हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने कक्षा 1 से कक्षा 8 तक के करीब 5 हजार से ज्यादा सरकारी स्कूलों को मर्ज (विलय) करने की तैयारी कर दी है। कहीं-कहीं यह संख्या 27 हजार के आस-पास बताई जा रही है। यह वे स्कूल हैं, जिनमें 50 से कम छात्र पढ़ते हैं। इसके अलावा ऐसे स्कूल जिनके रास्ते में कोई नदी, नाला, हाईवे, रेलवे ट्रैक आता है उनका भी विलयीकरण होगा। ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि किसी दुर्घटना की आशंका नहीं रहे। इसमें केवल लखनऊ में 445 और सुल्तानपुर जिले में 444 स्कूल सामने आए हैं जिनमें 50 से कम छात्र पढ़ाई करते हैं।
ज्ञात हो कि उत्तर प्रदेश में परिषदीय स्कूलों की संख्या 1 लाख 32 हजार है। जिनमें प्राथमिक स्कूल 85,000 और उच्च प्राथमिक स्कूल 45,625 हैं। इनमें 1 करोड़ 49 लाख छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं।
उ.प्र. सरकार की प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों की मर्जर की योजना शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 का खुला उल्लंघन है जिसमें धारा-6 के तहत स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि न्यूनतम 300 की आबादी में और 1 किमी के दायरे में प्राथमिक विद्यालय स्थापित होगा। यह संविधान के अनु. 21 ए के तहत शिक्षा के मौलिक अधिकार का तथा नीति निदेशक तत्व के अनु. 46 का भी स्पष्ट खुला उल्लंघन है जो अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देने पर बल देता है।
लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार तर्क दे रही है कि ये कदम जनता की भलाई के लिए उठाया जा रहा है, शिक्षा की बेहतरी के लिए उठाया जा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 और राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की रूपरेखा (एनसीएफ) 2020 के तहत स्कूलों के बीच सहयोग, समन्वय और संसाधनों के साझा उपयोग को बढ़ावा देना जरूरी है।
केन्द्र में बैठी मोदी सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत शिक्षा के निजीकरण का खाका तैयार करके बचे-खुचे सरकारी शिक्षा संस्थानों स्कूल-कालेजों को भी निजी संस्थानों के हाथों में सौंप देने का प्रावधान कर दिया है। इसी नीति के तहत क्लस्टर विद्यालय के नाम पर स्कूलों का मर्जर किया जा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुसार, हर बड़े सरकारी माध्यमिक स्कूल के आस-पास आने वाले प्राथमिक/उच्च प्राथमिक और आंगनबाड़ी सहित अन्य निचले स्तर के स्कूलों को एक स्कूल काम्प्लेक्स के रूप में जोड़ा जाएगा। यह स्कूल काम्प्लेक्स लगभग 5-10 किमी. के दायरे में स्थित स्कूलों का समूह होगा।
इसके लिए सरकार हर जिले में 1.42 करोड़ की लागत लगाकर एक मुख्यमंत्री अभ्युदय कंपोजिट (मिश्रित) कक्षा 1 से 8 तक का विद्यालय खोल रही है। प्रदेश सरकार का कहना है कि इन स्कूलों को आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर और शैक्षणिक सुविधाओं से लैस किया जाएगा। हर स्कूल में कम से कम 450 छात्रों के लिए संसाधन उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इसी तरह हर जिले में एक मुख्यमंत्री माडल कंपोजिट (मिश्रित) कक्षा 1 से 12 तक के स्कूल की स्थापना की जा रही है। इस पर करीब 30 करोड़ रुपए की लागत आएगी। इन स्कूलों में कम से कम 1500 छात्रों के लिए संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे।
सरकार की इस योजना को सुनकर ऐसा लग रहा है मानो सरकार बच्चों की पढ़ाई को लेकर कितनी चिंतित है। वह जनता का कितना भला करना चाहती है।
अगर स्कूलों का विलय हुआ तो जाहिर है कि स्कूल दूर होने की वजह से इसका असर हजारों छात्रों की शिक्षा पर तो पड़ेगा ही साथ ही शिक्षकों के हजारों पद भी कम हो जाएंगे और भविष्य में शिक्षकों की होने वाली भर्ती पर भी इसका असर पड़ेगा। इसके साथ ही इन स्कूलों में मिड डे मील बनाने वाली हजारों रसोइयों (भोजनमाताओं) की नौकरी भी सीधे समाप्त हो जाएगी।
सरकार हर जिले में एक अभ्युदय और एक मॉडल स्कूल खोल कर केवल 1950 बच्चों को ही पढ़ाना चाहती है। लेकिन जिले भर से कक्षा 1-2 में पढ़ने वाले छात्र कितनी दूरी से इन स्कूलों में आ सकते हैं? अभी ही स्थिति ऐसी है कि एक किलोमीटर की दूरी पर ही बच्चे स्कूल नहीं पहुंच पाते, तो दूसरी ग्राम सभा या जिले के स्कूल में बच्चों को मर्ज किया जाएगा, तो स्कूल की दूरी और बढ़ जाएगी जहां बच्चों के स्कूल जाने की संभावना और कम हो जाएगी।
सरकार स्कूलों का विलय करके एक तरफ तो गरीब बच्चों को शिक्षा से दूर कर रही है वहीं दूसरी तरफ प्राइवेट (निजी) स्कूलों को बढ़ावा दे रही है। अब हर कोई अपने बच्चे को न्यूनतम शिक्षा देना चाहता है। वह किसी तरह मेहनत-मजदूरी करके या निम्न मध्य वर्ग के लोग किसी तरह अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेजेंगे जहां वे प्राइवेट स्कूलों की मनमानी फीस की लूट का शिकार बनेंगे।
दूसरी बात अधिकांश स्कूलों में आज ही स्थाई प्रधानाध्यापक नहीं हैं। उनकी जगह कार्यवाहक प्रधानाध्यापक काम कर रहे हैं। अगर स्कूलों का विलय होगा तो उतने ही प्रधानाध्यापक के पद खत्म हो जाएंगे। वर्ष 2017-18 में बेसिक शिक्षा परिषद के 1.58 लाख से अधिक स्कूल थे। इनमें 1 लाख 13 हजार 289 प्राइमरी स्कूल थे। कंपोजिट विद्यालयों के गठन के लिए कम छात्र संख्या वाले करीब 28 हजार स्कूलों को पड़ोस के स्कूल में विलय किया गया। इससे 28 हजार प्रधानाध्यापक के पद सीधे-सीधे कम हो गए। वहीं अब अगर 5 हजार स्कूलों का विलय किया जाएगा तो 5 हजार प्रधानाध्यापक के पद और कम हो जाएंगे।
राज्य में कितने ही लोग डिग्री लेकर बेरोजगार घूम रहे हैं, प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने को मजबूर हैं लेकिन सरकार भर्ती नहीं कर रही है। जबकि राज्य भर में 970 स्कूल ऐसे हैं जहां एक भी शिक्षक नहीं है। ऐसे बहुत से स्कूल हैं जहां सरकारी शिक्षकों की जगह संविदा या शिक्षा मित्रों को कम पैसे देकर पढ़वाया जा रहा है लेकिन भर्ती नहीं निकाली जा रही है। अब अगर स्कूलों का विलय हो जाएगा तब भर्ती हेतु रिक्त पदों की संख्या और कम हो जाएगी।
कक्षा 1 से कक्षा 8 तक के बच्चों को मिड डे मील योजना के तहत खाना खिलाया जाता है जिसको बनाने का काम रसोइया (भोजनमाताएं) करती हैं। इनको 2 हजार रुपए मासिक मानदेय मिलता है। जिसको रोजगार तो नहीं कहा जा सकता लेकिन मजबूरी और गरीबी में वही उनका रोजगार है। जब स्कूलों का विलय होगा तो इनका कहीं विलय नहीं होगा। इन्हें सीधे काम से निकाल दिया जाएगा। यानी आज जो रसोईयां काम कर रही हैं वह स्कूल के विलय के बाद बेरोजगार हो जाएंगी।
दरअसल यह केवल उत्तर प्रदेश सरकार की ही बात नहीं है बल्कि केंद्र सरकार से लेकर अलग-अलग राज्यों की सरकारें भी शिक्षा के बजट में लगातार कटौती कर रही हैं। सरकार केवल शिक्षा ही नहीं हर क्षेत्र में प्राइवेट (निजी) संस्थाओं को बढ़ावा दे रही है। सरकार अपनी हर जिम्मेदारी (शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार) से अपना हाथ खींच रही है। सरकार का मकसद गरीब बच्चों को न शिक्षा देना है, न पोषण देना है और न ही रोजगार देना है।
अभी तक जो भी अधिकार/सरकारी सुविधाएं आम मेहनतकश जनता को मिल रही थीं या जो आज भी मिल रही हैं वह जनता ने इतिहास में संघर्षों की बदौलत हासिल की है। लेकिन धीरे-धीरे जनता से सारे अधिकार छीने जा रहे हैं। इन अधिकारों को बचाने और नये अधिकारों को पाने के लिए भी संघर्ष जरूरी है।