शीत युद्ध के जमाने में पैक्स अमेरिकाना शब्द खूब चलन में था। इसका आशय था दुनिया भर में अमरीकी प्रभुत्व। इसके लिए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने तमाम गठबंधन बना रखे थे- नाटो, सीटो, सेन्टो इत्यादि। इसके अलावा दुनिया भर में इसके करीब एक हजार सैनिक अड्डे थे ही।
लेकिन ये सारे गठबंधन और सैनिक अड्डे अमेरिका के सापेक्षिक पराभव को नहीं रोक पाये। नयी शताब्दी में चीन के उभार ने अमरीकी साम्राज्यवादियों में छटपटाहट पैदा कर दी है और वे अपने प्रभुत्व को बनाये रखने के लिए अब हर किस्म के हथकण्डे अपना रहे हैं।
अभी हाल में घोषित पैक्स सिलिका इनमें से एक है। इसके जरिये अमरीकी साम्राज्यवादी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में अपने दबदबे को बनाये रखना चाहते हैं।
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी हालिया व्यापारिक जंग में पाया कि चीनी साम्राज्यवादी तो चुपके-चुपके दुर्लभ मृदा के क्षेत्र में एकाधिकार कायम कर चुके हैं। और दुर्लभ मृदा तत्वों के बिना अत्याधुनिक तकनीक में कदम भर नहीं चला जा सकता। इसीलिए चीनियों ने ट्रम्प द्वारा चीनी सामानों पर तटकर बढ़ाये जाने का तुर्की-ब-तुर्की जवाब दिया था और अंततः ट्रम्प को पीछे हटना पड़ा था। इतना ही नहीं चीनियों ने टिक-टाक, डीप सीक तथा हुवेई, इत्यादि के द्वारा दिखा दिया था कि वे आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में अमरीकियों को टक्कर दे सकते हैं।
अब अमरीकी साम्राज्यवादी घबराहट में कभी कुछ तो कभी कुछ कर रहे हैं। पैक्स सिलिका भी इन्हीं में से एक है। इसमें अभी दर्जन भर सदस्य देश शामिल हुए हैं जो लगभग सारे ही अमरीकी साम्राज्यवादियों के ‘रणनीतिक साझीदार’ हैं। भारत भी इनमें से एक है। महत्वपूर्ण बात यह है कि यू के को छोड़कर कोई यूरोपीय देश इसका सदस्य नहीं है।
पैक्स सिलिका में शामिल होने का मतलब है, आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में अमरीकी साम्राज्यवादियों की मातहती स्वीकार कर लेना। इसका यह भी मतलब है कि इसमें शामिल कोई भी देश दूरगामी तौर पर खुद को अमरीकी हितों से बांध ले रहा है। आज ही नहीं, भविष्य में भी उसे अमरीकी हितों के हिसाब से चलना होगा।
मोदी के नेतृत्व में भारत के हिन्दू फासीवादी शासकों ने अपने तात्कालिक हितों की खातिर देश के दूरगामी हितों की कुर्बानी दे दी है। भाजपा व मोदी को सत्ता में बने रहना है तथा बड़े पूंजीपतियों को तात्कालिक मुनाफा कमाना है। इसके लिए दोनों ने पैक्स सिलिका में शामिल होना स्वीकार किया है।
पैक्स सिलिका में भारत का योगदान यह होगा कि वह अपने करीब डेढ़ करोड़ लोगों का डाटा अमरीकी कंपनियों को देगा और उनके डाटा सेन्टर को भयानक खर्चे पर अपने यहां स्थापित करेगा। बदले में उसे क्या मिलेगा? दूसरे या तीसरे दर्जे का उत्पाद।
पैक्स सिलिका के जरिये भारत डिजिटल दुनिया में कच्चे माल (डाटा) का आपूर्तिकर्ता बनकर रह जायेगा। उसे अमरीकी कंपनियों दूसरे या तीसरे दर्जे के माल की आपूर्ति करेंगी। ज्यादा से ज्यादा वह डिटिजल वैश्विक मूल्य श्रृंखला में उसी तरह शामिल हो जायेगा जैसे वह उपभोक्ता मालों, जैसे कपड़ा इत्यादि में है। लम्बे समय से चला आ रहा औद्योगिक पिछड़ापन और संस्थागत हो जायेगा।
हिन्दू फासीवादी शासकों को भारत का यह भविष्य स्वीकार है। जिन्हें देश को मध्य युग में ले जाना है, वे भारत के औद्योगिक व तकनीकी पिछड़ेपन की चिंता क्यों करें? वैसे भी अपनी सत्ता की खातिर समूचे देश को जहालत में ढकेलने वाले और कर भी क्या सकते हैं?
पर जिन्हें देश का यह भविष्य स्वीकार नहीं, उन्हें पैक्स सिलिका का उसी तरह विरोध करना होगा जैसे कभी पैक्स अमेरिकाना का विरोध किया जाता था।