वेतन संहिता, 2019
चार नई श्रम संहिताओं में वेतन संहिता (The code on Wages) सबसे पहले कानून बनी थी। इसे 2019 में संसद के दोनों सदनों से पारित कर दिया गया था। तदनुरूप राष्ट्रपति महोदय द्वारा हस्ताक्षर की औपचारिकता को भी पूरा कर दिया गया था। मोदी सरकार द्वारा अब 21 नवंबर 2025 को वेतन संहिता सहित चारों श्रम संहिताओं के लागू होने की घोषणा की जा चुकी है।
वेतन संहिता के लागू होने के साथ वेतन भुगतान अधिनियम, 1936; न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948; बोनस भुगतान अधिनियम, 1965 और समान मजदूरी अधिनियम, 1976 का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया है, अर्थात इन चार श्रम कानूनों का स्थान वेतन संहिता ने ले लिया है। गौरतलब है कि ये चार श्रम कानून जब अस्तित्व में आये थे तब, खासकर पचास-साठ के दशक तक, अंतर्राष्ट्रीय वर्ग शक्ति संतुलन अभी मजदूर वर्ग के पक्ष में था और देश के भीतर मजदूर आंदोलन और ट्रेड यूनियन आंदोलन भी मजबूत स्थिति में था। लेकिन अब जब 2019 में वेतन संहिता पारित हुई और 2025 में लागू हुई तब अंतर्राष्ट्रीय वर्ग शक्ति संतुलन पूरी तरह मजदूर वर्ग के खिलाफ है और देश के भीतर भी मजदूर आंदोलन और ट्रेड यूनियन आंदोलन बेहद कमजोर स्थिति में है।
देश-दुनिया के तब और अब के हालात, इन चार श्रम कानूनों और अब इनका स्थान लेने वाली वेतन संहिता में बहुत साफ-साफ दृष्टिगोचर होते हैं। यहां सबसे पहले हम वेतन के निर्धारण को लेते हैं।
वेतन संहिता की धारा 2 (ल) के तहत अब वेतन के निर्धारण में यात्रा भत्ता, किसी विशेष कार्य के लिये भत्ता, मकान किराया भत्ता और कमीशन इत्यादि को शामिल नहीं किया जायेगा; कि वेतन निर्धारण में अब सिर्फ मूल वेतन और महंगाई भत्ता ही शामिल होगा। इसके अलावा किसी कंपनी के विलय, अधिग्रहण और पुनर्गठन की स्थिति में प्रतिधारण भत्ता भी वेतन में शामिल होगा। जबकि औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत यात्रा भत्ता, विशेष कार्य हेतु भत्ता, मकान किराया भत्ता और कमीशन इत्यादि को भी वेतन निर्धारण में शामिल किया जाता था।
सरकार का तर्क है कि इससे अब वेतन में एकरूपता आयेगी। जबकि सच्चाई यह है कि इससे एक तो, सामान्यतः ही वेतन में गिरावट आयेगी। दूसरे, प्रबंधन को औपचारिक तौर पर मजदूरों-कर्मचारियों का वेतन समान रखते हुये भी वास्तव में उनके बीच भेदभाव करने की खुली कानूनी छूट मिल जायेगी। क्योंकि भत्ते, कमीशन इत्यादि वेतन का हिस्सा न होने पर इन्हें प्रबंधन द्वारा सभी मजदूरों-कर्मचारियों को समान रूप से नहीं दिया जायेगा।
अब हम न्यूनतम वेतन के निर्धारण पर आते हैं। 1957 के भारतीय श्रम सम्मेलन के अनुसार न्यूनतम वेतन प्रति इकाई अर्थात 4 सदस्यों के एक परिवार के खाना-कपड़ा, मकान किराया, ईधन-बिजली एवं शिक्षा-स्वास्थ्य, शादी-ब्याह, बुढ़ापे में देख-रेख तथा त्यौहार-मनोरंजन इत्यादि के मद्देनजर तय किया जाना चाहिये। 1992 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी भारतीय श्रम सम्मेलन के इस मापदंड को सही घोषित किया था। यदि इस मापदंड का पालन किया जाये तो आज की महंगाई में न्यूनतम वेतन 30 हजार रु. महीना से अधिक बैठता है। जाहिर सी बात है कि भारत में कोई भी राज्य न्यूनतम वेतन के निर्धारण में इस मापदंड का पालन नहीं करता है। ज्यादातर राज्यों में न्यूनतम वेतन इसके एक-तिहाई से आधे तक ही अर्थात 10 से 15 हजार रु. महीने के बीच ही घोषित है; दिल्ली में यह लगभग 18 हजार रु. महीना घोषित है। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह घोषणा औपचारिक मात्र है और वास्तव में विभिन्न राज्यों के ज्यादातर फैक्टरी-संस्थानों में घोषित न्यूनतम वेतन नहीं मिलता है।
नई-नई घोषणायें करने के लिये मशहूर मोदी सरकार ने 2019 में वेतन संहिता के पारित होने के बाद ‘‘नेशनल फ्लोर वेज’’ की घोषणा की, कि इससे कम वेतन कोई नहीं देगा। और मोदी सरकार द्वारा 1957 के भारतीय श्रम सम्मेलन के मापदंड को त्यागते हुये और बिना किसी आधार के 178 रु. प्रतिदिन ‘‘नेशनल फ्लोर वेज’’ की घोषणा कर दी गई। मोदी सरकार द्वारा घोषित यह नेशनल फ्लोर वेज महज साढे पांच हजार रु. महीना बैठता है, जो कि इतना कम है कि इसे न्यूननतम वेतन नहीं बल्कि भुखमरी वेतन की ही संज्ञा दी जा सकती है।
हालांकि, वेतन संहिता के अभी दिसम्बर 2025 में जारी मसौदा नियमों में 1957 के भारतीय श्रम सम्मेलन के मापदंडों को औपचारिक तौर पर दोहराया गया है, लेकिन उसमें भी चालाकी करते हुये मकान किराया भत्ता को खाने-कपड़े के संयुक्त खर्च का मात्र 10 प्रतिशत ही तय किया गया है। यह हास्यास्पद है! यदि आज की भयंकर महंगाई में एक परिवार को जिंदा रखने के लिये खाने-कपड़े का न्यूनतम खर्च 8-10 हजार रु. महीना भी मान लिया जाये तो भला यह कैसे संभव है कि इसके 10 प्रतिशत अर्थात मात्र आठ सौ-एक हजार रु. महीना के खर्च पर एक परिवार के रहने योग्य किराये का मकान मिल जाये। औद्योगिक क्षेत्रों में आज एक दडबेनुमा कमरे का किराया, जिसमें एक परिवार के मानवीय गरिमा के साथ जीवन जीने की कल्पना भी नहीं की जा सकती, भी 4 हजार रु. महीना से कम नहीं है।
अंततः नियमावली किस रूप में सामने आती है यह आगे पता चलेगा, लेकिन इतना तय है कि अब न्यूनतम वेतन के निर्धारण का एक मापदंड वेतन संहिता की नियमावली में दर्ज होगा जबकि देश स्तर पर एक ‘‘फ्लोर वेज’’ भी होगा, और दोनों अलग-अलग होंगे। राज्यों द्वारा पहले की तरह आगे भी बेहद कम न्यूनतम वेतन, असल में भुखमरी वेतन, घोषित किया जाता रहेगा, लेकिन अब इसे ‘‘नेशनल फ्लोर वेज’’ का कानूनी अवलम्ब हासिल होगा।
गौरतलब है कि मनरेगा (अब जी राम जी) के तहत मिलने वाले न्यूनतम वेतन को इससे अलग रखा गया है। इसका कारण स्पष्ट है कि मनरेगा (जी राम जी) के तहत निर्धारित न्यूनतम वेतन राज्यों द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन से कम है। इसी तरह विभिन्न स्कीम वर्कर्स- आशा वर्कर, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता एवं भोजनमाताओं की इसमें कोई चर्चा नहीं है जिनसे खुद सरकार मामूली मानदेय पर बेगारी करा रही है।
वेतन संहिता 8 घंटे के कानूनी अधिकार पर भी चोट करती है। इसकी धारा-13 के अनुसार न्यूनतम वेतन निर्धारित होने के बाद संबंधित सरकार काम के घंटे निर्धारित कर सकती है, जो कि सामान्य कार्यदिवस माना जायेगा। अर्थात सरकार चाहे तो मजदूर का कार्यदिवस 10 घंटे, 12 घंटे अथवा इससे भी ज्यादा हो सकता है। गौरतलब है कि 8 घंटे कार्यदिवस का कानूनी अधिकार मई दिवस आंदोलन से सीधे जुड़ा है और ‘‘8 घंटे काम के, 8 घंटे आराम के और 8 घंटे मनोरंजन के’’ इस ऐतिहासिक आंदोलन के मजदूरों की घोषणा रही है, जो कि धीरे-धीरे पूरी दुनिया और हमारे देश में भी स्वीकार्य हुई और कानून बनी। लेकिन, वेतन संहिता में संबंधित सरकार को दी गई ताकत इसके उल्लंघन का आधार मुहैय्या करा देती है।
मजदूरों-कर्मचारियों के बीच लिंग के आधार पर वेतन में कोई भेदभाव न हो, इस घोषित उद्देश्य के साथ समान मजदूरी अधिनियम, 1976 लागू किया गया था। तब से अब तक 50 साल अर्थात आधी सदी बीत चुकी है लेकिन इस कानून की परिपालना हमेशा बेहद ही सीमित रही है। सरकारी संस्थानों और कुछेक बड़े निजी संस्थानों को छोड़कर देश में हर कहीं इस कानून का रोज उल्लंघन होता है। आज की स्थिति है कि ज्यादातर फैक्टरियों व अन्य संस्थानों में महिला मजदूरों- कर्मचारियों को पुरुषों की तुलना में आधे से दो-तिहाई तक ही वेतन मिलता है। ऐसा इसलिये कि आज भी भारतीय समाज में महिलाओं की आमदनी को परिवार की पूरक ही माना जाता है और मुख्य आमदनी पुरुष की ही मानी जाती है। इस पिछड़ी पितृसत्तात्मक सोच का पूंजीपति वर्ग जमकर फायदा उठाता है और महिला मजदूरों-कर्मचारियों का सस्ते श्रमिक के रूप में अतिशय शोषण कर भारी मुनाफा कमाता है।
वेतन संहिता में इस समान मजदूरी अधिनियम को धारा-3 में ‘‘लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध’’ शीर्षक में जितने संक्षेप में समाहित कर लिया गया है उससे मोदी सरकार की भावना स्पष्ट हो जाती है कि आगे भी लिंग के आधार पर वेतन में यह भेदभाव जारी रहेगा।
बोनस संदाय अधिनियम, 1965 भी अब वेतन संहिता में समाहित कर लिया गया है। लेकिन, इस समाहन के साथ इसमें एक बड़ा मजदूर विरोधी बदलाव भी कर दिया गया है। वेतन संहिता की धारा- 31 (3) के तहत अब केवल संबंधित अधिकारी ही कंपनी प्रबंधन को बैलेंस शीट दिखाने को कह सकता है। लेकिन वह भी प्रबंधन की सहमति के बिना मजदूरों अथवा उनकी यूनियन के सामने बैलेंस शीट का खुलासा नहीं कर सकता। जबकि पुराने कानून के तहत मजदूरों और उनकी यूनियन को कंपनी के खातों की जांच का अधिकार था। इस बदलाव का सीधा असर सालाना बोनस के अधिकार पर पड़ेगा। अब प्रबंधन के लिये यह संभव होगा कि वह लाभ होने पर भी घाटे का बहाना बनाकर अधिकतम बोनस पाने के अधिकार से मजदूरों को वंचित कर दे और उन्हें न्यूनतम बोनस पर समेट दे। इसी तरह जिन संस्थानों में मजदूर अनिवार्य न्यूनतम बोनस (T-shirt बोनस) ही हासिल कर पाते हैं वहां अब मालिक-प्रबंधन घाटे का बहाना बनाकर मजदूरों को इससे भी वंचित करने की कोशिश करेंगे। यहां यह ध्यान में रखना जरूरी है कि मजदूरों के बहुलांश ठेका और कैजुअल मजदूरों में से अधिकांश को पहले से ही कोई सालाना बोनस नहीं मिलता है।
इस तरह वेतन संहिता बीसवीं सदी में मजदूरों को हासिल अधिकारों और सहूलियतों पर हमला बोलती है। उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों के साथ जारी श्रम सुधारों का यही निहितार्थ भी है।