भारत वर्ष में सबसे ज्यादा हत्यायें, पुलिस व न्यायिक हिरासत में होती हैं। यह राज्य ऐसा राज्य है जहां बुलडोजर न्याय होता है और शायद ही कोई दिन होता होगा जब पुलिस या न्यायिक कस्टडी में किसी की हत्या नहीं होती होगी।
अलग-अलग राज्यों की पुलिस के नारे आकर्षक हैं परन्तु शायद ही कोई व्यक्ति होगा जो इन नारों पर एक इंच भी विश्वास करता होगा। स्वयं पुलिस का भी अपने नारों में विश्वास नहीं होगा। कोई मजदूर, किसान, आमजन शायद ही मानेंगे कि पुलिस ‘शांति, सेवा, न्याय, मित्रता, सुरक्षा या सहयोग’ के लिए होती है। भारत के हर उस नागरिक की अपनी एक कहानी होगी जिसका एक दिन के लिए भी पुलिस से वास्ता पड़ा होगा। और जिनकी उम्र के कई-कई वर्ष बिना मुकदमा चालू किये जेलों में बीत गये उनका जीवन संघर्षों की गाथा ही बन जाता है। ऐसे लोगों में राजनैतिक कार्यकर्ता से लेकर निर्दोष मासूम लोग भी हैं। इन निर्दोष लोगों को कभी आतंकवादी तो कभी माओवादी के नाम पर जेल में ठूंस दिया जाता है। ये लोग तो भी खुशकिस्मत हैं कि ये जिन्दा हैं भले ही इन्हें व्यवस्था द्वारा ‘जिन्दा लाश’ बना दिया गया हो परन्तु हजारों-हजार लोग ऐसे हैं जिन्हें पुलिस या सुरक्षा बलों द्वारा किसी जांच या किसी न्याय प्रक्रिया के बगैर ही सी धे ही मार दिया जाता है। आजाद भारत में यदि इस संख्या को जोड़ लिया जाये तो यह संख्या हजारों में नहीं लाखों में बैठेगी। खुद गणना कर लीजिये यह बात कोई अतिश्योक्ति नहीं साबित होगी।
आजादी से पहले हम अंग्रेजों के गुलाम थे। अंग्रेजों ने, भारत को गुलाम बनाने और फिर अपना राज कायम रखने के दौरान, लाखों भारतीयों की निर्ममतापूर्वक हत्या की थी। अंग्रेजों द्वारा भारतीयों के कत्लेआम की गवाही देने वाली सैकड़ों निशानियां पूरे भारत में बिखरी पड़ी हैं। कहीं कोई बाग (जैसे अमृतसर का जलियांवाला बाग) तो कहीं पेड़ (बरेली कमिश्नरी में बूढ़ा बरगद का पेड़ जिसमें 1857 के 257 क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गई थी) तो कहीं गदेरा (नैनीताल का फांसी का गदेरा जहां 1857 के चालीस क्रांतिकारियों को फांसी दी गयी थी) इस बात की गवाही देते हैं कि हमारे पूर्वजों के ऊपर अंग्रेजों ने कितने-कितने जुल्म किये थे। कई जगहें हमें याद हैं (जलियांवाला बाग) कई जगहें (बरेली का जिन्दा बूढ़ा बरगद, नैनीताल का फांसी गदेरा) हमने भुला सी दी हैं। अंग्रेज हमारे देश को लूटने आये थे। और फिर जब देश उनकी गुलामी से तंग आ गया तो उनके खिलाफ हो गया। अंग्रेज देश को छोड़कर चले गये परन्तु जो राज्य मशीनरी उन्होंने अपने शासन के दौरान कायम की थी, उसे नये शासकों को सौंप गये। हमारे अपने देश के ये लोग (नये शासक) हमारी आजादी की लड़ाई में रहनुमा बने फिरते थे। शासक भले ही नये थे, परन्तु राज्य मशीनरी वही पुरानी थी। वही पुलिस थी, वही सेना थी, वही अफसर थे, वही जज थे। इसका मतलब क्या निकला नया भारत खून से नहाया हुआ था और आज भी खून से सना हुआ है। पहले अंग्रेजों की राजसत्ता भारतीयों का खून पीती थी अब भारत के शासक बन बैठे पूंजीपतियों-भूस्वामियों की राजसत्ता यह काम करने लगी।
इस खूनी राजसत्ता की मार भारत का सबसे बड़ा शोषित वर्ग- मजदूर वर्ग हर रोज झेलता है। वर्दीधारी लोग उसे कहीं भी कभी भी बेवजह पीट सकते हैं। फैक्टरी के भीतर, सड़क पर, घर में उसे कहीं भी तंग किया जा सकता है। फैक्टरी दुर्घटना से लेकर आपदा तक में उसकी मौत को आसानी से गिनती से बाहर कर दिया जाता है। अपने शोषण के खिलाफ आवाज उठाने पर उन्हें अक्सर ही लाठी-गोली-जेल का सामना करना पड़ता है।
आजाद भारत में मजदूर, अपने जुझारू आंदोलनों के दौरान पुलिस की गोलियों से मारे गये हैं। उनकी संख्या हजारों में है। कई लोमहर्षक घटनाओं को आसानी से याद किया जा सकता है।
आजाद भारत में राजसत्ता के इस दमन की शुरूवात तेलंगाना आंदोलन (1946-51) से ही हो गयी थी। यह जमीन से वंचित किसानों व खेत मजदूरों का ऐसा आंदोलन था जो कि हैदराबाद की क्रूर निजामशाही और उसके पुलिस रजाकारों के खिलाफ था। इस किसान विद्रोह के दबाने के लिए पहले निजामशाही ने और फिर नये भारत की सेना-पुलिस ने पूरा रक्तपात किया। एक ओर हैदराबाद की रियासत को भारत में मिलाया गया तो दूसरी ओर क्रूरतापूर्वक तेलंगाना आंदोलन को कुचल डाला गया। नये शासकों को डर था कि कहीं भारत में भी चीन की तरह की मजदूर-किसान क्रांति न हो जाए। तेलंगाना आंदोलन में सरकारी आंकड़ों के अनुसार चार हजार लोग मारे गये और एक लाख लोग जेलों में डाले गये।
किसानों खासकर क्रांतिकारी किसानों का कत्लेआम का यह सिलसिला हालिया किसान आंदोलन तक जारी रहा है। किसानों का कत्ल करने में भारत की पुलिस, न्याय प्रणाली ने ही अपना रोल नहीं निभाया है बल्कि खुद सामंती भूस्वामियों, जमींदारों का भी रोल रहा है। कई हजार किसान इन ताकतों ने कत्ल कर दिये। पुलिस की गोली से कभी कहीं, कभी कहीं किसान मारे जाते रहे हैं। आजाद भारत में नये शासकों और उनकी राजसत्ता के निशाने पर गरीब किसानों के साथ अन्य शोषित-उत्पीड़ित भी हमेशा से रहे हैं।
भारत की जनजातियां (ट्राइब्स) या आदिवासी ऐसे ही उत्पीड़ित-शोषित समुदाय रहे हैं। इनसे (खासकर इसके कुछ धनवान लोगों को छोड़कर) भी ऐसा ही व्यवहार नये शासकों का रहा है। मध्य पूर्व भारत के आदिवासियों का गोरे अंग्रेजों से जो संघर्ष अठाहरवीं सदी के साथ शुरू हुआ था वह काले अंग्रेजों के राज में आज तक जारी है। प्रति वर्ष सैकड़ों की संख्या में आदिवासी नक्सलवाद और माओवाद के दमन में मारे जाते रहे हैं। और खुद नक्सल आंदोलन के दमन के नाम पर साठ-सत्तर के दशक से अब तक हजारों नौजवान मारे जा चुके हैं।
ऐसी ही कुछ स्थिति उन उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं की रही है जो भारतीय राजसत्ता से संघर्षरत रहे हैं। कश्मीरी, नगा, मणिपुरी, मिजो, बोड़ो, कुकी आदि, आदि लोगों के संघर्ष के दमन में मारे गये लोगों की संख्या भी हजारों में है। ‘आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट’ के तहत सेना को मिले असीमित अधिकारों का उपयोग, इन उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के दमन में खुल कर किया गया। अकेले कश्मीर में हाल के दशकों में मारे गये लोगों की संख्या हजारों में है।
आतंकवाद के दमन के नाम पर अस्सी के दशक में पंजाब में पुलिस और सेना ने जो कत्लेआम मचाया था उसकी स्मृतियां अभी भी पंजाब में मिटी नहीं हैं। पहले अकाली आंदोलन में फूट डालने के लिए भिण्डारवाले का इस्तेमाल हुआ और फिर उसके खालिस्तानी आंदोलन का दमन, सैकड़ों निर्दोष नौजवानों की मौत का कारण बन गया।
आतंकवाद के नाम पर भारत के कई-कई राज्यों में मुसलमानों को निशाना बनाया गया। सैकड़ों की संख्या में निर्दोष मुसलमान युवाओं को जेलों में ठूंसा गया और कईयों को पुलिस की गोलियों से भून डाला गया। राज्य समर्थित और शासक वर्गीय पार्टियों द्वारा खासकर हिन्दू फासीवादियों के द्वारा प्रायोजित दंगों में मारे गये लोगों की संख्या भी कम नहीं है।
आजाद भारत में समय-समय पर अलग प्रांत बनाने की मांग उठती रही है। इन प्रांतों की मांगों के समर्थन में उतरे लोगों का कम कत्लेआम नहीं हुआ है। तेलंगाना, झारखण्ड, उत्तराखण्ड आदि आदि राज्यों के निर्माण के लिए चले आंदोलनों में सैकड़ों लोग मारे गये।
कुल मिलाकर देखें तो जैसे ब्रिटिश राजसत्ता भारतीयों के रक्त से जिन्दा रही थी, ठीक उसी तरह आजाद भारत की राजसत्ता भी भारत के शोषित-उत्पीड़ितों के रक्त से ही जिन्दा है। भले ही शासक हमेशा सफेदपोश रहे हों परन्तु उनके कपड़ों से ही नहीं सेना-पुलिस-अफसरों-जजों की वर्दियों से भी खून की बदबू आती है।
सच तो यही है कि यह सिर्फ भारत की बात नहीं बल्कि हर देश में पूंजीपति वर्ग सत्ता में बने रहने के लिए इसी तरह रक्तपात का सहारा लेता है। अपने आपको सबसे सभ्य कहने वाले देशों का इतिहास भी ऐसा ही है। चाहे वह फ्रांस हो, या फिर ब्रिटेन या फिर संयुक्त राज्य अमेरिका हो।
पूंजीवादी राजसत्ता को जिन्दा रहने के लिए हर हमेशा मजदूरों सहित शोषित उत्पीड़ितों का गर्म रक्त चाहिए। अगर इस सबसे हमें मुक्ति चाहिए तो हमारे पास एक ही रास्ता है मजदूरों-किसानों का राज कायम करें। पूंजीवादी राजसत्ता को किनारे लगायें और समाजवाद कायम करें।