कौन कौवा, कौन गरुड़
‘कोई कौवा अगर मंदिर के शिखर पर बैठ जाए तो क्या वह गरुड बन जायेगा’ का जवाब कोई भी देगा। नहीं!
‘कोई कौवा अगर मंदिर के शिखर पर बैठ जाए तो क्या वह गरुड बन जायेगा’ का जवाब कोई भी देगा। नहीं!
पिछले सालों में हिन्दू फासीवादियों ने अपनी सरकार के खिलाफ होने वाले विरोध प्रदर्शनों से निपटने के लिए एक माडल विकसित किया है। इसमें वे किसी भी विरोध प्रदर्शन के खिलाफ अपन
भाजपा खासकर मोदी एवम् शाह ने यह उम्मीद नहीं की होगी कि ऐसा उनके साथ हो जायेगा। इक्कीसवीं सदी के ‘लौह पुरुष’ शाह के पुतले फूंके जायेंगे और उनकी तस्वीर को पांव से कुचला जाय
लगता है भारत की संघी सरकार ने बांग्लादेश के कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन जमात-ए-इस्लामी से हाथ मिला लिया है। मानो दोनों के बीच करार हो गया हो कि तुम बांग्लादेश में हिन्दुओं क
बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद 1991 में एक कानून पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम बना था। इस कानून के तहत प्रावधान किया गया था कि देश में सभी धार्मिक संरचनायें उसी रूप में
आजकल इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायधीश शेखर यादव काफी चर्चा में हैं। विश्व हिन्दू परिषद के कार्यक्रम में उनके द्वारा दिये गये भाषण का ही प्रताप है कि पूरे देश में उनकी चर्चा
आजकल हिन्दू फासीवादी हर मस्जिद-दरगाह में हिन्दुओं के मंदिर खोजने की जिस मुहिम में लगे हुए हैं उससे परेशान कुछ भलेमानस इसका मुकाबला करने के लिए हिन्दू फासीवादियों के मुखिय
एक महाशय हैं जो अपनी उम्र की चौथी अवस्था में प्रवेश कर चुके हैं। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार देखा जाए तो उनके सन्यास लेने की उम्र हो गयी है। महाशय ने ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और
मणिपुर में शांति स्थापित हो चुकने के सरकारी दावों की पोल खोलते हुए नवंबर माह में यहां फिर से हिंसा भड़क उठी। मणिपुर का बहुसंख्यक मैतेई समुदाय और अल्पसंख्यक कुकी समुदाय दोन
कहा जाता है कि लोगों को वैसी ही सरकार मिलती है जिसके वे लायक होते हैं। इसी का दूसरा रूप यह है कि लोगों के वैसे ही नायक होते हैं जैसा कि लोग खुद होते हैं। लोग भीतर से जैसे होते हैं, उनका नायक बाहर से वैसा ही होता है। इंसान ने अपने ईश्वर की अपने ही रूप में कल्पना की। इसी तरह नायक भी लोगों के अंतर्मन के मूर्त रूप होते हैं। यदि मोदी, ट्रंप या नेतन्याहू नायक हैं तो इसलिए कि उनके समर्थक भी भीतर से वैसे ही हैं। मोदी, ट्रंप और नेतन्याहू का मानव द्वेष, खून-पिपासा और सत्ता के लिए कुछ भी कर गुजरने की प्रवृत्ति लोगों की इसी तरह की भावनाओं की अभिव्यक्ति मात्र है।
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।