तुम्हारे हाथ
चट्टानों की तरह संजीदा
जेल में गाए जाने वाले गीतों की तरह उदास
जुते हुए बैलों की चाल की तरह भारी
भूखे मरते हुए बच्चों के चेहरे की तरह भयानक
तुम्हारे हाथ
श्रम में मधु-मक्खियों की तरह चुस्त और सक्रिय
मां के पयोधरों की तरह भरे पूरे,
प्रकृति की भांति निर्भय और निर्बाध
खुरदुरी खाल के नीचे
मैत्री का स्नेह भरा स्पर्श छिपाए हुए
यह गलत है कि धरती को
शेषनाग ने अपने माथे पर धारण कर रखा है
धरती यह समूची धरती
तुम्हारे इन्हीं हाथों पर टिकी हुई है।
ओ तमाम दुनिया के लोग!
जब तुम भूख से व्याकुल रहते हो
और तुम्हें रोटी की जरूरत होती है
तब वे तुम्हें खिलाने के लिए
अगणित असत्यों की फसल तैयार करते हैं
और तुम तमाम जिंदगी
एक बार साफ थाली में भरपेट खाने के लिए
तरसते-तरसते दम तोड़ देते हो
जबकि दुनिया भर में शाखें पके हुए फलों के बोझ से
झुकी पड़ती हैं।
ओ तमाम दुनिया के लोगो!
सबसे बढ़कर
एशिया
अफ्रीका
मध्य पूर्व
सुदूर पूर्व
प्रशांत द्वीप समूह
और मेरे देश के लोगो
यानी तुम जो तमाम इंसानी आबादी के
सत्तर प्रतिशत से अधिक हो
तुम अब भी सोए हुए हो
तुम अपने हाथों की तरह पुराने हो
तुम बच्चों की तरह
खुश हो संतुष्ट हो
तुम अपने जवान हाथों की तरह अनुभव शून्य हो!
और ओ योरोप और अमेरिका के लोगो
तुम सचेत हो, तुममें साहस है
पर तुम इन्हीं हाथों की तरह चिंतन शून्य हो
असत्य तुम्हारे हृदयों पर विजय पा लेता है
और तुम उसके जाल में उलझ जाते हो।
ओ साथियो!
अगर यह असत्य रेडियो से बोला जाता है
अगर यह असत्य रोटरी मशीनों पर छापा जाता है
अगर यह असत्य किताबों में लिखा जाता है
दीवारों और खंभों पर चिपके नोटिसों और इश्तहारों पर
अंकित किया जाता है
अगर यह असत्य चित्रपट पर नंगी टांगों के
रूप में दिखाया जाता है
अगर रूमानी गीतों में यह असत्य गूंथा जाता है
अगर सपने भी इसी असत्य में रंगे होते हैं
बांसुरियों में भी यही असत्य सिसकता है
निराशा भरी विरह की चांदनी रातों में यह
असत्य झिलमिलाता है।
अगर शब्द, रंग, ध्वनि
सभी इसी असत्य के वाहन हैं
तुम्हारे हाथों को ख़रीदने वाला भी
इसी असत्य का ठेकेदार है
अगर तुम्हारे हाथ के अलावा
दुनिया की हर छोटी बड़ी चीज़
इसी असत्य के स्वर में बोलती है
तो इसका एक मात्र कारण यह है
कि वे चाहते हैं
कि ये तुम्हारे अपराजेय हाथ
कठपुतलियों की तरह
उनके संकेतों पर नाचें
उन्हें कोई भी दृष्टि न मिले
उन्हें कोई ज्ञान न मिले
ताकि तुम्हारे हाथ कभी भी उनके ख़लिफ़ न उठें
ताकि अन्याय का कभी अंत न हो
ताकि ग़ुलामफ़रोशों का शासन
इस धरती पर सदैव बना रहेकृ
यह धरती
जो हम सबों की माता है।
अनुवाद : धर्मवीर भारती
साभार : hindwi.org