भारत बना हत्यारे इजरायल का सहयोगी

Published
Sun, 03/01/2026 - 08:01
/bharat-bana-hatyaare-izrail-ka-sahayogi

मोदी की इजरायल यात्रा

प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी इजरायली यात्रा के दौरान वहां की संसद में घोषित कर दिया कि इजरायल पितृभूमि है और भारत मातृभूमि है। उनकी इस घोषणा का पूरे देश में विरोध होने लगा। इस घोषणा के साथ ही इजरायल से सहयोग बढ़ाने में जुटे भारतीय शासकों ने प्रकारान्तर से बता दिया कि फिलिस्तीनी मुक्ति से अब उनका कोई लेना-देना नहीं रह गया है कि वह हजारों फिलिस्तीनियों के कत्लेआम के गुनहगार हत्यारे इजरायल के दृढ़ सहयोगी बन चुके हैं। 
    
मोदी का नेतन्याहू से यह प्रेमालाप काफी पहले से ही शुरू हो चुका है। कश्मीरी संघर्ष को कुचलने, मध्य भारत में आदिवासी संघर्ष को कुचलने में इजरायल से भारतीय सेनाओं ने प्रशिक्षण-सहयोग लिया। अब जब पूरी दुनिया में पूंजीवादी देशों के शासक हत्यारे इजरायल के प्रति जनता की नफरत को देखते हुए नेतन्याहू के साथ अपना नाम जोड़ने से भी बच रहे हैं, तब धूर्त ट्रम्प के साथ मोदी ही हैं जो खुलेआम नेतन्याहू के साथ गलबहियां कर रहे हैं। जाहिर है ट्रम्प व मोदी दोनों को ही अपनी जनता का या दुनिया में अपनी बदनामी का कोई डर नहीं है। शायद नेतन्याहू-ट्रम्प-मोदी पहले से ही इतने बदनाम हो चुके हैं कि उन्हें और बदनामी का भय नहीं है। 
    
इस यात्रा के दौरान भले ही इजरायल की संसद में उनके भाषण के वक्त विपक्षी सांसद नेतन्याहू के विरोध में बहिष्कार कर चुके थे, पर मोदी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। नेतन्याहू पूरी बदमाशी से एक नया क्षेत्रीय गठबंधन ‘हेक्सागन आफ एलायंसेज’ बनाने व भारत को उसमें शामिल करने की घोषणा करता रहा पर मोदी चुपचाप सुनते रहे। इजरायल का यह गठबंधन फिलिस्तीनी मुक्ति के समर्थक ईरान, हिजबुल्ला, हूती के खिलाफ काम करेगा। इजरायल ने इसे ‘रेडिकल शिया एक्सिस’ का नाम दिया है। साथ ही यह ‘इमर्जिंग रेडिकल सुन्नी एक्सिस’ के तहत आई एस आई एस का भी मुकाबला करेगा। इस गठबंधन में इजरायल भारत के साथ ग्रीस, साइप्रस व कई अरब-अफ्रीकी-एशियाई देशों को जोड़ना चाहता है। 
    
इस यात्रा के दौरान इजरायल से भारत ने मुक्त व्यापार पर बातचीत आगे बढ़ाई। आयरन डोम प्रतिरक्षा प्रणाली व अन्य लड़ाकू विमानों की भारत ने खरीद सुनिश्चित की। साथ ही कृषि, ए आई, साइबर सुरक्षा में सहयोग बढ़ाने की चर्चा की। भारत के फिलिस्तीनी मुक्ति से पीछे हटने को मोदी की इस यात्रा ने दुनिया के सामने जगजाहिर किया। वहीं इस यात्रा ने भारत की विदेश नीति के बढ़ते दिवालियेपन को उजागर किया। भारत के शासक दो ध्रुवों की ओर बढ़ती दुनिया में कभी एक तो कभी दूसरे ध्रुव की ओर ढुलक कर दोनों का भरोसा खोने की ओर बढ़ रहे हैं। तीसरा ध्रुव बनने की इनकी चाहत को कोई मान्यता देने को तैयार नहीं है। ये रूस से भी रिश्ते बनाये रखना चाहते हैं तो अमेरिका परस्ती भी बढ़ा रहे हैं। ये ईरान को भी नाराज नहीं करना चाहते पर इजरायल से दोस्ती भी बढ़ा रहे हैं। इस तरह भारतीय शासक भारत को बेपेंदी के लोटे की स्थिति में धकेल रहे हैं जो कभी भी किधर भी लुढ़क सकता है। ये इसे अपनी कामयाबी मान रहे हैं पर दुनिया इन पर हंस रही है।   

आलेख

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा। 

/ameriki-iimperialism-ka-trade-war-cause-&-ressult

लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?

/iran-par-mandarate-yuddha-ke-badal

इस तरह पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा बना हुआ है। यह खतरा ईरान के लिए प्रत्यक्ष है और यह दूर की बात नहीं है। इस अमरीकी आक्रमणकारी युद्ध के क्षेत्रीय और वैश्विक आयाम हैं। क्षेत्रीय ताकतों के अपने-अपने आपसी अंतरविरोध हैं

/prashant-bhushan-ka-afsos-and-left-liberal-ka-political-divaliyapan

गत 26 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहली पुण्यतिथि थी। सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने इस अवसर पर एक ट्वीट कि