मुशरिक

Published
Mon, 03/16/2026 - 07:18
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‘‘सफर कैसा रहा?’’  ट्रे में पानी का गिलास पेश करते हुए बीवी ने जानना चाहा। ‘‘हम्म सफर में तो खैर रही। धागा बांध दिया है। देखें कब खुदा मुराद बक्शे। शायद मेरी इबादत में कोई कमी है।’’ कहकर खान साहब ने एक घूंट में पानी खत्म किया।
    
खान साहब के वालिद पुस्तैनी बढ़ई थे। अल्लाह ताला ने उन्हें चार औलादों से नवाजा था। बड़े पीर साहब के गहरे मुरीद थे। हर औलाद पर बड़े पीर साहब की दरगाह पर चादर चढ़ाई जाती। बड़े खान साहब के इंतकाल के बाद चादर चढ़ाने की रिवायत को चारों साहबजादों ने आगे बढ़ाया तो पुस्तैनी काम को सिर्फ तीन बेटों ने। सबसे छोटे मियां नजाकत खान इल्म हासिल कर वन विभाग में क्लर्क बनकर सरकार की खिदमत करने लगे। और पहली औलाद पैदा होने के बाद चादर चढ़ाने की पुश्तैनी रवायत में भी शामिल हो गए।
    
बड़े बेटे ने पुलिस की परीक्षा दी थी, आज मेरिट आने वाली है। सुबह से फोन पर बजने वाली हर दस्तक में खुशखबरी का इंतजार है कि शायद अल्लाह ताला ने मुराद सुन ली। लेकिन शाम को बाहर से आते हुए बेटे का मायूस चेहरा सब कुछ बयान कर गया। बेटे से कुछ भी पूछना फिलवक्त गैर वाजिब लगा।
    
‘‘सुबह से कुछ न खाया एक प्याला चाय का पीकर निकल गया था घर से। देखो तो कैसी हौलनाक शक्ल लग रही है। बेचारा मेरा लाल’’। शफकत अम्मी की जबान बोलते-बोलते भारी हो गई।
    
रात हो आई, खाने का वक्त है। कहां तो सोच के बैठे थे कि शाही कोरमे के जायकों का लुत्फ उठाया जाएगा मगर नसीब में आलू की तरकारी ही बदी है। या अल्लाह जैसी तेरी मर्जी। मन ही सोचते हुए धीरे से बेगम को आवाज देते हैं ‘‘जनाब को बुला लो कहीं ऐसा न हो भूखे पेट ही सो जाए।’’ ‘‘दिल छोटा न करो खुदा की रहमत जरूर होगी“। हिदायतों और उम्मीदों के साथ खाना खत्म हुआ।
    
क्या बात खान साहब सब खैरियत तो है? रमेश बाबू उम्र में खान साहब से काफी छोटे हैं। उर्दू बोलने के शौकीन हैं और अपनी जहनियत में नास्तिक हैं।
    
‘‘आज तबियत कुछ नासाज नजर आ रही है, सब खैरियत तो है।’’ रमेश बाबू ने जानना चाहा।
    
‘‘तबियत तो खैर है, मसला तो बेटे की सरकारी मुलाजिमियत का है।’’ कुछ देर की खामोशी। ‘‘लगता है खुदा नाराज है। तमाम मन्नतों के बाद भी वही मायूसी।’’
    
‘‘सरकारी नौकरी और लड़के के बीच खुदा की मर्जी! ये तो बेजां फरमाया आपने। नौकरियां सरकार खत्म करे और इल्जाम बेकसूर नसीब को मिले, ये तो कोई मुनासिब दलील न हुई।’’
    
‘‘मियां तुम तो हमेशा दलीलों की वकालत ही करो, नसीब में भी तो बरकत होनी चाहिए। हर कोई न बन जाए वरना सरकारी मुलाजिम। खैर तौबा करो। तुमसे तो तकरीरें करना ही फिजूल है।’’
    
‘‘खान साहब खुदा नाराज हुआ तो क्या हुआ हमारे भगवान के आगे माथा टेक आओ फिर देखो भगवान का आशीर्वाद’’। ये पंडित जी का कथन है जो खान साहब की तरफ मुखातिब हुए।
    
‘‘पंडित जी आप भी! आप तो जले पर नमक न छिड़कें। मैं तो हर दर पर चला जाऊं, बशर्ते मंजिल तो दिखे।
    
‘‘कांवड़ लेकर जल चढ़ा आओ फिर देखो कैसे भोले बाबा नहीं सुनते तुम्हारी।’’
    
‘‘ठीक है पंडित जी इस दफा आपकी सही। गर मेरिट में नाम आया बेटे का तो जल चढ़ाने कांवड़ लेकर जाऊंगा। दरगाह न सही शिवालय सही।’’ फिलवक्त सभी मुलाजिम काम पर जुट गए।
    
वक्त गुजरा और एक दिन बेटे ने खुशखबरी दी ‘‘पैसे दो अब्बू मुहल्ले वालों का मुंह मीठा करना है।’’
    
लंबे अरसे बाद परिवार में जश्न का माहौल था। देर रात गए खान साहब सोने की तैयारी करने लगे तभी ‘‘बिरादरी वाले क्या कहेंगे? ये तो गैर मजहबी काम है।’’ मिसेज खान को खान साहब के वादे का इल्म है।
    
‘‘दरगाह हो या मंदिर वादा तो निभाना पड़ेगा। बिला वजह दिमाग पर जोर न डालें कुछ न होगा। मुल्क में इतनी जहालत का दौर नहीं आया है अभी। जिन्हें अपने जहन को तकलीफ देनी है देने दो। कल पंडित जी से कांवड़ के एहतियात और जरूरत के सामान पर मशवरा लेना है अभी सो जाएं। आज खान साहब सुकून से सो गए हैं।
    
‘‘खान साहब सवाल खुदा की मर्जी का नहीं सरकार की मर्जी का है’’। रमेश बाबू ने मिठाई उठाते हुए कहा। ‘‘100 भूखे लोगों के आगे रोटी के दो निवाले फेंकने का जिम्मेदार खुदा कैसे हो सकता है?
खान साहब- ‘‘दुरुस्त फरमाया रमेश बाबू लेकिन नसीब भी तो कुछ होता है। खैर तौबा करो तुमसे तकरीरें करना मतलब नास्तिक बनने का जोखिम मोल लेना। खुदा बचाए तुम्हारी तकरीरों से।’’
    
इलहाद (नास्तिक) न सही पर जो काम खुदा न कर पाया उसे शरमाया दाराने निजाम ने जरूर कर दिखाया।
    
‘‘मतलब क्या है आपका?“ खान साहब का सवाल
    
‘‘सरकारी नौकरी के फेर ने आपको मुशरिक तो बना ही दिया।’’ कहकर रमेश बाबू मुस्कुरा दिए।              -पथिक
 

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