मोदी की इजरायल यात्रा
प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी इजरायली यात्रा के दौरान वहां की संसद में घोषित कर दिया कि इजरायल पितृभूमि है और भारत मातृभूमि है। उनकी इस घोषणा का पूरे देश में विरोध होने लगा। इस घोषणा के साथ ही इजरायल से सहयोग बढ़ाने में जुटे भारतीय शासकों ने प्रकारान्तर से बता दिया कि फिलिस्तीनी मुक्ति से अब उनका कोई लेना-देना नहीं रह गया है कि वह हजारों फिलिस्तीनियों के कत्लेआम के गुनहगार हत्यारे इजरायल के दृढ़ सहयोगी बन चुके हैं।
मोदी का नेतन्याहू से यह प्रेमालाप काफी पहले से ही शुरू हो चुका है। कश्मीरी संघर्ष को कुचलने, मध्य भारत में आदिवासी संघर्ष को कुचलने में इजरायल से भारतीय सेनाओं ने प्रशिक्षण-सहयोग लिया। अब जब पूरी दुनिया में पूंजीवादी देशों के शासक हत्यारे इजरायल के प्रति जनता की नफरत को देखते हुए नेतन्याहू के साथ अपना नाम जोड़ने से भी बच रहे हैं, तब धूर्त ट्रम्प के साथ मोदी ही हैं जो खुलेआम नेतन्याहू के साथ गलबहियां कर रहे हैं। जाहिर है ट्रम्प व मोदी दोनों को ही अपनी जनता का या दुनिया में अपनी बदनामी का कोई डर नहीं है। शायद नेतन्याहू-ट्रम्प-मोदी पहले से ही इतने बदनाम हो चुके हैं कि उन्हें और बदनामी का भय नहीं है।
इस यात्रा के दौरान भले ही इजरायल की संसद में उनके भाषण के वक्त विपक्षी सांसद नेतन्याहू के विरोध में बहिष्कार कर चुके थे, पर मोदी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। नेतन्याहू पूरी बदमाशी से एक नया क्षेत्रीय गठबंधन ‘हेक्सागन आफ एलायंसेज’ बनाने व भारत को उसमें शामिल करने की घोषणा करता रहा पर मोदी चुपचाप सुनते रहे। इजरायल का यह गठबंधन फिलिस्तीनी मुक्ति के समर्थक ईरान, हिजबुल्ला, हूती के खिलाफ काम करेगा। इजरायल ने इसे ‘रेडिकल शिया एक्सिस’ का नाम दिया है। साथ ही यह ‘इमर्जिंग रेडिकल सुन्नी एक्सिस’ के तहत आई एस आई एस का भी मुकाबला करेगा। इस गठबंधन में इजरायल भारत के साथ ग्रीस, साइप्रस व कई अरब-अफ्रीकी-एशियाई देशों को जोड़ना चाहता है।
इस यात्रा के दौरान इजरायल से भारत ने मुक्त व्यापार पर बातचीत आगे बढ़ाई। आयरन डोम प्रतिरक्षा प्रणाली व अन्य लड़ाकू विमानों की भारत ने खरीद सुनिश्चित की। साथ ही कृषि, ए आई, साइबर सुरक्षा में सहयोग बढ़ाने की चर्चा की। भारत के फिलिस्तीनी मुक्ति से पीछे हटने को मोदी की इस यात्रा ने दुनिया के सामने जगजाहिर किया। वहीं इस यात्रा ने भारत की विदेश नीति के बढ़ते दिवालियेपन को उजागर किया। भारत के शासक दो ध्रुवों की ओर बढ़ती दुनिया में कभी एक तो कभी दूसरे ध्रुव की ओर ढुलक कर दोनों का भरोसा खोने की ओर बढ़ रहे हैं। तीसरा ध्रुव बनने की इनकी चाहत को कोई मान्यता देने को तैयार नहीं है। ये रूस से भी रिश्ते बनाये रखना चाहते हैं तो अमेरिका परस्ती भी बढ़ा रहे हैं। ये ईरान को भी नाराज नहीं करना चाहते पर इजरायल से दोस्ती भी बढ़ा रहे हैं। इस तरह भारतीय शासक भारत को बेपेंदी के लोटे की स्थिति में धकेल रहे हैं जो कभी भी किधर भी लुढ़क सकता है। ये इसे अपनी कामयाबी मान रहे हैं पर दुनिया इन पर हंस रही है।