सम्भल हिंसा : 5 लोगों की मौत, जिम्मेदार कौन
24 नवंबर को मुरादाबाद के सम्भल में जामा मस्जिद में सर्वे के दौरान हिंसा भड़क उठी और इस हिंसा में 5 लोगों की मौत हो गयी। इस हिंसा के बाद एक बार फिर मुसलमान समुदाय को हिंसा
24 नवंबर को मुरादाबाद के सम्भल में जामा मस्जिद में सर्वे के दौरान हिंसा भड़क उठी और इस हिंसा में 5 लोगों की मौत हो गयी। इस हिंसा के बाद एक बार फिर मुसलमान समुदाय को हिंसा
अपने देश में पिछले कुछ सालों से लगातार आरोप लग रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पूंजीपति गौतम अडाणी के बीच यारी है। कि 2002 से अब तक अडाणी के लगातार बड़े से बड़े बनत
25 नवम्बर को भारत के उच्चतम न्यायालय ने उन याचिकाओं को खारिज कर दिया जिनमें भारत के संविधान की प्रस्तावना में इंदिरा गांधी के जमाने में संशोधन को चुनौती दी गयी थी। ‘‘42वे
आखिरकार पुराने ‘मी लार्ड’ की विदाई हो गयी। जाते-जाते उन्होंने अपना दर्द बयां किया। उन्हें इस बात की चिंता हो रही थी कि इतिहास उन्हें किस तरह याद करेगा। अब नए मी लार्ड यान
बीते लगभग सवा वर्ष से अधिक समय से सुलग रहे मणिपुर में नये सिरे से हिंसा भड़कने की खबरें आ रही हैं। इस बार हिंसा का केन्द्र जिरिबाम जिला बना है। ताजा सिरे से भड़की हिंसा की
देश के भीतर फकीर मोदी ने इस साल चुनाव से पहले ही खुद को अजैवीय महसूस किया था। अपनी इस अलौकिकता का एहसास जब प्रधान सेवक मोदी को हुआ तो उन्होंने भूलोक के समस्त वासियों को ब
कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक मुकदमे के सम्बन्ध में एक फैसला दिया जिसको सुनकर फासीवादी अत्यन्त प्रसन्न हो गये होंगे। यह मुकदमा था मस्जिद में दो व्यक्तियों द्वारा ‘‘जय श्री राम’’
भारत के बारे में आज आपस में टकरा रहे विचार कोई नये नहीं हैं। कम से कम एक शताब्दी से तो ये विद्यमान हैं ही। इन्हें मूलतः तीन श्रेणियों में रखा जा सकता है। ये हैंः पूंजीपति वर्ग के वर्चस्व वाला धर्मनिरपेक्ष पूंजीवादी भारत, मजदूर वर्ग के वर्चस्व वाला समाजवादी भारत और सवर्ण वर्चस्व वाला हिन्दू राष्ट्र। इसके प्रमुख प्रतिनिधि क्रमशः कांग्रेस पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी और संघ परिवार रहे हैं। जहां भगतसिंह दूसरी श्रेणी में आते हैं वहीं हिन्दू महासभा और आर्य समाज, इत्यादि तीसरी श्रेणी में।
हरिशंकर परसाई का एक व्यंग्य है- वैष्णव की फिसलन। इसमें एक ऐसे व्यवसाई की कथा है जो पर्याप्त धार्मिक व्यक्ति है। वह एक पांच सितारा होटल खोल लेता है और फिर ग्राहकों की मांग
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।