युद्ध-अर्थव्यवस्था और जनता

Published
Mon, 03/16/2026 - 07:02
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पहले से ही 4 वर्ष से रूस-यूक्रेन युद्ध की मार झेल रही विश्व अर्थव्यवस्था अब ईरान युद्ध के साथ नये खतरों का सामना कर रही है। ईरान युद्ध का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव अधिक त्वरित और व्यापक है। अर्थव्यवस्था पर दबाव के साथ ही जनता के जीवन में दुश्वारियां पूरी दुनिया के पैमाने पर दिखायी पड़ रही हैं। 
    
मध्य-पूर्व के तेल-गैस के बड़े निर्यातक होने के चलते इसकी आपूर्ति में पैदा हुई बाधा दुनिया भर की अर्थव्यवस्था पर एक झटके में असर पैदा करने की क्षमता रखती है। ईरान द्वारा खाड़ी मुल्कों के तेल भण्डारों-संयंत्रों पर हमले व होरमुज जलडमरूमध्य के मार्ग की बंदी ने इस खतरे को वास्तविकता में बदल दिया है। साऊदी अरब से लेकर कतर तक ने तेल निर्यात के मामले में आपात स्थिति की घोषणा कर अपने वैश्विक करारों से हाथ पीछे खींच लिये हैं। परिणामतः युद्ध के चंद दिनों में ही तेल की कीमत 40 प्रतिशत उछलकर 100 डालर प्रति बैरल के पार जा चुकी है और अगर युद्ध कुछ हफ्ते और चलता है तो इनके 200 डालर प्रति बैरल के पार जाने की संभावना जतायी जा रही है। 
    
मजेदार तथ्य यह है कि कभी रूस से तेल खरीद पर टैरिफ थोपने की धमकी देने वाले ट्रम्प अब खुद चाह रहे हैं कि दुनिया रूसी तेल खरीदे। ताकि दुनिया में तेल सप्लाई के बाधित होने से पैदा होने वाली उथल-पुथल रुक सके। ट्रम्प की इस छूट पर यूक्रेन व यूरोपीय साम्राज्यवादी नाराज हैं क्योंकि इससे वे रूसी साम्राज्यवादियों को मजबूत होता देख रहे हैं। इतिहास में तेल की सप्लाई का यह सबसे बड़ा संकट कहा जा रहा है। 
    
होरमुज जलडमरूमध्य से तेल-गैस के 20 प्रतिशत व्यापार के बाधित होने का असर चौतरफा पड़ने की उम्मीद है। फर्टिलाइजरों के आयात में कमी व प्राकृतिक गैस की कमी के चलते इसके उत्पादन में कमी की उम्मीद है। दुनिया भर के प्रमुख शेयर बाजार हर रोज बड़ी-बड़ी गिरावटों का सामना कर रहे हैं। ट्रम्प द्वारा जल्द युद्ध खत्म होने की उम्मीद शेयर बाजार एक दिन चढ़ाती है पर अगले दिन फिर वे नीचे गिर जाते हैं। महंगाई में वैश्विक पैमाने पर बढ़ोत्तरी की सूचनायें आ रही हैं। 
    
खाड़ी देश तेल निर्यात न कर पाने के चलते अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट को अभिशप्त हैं तो ईरानी अर्थव्यवस्था युद्ध के चलते तबाह हाल हो चुकी है। भारत व दक्षिण एशिया तथा एशिया के तमाम छोटे-बड़े तेल आयातक देश तेल-गैस की किल्लत से तमाम चीजों के उत्पादन में गिरती के साथ इनकी खरीद में अधिक विदेशी मुद्रा भुगतान की समस्या का सामना कर रहे हैं। दक्षिण एशिया के तमाम देश खाड़ी मुल्कों में बसे अपने प्रवासियों से हर वर्ष आने वाली अरबों डालर की रकम में भारी गिरावट की संभावना देख रहे हैं। यह उनके विदेशी मुद्रा भण्डार पर दबाव बढ़ा रहा है। 
    
मध्य पूर्व में चीन, भारत, जापान, द.कोरिया को तेल का 75 प्रतिशत व प्राकृतिक गैस का 59 प्रतिशत निर्यात होता है। इन सभी की अर्थव्यवस्थायें तेल-गैस की कमी का सामना कर रही हैं। जगह-जगह होटल-रेस्टोरेंट-पर्यटन-उत्पादन सब प्रभावित हो रहा है। इस तरह दुनिया भर की अर्थव्यवस्थायें इस युद्ध से नकारात्मक तौर पर प्रभावित हो रही हैं। केवल रूस ही इस युद्ध से लाभ की स्थिति में है। साथ ही कुछ अन्य तेल-गैस निर्यातक भी फायदे में हैं। अमेरिका भी अपने तमाम स्रोतों की वजह से अधिक संकट में नहीं है पर युद्ध जारी रहने पर उसकी अर्थव्यवस्था युद्ध के खर्च के चलते दबाव में आ जायेगी। इस तरह युद्ध का असर दुनिया के स्तर पर व्यापक है पर अलग-अलग देशों पर अलग-अलग है। जहां तक दुनिया की जनता का प्रश्न है तो वो युद्ध में चौतरफा तबाही-बर्बादी झेल रही है। 
    
भारत में सिलेण्डर की किल्लत की तस्वीर केवल भारत ही नहीं पूरे दक्षिण एशिया की आम तस्वीर है। श्रीलंका-बांग्लादेश-पाकिस्तान में तेल की कमी के चलते जनता चौतरफा मार झेल रही है। तेल व ऊर्जा बचाने के लिए तमाम दफ्तर ‘वर्क फ्राम होम’ अपनाने लगे हैं। वियतनाम से लेकर यूरोपीय देशों तक में प्राकृतिक गैस की कमी लोगों के जीवन को दूभर बना रही है। द.कोरिया को तो तेल कीमतों में वृद्धि पर सरकारी नियंत्रण की घोषणा करनी पड़ी। तमाम तेल आयातक देशों में तो पेट्रोल पम्पों पर व रसोई गैस पर राशनिंग लागू करनी पड़ रही है। 
    
होटल व्यवसाय बुरी तरह इन देशों में प्रभावित हुआ है। तैयार खाने की कीमतें बढ़ चुकी हैं। प्राकृतिक गैस पर चलने वाले उद्योग उत्पादन गिरा रहे हैं। ऊर्जा की कमी के चलते कई देशों में एयर कंडीशनर सरकारें बंद करवा रही है। कुल मिलाकर चौतरफा अफरा तफरी निकट भविष्य में दिखायी दे रही है। 
    
दक्षिण एशिया सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में से एक है। जनता की भारी बदहाली के बीच भी घरेलू तेल-गैस विक्रेता कंपनियां-बड़े पूंजीपति चांदी काट रहे हैं। वे महंगाई व अन्य तरीकों से युद्ध का सारा बोझ जनता पर डाल रहे हैं। और तो और कालाबाजारी व जमाखोरी कर लाभ भी कमा रहे हैं। शासक कुछ दिखावटी घोषणाएं कर युद्ध जल्द खत्म होने की आस लगाये बैठे हैं। दुनिया भर का मजदूर वर्ग सबसे अधिक शिकार बन रहा है। 
    
ऐसे में यह युद्ध वैश्विक स्तर पर मंदी की ओर दुनिया को धकेलने के साथ जनता के पहले से बदहाल जीवन को और नारकीय बनाने की संभावना लिये हुए है। हत्यारे ट्रम्प-नेतन्याहू के रक्तपिपासु कदमों को रोककर ही युद्ध रोका जा सकता है। साम्राज्यवाद का मुकम्मल नाश ही युद्ध रहित दुनिया बना सकता है। ऐसे में पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के विरोध में निर्णायक जंग छेड़कर ही जनता बेहतर भविष्य की ओर बढ़ सकती है। 

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