4 दिसम्बर, 2025 को अमरीका ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का दस्तावेज पेश किया है। इस दस्तावेज में ट्रम्प को शांति दूत के तौर पर पेश करते हुए यह दावा किया गया है कि उन्होंने दुनिया के संघर्षरत देशों के बीच आठ समझौते कराकर क्षेत्रीय युद्धों को रुकवा दिया है। इसमें भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध को रुकवाने में उनकी भूमिका का भी दावा किया गया है। इस दस्तावेज में बहुत निर्लज्जतापूर्वक ‘‘अमरीका प्रथम’’ की योजना का खुलासा किया गया है और दुनिया भर के सहयोगी शासकों और साझीदारों को अमरीकी प्रभुत्व को बचाने के मकसद से धमकी और लालच दोनों का सहारा लिया गया है। प्रतिद्वन्द्वी साम्राज्यवादी शक्तियों- रूस और चीन- के बीच दरार डालने की कोशिश की गयी है।
जहां एक ओर ट्रम्प अपने को शांतिदूत के रूप में पेश करते हैं, वहीं इसके विपरीत अमरीका का रक्षा बजट बढ़ाकर रिकार्ड स्तर पर 901 अरब डालर तक पहुंचा देते हैं। इस नयी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति की विशेषता जो सर्वोपरि नजर आती है वह यह है कि यह पश्चिमी गोलार्ध को अमरीका का एक मात्र प्रभाव क्षेत्र बनाये रखने की घोषणा करती है। यह 1823 में मुनरो सिद्धान्त की ‘‘ट्रम्प कोरोलरी’’ के रूप में अपने को पेश करती है।
यह दस्तावेज पश्चिमी गोलार्ध पर बहुत अधिक जोर देता है और समूचे मध्य व दक्षिणी अमरीकी महाद्वीप को मुख्य रूप से अमरीकी साम्राज्यवादी हितों को केन्द्र में रखकर पेश करता है।
इस दस्तावेज में कहा गया है कि ‘‘सीमा सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा का प्राथमिक तत्व है’’। यहां चीनी साम्राज्यवादियों के लातिन अमरीका में बढ़ते प्रभाव को रोकने का अप्रत्यक्ष रूप से जिक्र है।
इस दृष्टिकोण को लागू करने के लिए अमरीकी साम्राज्यवादी लातिन अमरीका की दक्षिणपंथी सरकारों के साथ गठबंधन बनाकर, प्रवासन को नियंत्रित करने का प्रयास करेंगे। मादक पदार्थों की तस्करी को रोकने के नाम पर मनमाने तरीके से ‘ड्रग कार्टेलों’ के विरुद्ध एक झूठी लड़ाई के जरिए अपने से असहमत सरकारों का तख्तापलट कराने की कोशिश की जायेगी।
अमरीकी साम्राज्यवादी पहले से ही इस क्षेत्र में भारी सैनिक तैनाती किए हुए हैं और अब दस्तावेज के मुताबिक, दुनिया के अन्य क्षेत्रों से अपने सैनिकों को लाकर कैरेबियन सागर और प्रशांत महासागर को वे और ज्यादा सैन्यीकृत कर रहे हैं। वे वेनेजुएला में मादुरो सरकार का तख्तापलट करने की कोशिश कर रहे हैं। वे होण्डूरास के चुनावों में दखल देकर दक्षिणपंथी प्रत्याशी को जिताने में हस्तक्षेप कर रहे हैं। एक तरफ, वे वेनेजुएला में राष्ट्रपति मादुरो द्वारा ड्रग कार्टेलों की मदद करने का बहाना बनाकर उनका तख्तापलट कराने में लगे हैं वहीं दूसरी तरफ होण्डूरास के ड्रग माफिया पूर्व राष्ट्रपति को अमरीकी न्यायालय द्वारा दी गयी 45 वर्ष की सजा को माफ कर दिया गया है। अभी हाल ही में, अमरीकी साम्राज्यवादियों ने वेनेजुएला पर आक्रमण करने के लिए उसके तट पर सैनिकों की तैनाती की है। अभी तक, पिछले लगभग तीन महीनों में वेनेजुएला की नौकाओं पर हमले करके 87 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। वेनेजुएला के एक बड़े तेलवाहक जहाज पर कब्जा कर लिया गया। यह विशुद्ध रूप से समुद्री डकैती है। अमरीकी साम्राज्यवादी लातिन अमरीकी देशों पर अपना प्रभुत्व बनाये रखने के लिए तख्तापलट, आर्थिक नाकेबंदी और युद्ध की धमकी का सहारा ले रहे हैं। वैसे तो वे इस इलाके में लम्बे समय से यह सब कर रहे थे। लेकिन अब नयी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में इसे संहिताबद्ध करके खुलेआम ऐलान के साथ बेशर्मीपूर्ण तरीके से किया जा रहा है।
लातिन अमरीकी देशों पर चीनी साम्राज्यवादियों के बढ़ते आर्थिक प्रभाव से चिंतित अमरीकी साम्राज्यवादी बौखला कर इस पूरे क्षेत्र पर अपना एकछत्र प्रभुत्व स्थापित करना चाहते हैं। चीनी और रूसी साम्राज्यवादियों के सहयोगी इस क्षेत्र के कुछ देश हैं जो अमरीकी साम्राज्यवादियों की आंख की किरकिरी बने हुए हैं।
जहां तक चीनी साम्राज्यवादियों से मिल रही चुनौतियों से निपटने की बात है, वहां यह दस्तावेज पुरानी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति से इस मामले में भिन्न है कि यह अब चीन को दीर्घकाल तक अपना प्रमुख दुश्मन नहीं घोषित करता। न ही उसे अमरीकी हितों के लिए मुख्य खतरा घोषित करता। यह चीन के साथ व्यापार युद्ध में मुख्य तौर पर अपने को केन्द्रित करता है। ताइवान के मुद्दे और दक्षिण चीन सागर में जहाजों की आवाजाही और आपूर्ति श्रंखला के सवाल पर यह चीन के साथ अभी भी टकराव में है। हिन्द प्रशांत क्षेत्र में अपने प्रभुत्व को बनाये रखने में यह पूर्वी एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों से चीन से निपटने में और ज्यादा हिस्सेदारी की मांग करता है। यह दस्तावेज कहता है कि क्षेत्रीय देश चीन के विरुद्ध ज्यादा सैन्य और अन्य तैयारी करें। यह हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में चीन के विरुद्ध भारत की एक सकारात्मक भूमिका देखता है। यह भारत के विवादों का इस्तेमाल करते हुए चीन की घेरेबंदी करने में उसकी भूमिका को देखता है। अमरीकी शासक यह देख चुके हैं कि उनकी टैरिफ नीति आम तौर पर असफल सिद्ध हुई है और अमरीका के इस टैरिफ युद्ध ने चीन को कोई विशेष नुकसान नहीं पहुंचाया। चीन का व्यापार अधिशेष इस वर्ष 10 खरब डालर से ऊपर पहुंच गया है। इसलिए अमरीकी साम्राज्यवादी अब चीन के साथ व्यापार और आर्थिक क्षेत्र में प्रतिद्वन्द्विता करने की योजना पर काम कर रहे हैं इस दस्तावेज में चीन के साथ सैन्य टकराव की चर्चा बहुत कम है।
जहां तक रूसी साम्राज्यवादियों के साथ ताल्लुक है, इस दस्तावेज में यह लगभग स्वीकार कर लिया गया है कि रूस-यूक्रेन युद्ध में अमरीकी साम्राज्यवादियों की पराजय हो चुकी है। यह युद्ध अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा रूस के विरुद्ध छेड़ा गया एक छद्म युद्ध था। ट्रम्प ने इसका दोष अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपति जो बाइडेन पर डाल दिया। अब ट्रम्प इस तथ्य को स्वीकार कर चुके हैं कि इस युद्ध में रूस जीत चुका है और वह यूक्रेन की सत्ता पर इस बात का दबाव बना रहे हैं कि क्रीमिया और दोनबास के क्षेत्र को वह रूस को देना स्वीकार कर ले। अपनी नाटो की सदस्यता की आकांक्षा को त्याग दे और अपनी सेनाओं की संख्या में कमी करे। यह सीधे-सीधे रूसी साम्राज्यवादियों की जीत को स्वीकार करना है। यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेन्स्की अभी तक इससे सहमत नहीं हैं। उसके यूरोपीय संघ और नाटो के सहयोगी ट्रम्प के इस समझौते प्रस्ताव से पूरी तौर पर सहमत नहीं हैं।
इस दस्तावेज में यूरोपीय संघ के बारे में ज्यादा कठोर बातें कही गयी हैं। इसमें कहा गया है कि यूरोपीय संघ का गठन अमरीका के विरोध में किया गया था। ट्रम्प नाटो के यूरोपीय संघ के देशों से मांग करते हैं कि वे अपने रक्षा बजट को अपने सकल घरेलू उत्पाद के 5 प्रतिशत तक बढ़ायें। ट्रम्प प्रशासन यूरोपीय संघ के देशों को रूस-यूक्रेन समझौता वार्ता से किनारे लगा चुके हैं। इससे भी यूरोपीय संघ के देश अमरीकी साम्राज्यवादियों से नाराज हैं। इस नयी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में यूरोपीय संघ की तबाही और गिरावट के लिए उनको ही दोषी ठहराया गया है। यूरोपीय देशों की आव्रजन नीति उनके लिए सभ्यता के पतन का कारण है, ऐसा यह दस्तावेज कहता है। अमरीकी साम्राज्यवादी यूरोप के देशों में धुर दक्षिणपंथी पार्टियों का समर्थन करते हैं, इससे भी यूरोपीय संघ के देश अमरीकी साम्राज्यवादियों से नाखुश हैं। लेकिन वे अमरीकी साम्राज्यवादियों की सैन्य ताकत पर अभी तक निर्भर थे। अमरीकी साम्राज्यवादियों के सरगना ट्रम्प को यह लग रहा है कि अमरीका नाटो का ज्यादा बोझ उठाकर अपना नुकसान कर रहा है। इसलिए वह अब नाटो के अन्य देशों को और ज्यादा खर्च वहन करने पर जोर देते हैं। यदि नाटो के देश अपना सैन्य खर्च बढ़ाते हैं तो अमरीकी साम्राज्यवादियों के हथियारों की बिक्री बढ़ेगी। उसके सैनिक-औद्योगिक तंत्र का मुनाफा बढ़ेगा।
इस दस्तावेज में कहा गया है कि पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका के देशों का ऐतिहासिक महत्व तेल और ऊर्जा के स्रोत के बतौर था। आज अमरीका के पास प्रचुर तेल और गैस भण्डार है। अब इस क्षेत्र का महत्व जहाजों के पारगमन के लिए है, इस क्षेत्र के सम्पन्न देशों का हित अमरीका के निवेश में है और इस क्षेत्र में इजरायल को केन्द्र में रखकर अपना दबदबा बनाये रखने में अमरीकी हित है। अमरीकी साम्राज्यवादियों और यहूदी नस्लवादी इजरायली हुकूमत इस क्षेत्र में भयावह तबाही-बर्बादी के लिए जिम्मेदार रही है। इराक, सीरिया, लीबिया इत्यादि में तबाही-तख्तापलट व युद्ध के लिए वे जिम्मेदार रहे हैं। आज ईरान की सत्ता अमरीकी साम्राज्यवादियों की आंख की किरकिरी बनी हुई है। इस क्षेत्र में रूसी और चीनी साम्राज्यवादियों से प्रतिस्पर्धा में अमरीकी साम्राज्यवादियों की बढ़त बनी हुई है। लेकिन उसको इन साम्राज्यवादियों से चुनौती भी मिल रही है। इस क्षेत्र की सत्तायें अब अमरीकी साम्राज्यवादियों की जी-हजूरी नहीं कर रही हैं। वे अपने स्वार्थों के मद्देनजर दुनिया भर में गठबंधन बनाने की कोशिशें कर रही हैं। इसके साथ ही अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ रिश्ते रख रही हैं इस दस्तावेज में इजरायल द्वारा गाजापट्टी के किये जा रहे नरसंहार और महाविनाश की चर्चा नहीं है। न ही लेबनान में हिजबुल्ला प्रतिरोध आंदोलन या यमन की चर्चा है। सीरिया में असद की सत्ता समाप्त होने के बाद से इजरायल द्वारा गोलन पहाड़ियों से इतर सीरिया के दक्षिणी हिस्से पर कब्जा करने और रोज ब रोज हमला करने की नाममात्र की चर्चा है।
अफ्रीकी महाद्वीप का जिक्र भयावह गरीबी और आपसी युद्धों में उलझे रहने के बतौर है। अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी पीठ इस बात पर थपथपाते हैं कि उन्होंने अफ्रीकी महाद्वीप के देशों के बीच चलने वाले युद्धों को रुकवाया। लेकिन ये युद्ध और झड़पें अभी भी जारी हैं। अमरीकी और अन्य साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच इस क्षेत्र की खनिज सम्पदा और साधन स्रोतों के लिए संघर्ष चल रहे हैं। ये दिनों-दिन तीव्र होते जा रहे हैं।
इस दस्तावेज में जिस बात का यदा-कदा जिक्र किया गया है, वह है विश्वव्यापी पैमाने पर दुर्लभ मृदा सहित प्राकृतिक संसाधनों की लूट के लिए साम्राज्यवादी देशों के बीच चलने वाली प्रतिस्पर्धा और इसके लिए टकराहटें। अमरीकी साम्राज्यवादी दुर्लभ मृदा के मामले में चीनी साम्राज्यवादियों से पीछे हैं। आज दुर्लभ मृदा और उसके प्रसंस्करण के मामले में चीनी साम्राज्यवादियों का लगभग एकाधिकार है। ये दुर्लभ मृदा तत्व आधुनिक हथियारों, मिसाइलों, ड्रोनों से लेकर हवाई जहाज, कारों आदि में बहुत जरूरी हैं और यहीं अमरीकी चीनी साम्राज्यवादियों से मात खा रहे हैं। बैटरी उत्पादन और सेमीकण्डक्टर के मामले में चीन काफी आगे है।
अमरीकी साम्राज्यवादियों की यह राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति किसी न किसी रूप में इस बदलते विश्व की एक हकीकत को स्वीकार करती है। लेकिन यह विकृत स्वीकारोक्ति है। अमरीकी व अन्य साम्राज्यवादियों के बीच प्राकृतिक साधन स्रोतों पर कब्जे के लिए संघर्ष और इससे उत्पन्न होने वाली राजनीतिक व सैनिक टकराहटें बढ़ रही हैं। अब द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का शीत युद्ध काल समाप्त हो गया है। सोवियत संघ के विघटन के बाद बनी अमरीकी वर्चस्व वाली दुनिया भी नहीं रह गयी है। आज समूची दुनिया साम्राज्यवादी व पूंजीवादी दुनिया है। एक तरफ अमरीकी साम्राज्यवादी हैं, जो आज भी दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक व सामरिक ताकत हैं और दूसरी तरफ, चीनी और रूसी साम्राज्यवादी हैं। इसमें चीनी साम्राज्यवादी दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत हैं और यह उभरती हुई साम्राज्यवादी शक्ति है। रूसी साम्राज्यवादी आर्थिक तौर पर अपेक्षतया काफी कमजोर हैं लेकिन सामरिक ताकत के तौर पर एक बड़ी ताकत हैं।
यूरोपीय साम्राज्यवादी देश इस समय कमजोर स्थिति में है। वे अभी तक अमरीकी साम्राज्यवादियों के सहयोगियों के बतौर प्रभावशाली थे। अब यूक्रेन के मामले में वे अमरीकी साम्राज्यवादियों से मतभेद रखते हैं। वे अभी भी यूक्रेन को रूस के विरुद्ध युद्ध में विजयी होता देखना चाहते हैं। इस मामले में वे रूस विरोधी बने हुए हैं। जापानी साम्राज्यवादी अब वैश्विक शक्ति के बजाय एक क्षेत्रीय शक्ति बने हुए हैं और वह भी अमरीकी साम्राज्यवादियों के पीछे चलकर ही कोई प्रभाव रखते हैं। अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले देश हैं जो कभी उपनिवेश या आश्रित देश थे। वे अब राजनीतिक तौर पर आजाद देश हैं। लेकिन साम्राज्यवादी दबाव व नियंत्रण की कोशिशों का सामना कर रहे हैं। ये देश क्षेत्रीय संगठन कायम कर रहे हैं। चीनी और रूसी साम्राज्यवादी इन संगठनों के निर्माण में महत्वपूर्ण, कभी-कभी निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। अमरीकी साम्राज्यवादियों से प्रतिस्पर्धा में चीनी और रूसी साम्राज्यवादियों का यह गठबंधन महत्वपूर्ण ताकत बनता है। ये गठबंधन भी विभिन्न पूंजीवादी ताकतों के बीच के गठबंधन हैं। ये कोई साम्राज्यवाद-पूंजीवाद विरोधी गठबंधन नहीं हैं। यही बदलती हुई दुनिया है। इसी का विकृत प्रतिबिम्ब अमरीकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में प्रतिबिम्बित होता है।