भारत का संकट

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इस वर्ष हमारे देश में जो-जो कुछ घटा (भारत-पाकिस्तान युद्ध, कथित आतंकवादी घटनाएं, पंजाब व अन्य राज्यों में बाढ़ से तबाही, गिरता रुपया, बढ़ती जाती बेरोजगारी व महंगाई आदि) उसके बाद शायद ही कोई कहेगा कि हमारा देश संकट में नहीं है। ये दीगर बात है कि कोई इस संकट को एक ढंग से बतायेगा तो कोई दूसरा इसे दूसरे ढंग से बतायेगा। संकट को जो जिस ढंग से बतायेगा ठीक उसी ढंग से उसका समाधान भी बतायेगा। 
    
मोटे तौर पर भारत के संकट को बताने, समझने व उसके समाधान के तीन नजरिये हैं। पहला नजरिया : पूंजीपति वर्ग का है जिसमें भारत के पूंजीपति वर्ग का एक तो वैश्विक पूंजीपति खासकर अमेरिकी-यूरोपीय का दूसरा है। दूसरा नजरियाः भारत के मध्यम वर्ग का है। इसमें शहरी व ग्रामीण मध्यम वर्ग के नजरियों में कुछ-कुछ फर्क है। और तीसरा नजरिया : भारत के मजदूर वर्ग का है। 
    
पहले नजरिये के हिसाब से भारत का संकट सख्त शासन व नीति के साथ आर्थिक सुधारों के तीव्र गति से लागू न होने (जिसमें निजीकरण से लेकर लचीले श्रम कानून तक शामिल हैं); उच्च कोटि के प्रशिक्षित श्रमिकों व प्रबंधकों का अभाव; सुरक्षित व त्वरित माल के आवागमन व परिवहन का अभाव; जड़ नौकरशाही; बार-बार चुनाव होने से उत्पन्न होने वाली बाधा व राजनैतिक ढांचे का अवरोध आदि, आदि हैं। इस नजरिये से समाधान क्या है? समाधान यह है पूंजी व मुनाफे की राह में खड़े सभी अवरोधों को तुरंत सख्ती से हटाया जाये। मजदूरों, किसानों, मध्यम वर्ग व कर्मचारियों की मांगों को एक ओर रखकर तेजी से आगे बढ़ा जाये। सरकार व राजसत्ता को सख्त रवैया अपनाते हुए पूंजी व मुनाफे के विकास में हर कदम उठाना चाहिए। भारत का संकट सिर्फ और सिर्फ इसी ढंग से हल हो सकता है। बाकी सब कुछ बकवास है। गलत है। जो कोई भी विरोध करता है वह राष्ट्र विरोधी, देश द्रोही, अरबन नक्सल या वामपंथी है। विदेशी पूंजीपति, देशी पूंजीपति से भी ज्यादा सख्ती व गति चाहते हैं। 
    
दूसरा नजरिया अधिकांश मामलों में पहले नजरिये से इत्तेफाक रखता है। बस उसकी समस्या यह है कि वह सरकार, राजसत्ता का साथ व संरक्षण चाहता है। उसकी मेहनत, उसकी प्रतिभा, उसकी क्षमता, उसके भविष्य के लिए जो कुछ सरकार व राज सत्ता को करना चाहिए वह नहीं करती है। वह या तो अमीरों का या फिर गरीबों का ख्याल रखती है। बेचारा! मध्यम वर्ग तो हर समय पिसता ही रहता है। वह मेहनत करता है, टैक्स देता है पर उसे क्या मिलता है। मध्यम वर्ग सोचता है कि उच्च वर्ग ऐश करता है। गरीब काम नहीं करना चाहते। बस वही मेहनत करता है। उसके कारण ही देश चलता है। अर्थव्यवस्था को गति मिलती है। भारत के संकट का समाधान क्या है? मध्य वर्ग के हिसाब से संकट का समाधान सबसे पहले राष्ट्र के हितों का ध्यान रखा जाए। और राष्ट्र के हितों का ध्यान रखने का मतलब मध्य वर्ग का ध्यान रखा जाए। उसका संकट ही राष्ट्र का संकट है और उसके संकट का समाधान ही राष्ट्र के संकट का समाधान है। शहरी और देहाती मध्य वर्ग में फर्क यह है कि देहाती मध्यवर्ग शहरी मध्यवर्ग से वही रिश्ता रखता है जो शहरी मध्य वर्ग उच्च वर्ग से रखता है। उसका अनुसरण, उसकी तरह बनना परन्तु उससे हर समय ईर्ष्या व घृणा करना। 
    
मजदूर वर्ग का नजरिया मूलतः इस बात पर निर्भर करता है कि वह सचेत है अथवा निष्क्रिय है। वर्ग सचेत मजदूर का एक नजरिया होता है तो निष्क्रिय मजदूर या तो अपने ऊपर के वर्ग के प्रति समर्पण भाव में अथवा भाग्यवादी होता है। उसका आप्त वाक्य होता है, ‘हम कर ही क्या सकते हैं?’ सचेत मजदूर जानता या समझता है कि भारत का संकट पूंजीवादी व्यवस्था का संकट है। यह संकट सरकार बदलने से हल नहीं होने वाला। यह संकट हल ही तब हो सकता है जब पूंजीवादी व्यवस्था के स्थान पर समाजवादी व्यवस्था कायम की जाए। और गर ऐसा नहीं होगा तो बर्बरता का राज होगा।  फासीवाद कायम होगा। वर्ग सचेत मजदूर इसलिए कहता है या तो बर्बरता या फिर सभ्यता। या तो फासीवाद या फिर समाजवाद।
    
भारत का उच्च वर्ग और मध्य वर्ग (खासकर शहरी हिन्दू मध्य वर्ग) का एक हिस्सा, चाहे-अनचाहे फासीवाद में (भारत के संदर्भ में हिन्दू फासीवाद में) भारत के संकट का समाधान देखता है, इसीलिए वह भाजपा-आर एस एस का प्रशंसक, अनुयायी व समर्थक है। इनको छोड़कर उच्च व मध्य वर्ग का जो हिस्सा बचता है वह यथास्थितिवादी, संविधानवादी, वामउदारवादी, बहुलतावादी आदि, आदि खेमों में बंटा है। ये नेहरू-अंबेडकर के प्रशंसक हैं। पुराने किस्म का लोक कल्याणकारी पूंजीवाद चाहते हैं। 
    
भारत का वर्ग सचेत मजदूर जानता है आज के भारत का संकट लोक कल्याणकारी पूंजीवाद नहीं हल कर सकता है। वह संकट को कुछ धीमा, कुछ समय के लिए टाल भर सकता है। संकट उसके बाद और घनीभूत होगा। वह वहीं ही पहुंचेगा, जहां पर फिर यह सवाल नाचेगा कि बर्बरता या सभ्यता। फासीवाद या समाजवाद। 
    
उच्च वर्ग या मध्य वर्ग भारत के संकट के चरित्र को अपने नजरिये के कारण ठीक ढंग से न तो समझ सकता है और न वह समझना चाहता है। भारत का वर्तमान संकट उस गहरे व स्थायी संकट की एक सतही अभिव्यक्ति भर है। बात कुछ और लगती है पर है कुछ और। 
    
मसलन भारत-पाकिस्तान के चार दिन के युद्ध की बात करें। जिस ढंग से यह युद्ध शुरू और खत्म हुआ वह यह बात बतलाने को पर्याप्त है कि संकट कुछ और है और वह कुछ और दिखता है। या दूसरे शब्दों में भारत और पाकिस्तान के शासक आज के अपने आंतरिक संकट को एक सीमित युद्ध के जरिये हल करना चाहते हैं। और ठीक इस युद्ध के जरिये अमेरिकी पूंजीपति अपने ही हित साधना चाहते हैं। युद्ध भले ही राष्ट्रवाद, देश की रक्षा-सुरक्षा व आतंकवाद के खात्मे के नाम पर लड़ा गया पर इस युद्ध का मकसद यह सब नहीं थे। भारत हो या पाकिस्तान के शासक दोनों ही नूरा कुश्ती लड़ रहे थे और अपने-अपने देश में अंधराष्ट्रवाद-सैन्यवाद के रथ पर सवार होकर देश के भीतर गहराते आर्थिक-सामाजिक संकट को और गहराते जाने से रोकना चाहते थे। युद्ध से न तो भारत का और न पाकिस्तान के शासकों का भला होना था और न हुआ। और जब लगने लगा युद्ध मामला और बिगाड़ देगा तब चुपचाप पीछे हट लिया गया। मौका मिला ट्रंप को युद्ध को खत्म करने का श्रेय लेने का। 
    
असल में दोनों ही देशों के आंतरिक हालात खराब हैं। भारत के कम पाकिस्तान के ज्यादा। गरीबी, बढ़ती असमानता, बेरोजगारी, बढ़ते सामाजिक तनाव, एक-दूसरे के यहां प्रायोजित आतंकवाद आदि समस्यायें बता रही हैं कि यहां संकट का चरित्र तात्कालिक नहीं दीर्घकालिक है। दोनों ही जगह व्यवस्था का स्थायी प्रकृति का संकट है। दोनों ही जगह सवाल वही नाच रहा है, बर्बरता या सभ्यता। 
    
भारत का सचेत मजदूर वर्ग भली-भांति जान रहा है यह संकट सिर्फ भारत या पाकिस्तान का नहीं विश्वव्यापी है। इस वर्ष की घटनाओं ने दिखला दिया कि पूरी दुनिया में इस संकट के कारण दो चीजें एक साथ घट रही हैं। एक ओर घोर दक्षिणपथी या फासीवादी ताकतें सत्ता में आ रही हैं। निरंकुशशाही बढ़ती जा रही है तो दूसरी ओर एक नये ढंग से बगावत पनप रही है। ‘जेन-जी’ के आक्रोश ने नेपाल, मेडागास्कर आदि देशों में सत्ता को धूल-धूसरित कर दिया। पूंजीवादी व्यवस्था का संकट एक साथ दो परिणाम पैदा कर रहा है। बर्बरता और सभ्यता की संभावनायें दोनों एक साथ मंडरा रही हैं। 
    
भारत सहित दुनिया के वर्ग सचेत मजदूर के हाथों में ही दुनिया का भविष्य और उसकी मुक्ति है। वह ही बर्बरता का खात्मा कर सभ्यता का उजाला फैला सकता है। इस संकट का चरित्र ही ऐसा है कि यह क्रांति से ही हल हो सकता है। बाकी सब नुस्खे हैं। और सारे नुस्खे बेकार हैं।

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