आपरेशन कगार बंद करो! ये कत्लेआम बंद करो!!
देश में माओवाद के सफाये पर उतारू फासीवादी सरकार ने बीते कुछ दिनों में भारी पुलिस व सैन्य बल लगाकर ढेरों माओवादी कार्यकर्ताओं व आदिवासियों की हत्यायें कर दीं। मारे जाने वा
देश में माओवाद के सफाये पर उतारू फासीवादी सरकार ने बीते कुछ दिनों में भारी पुलिस व सैन्य बल लगाकर ढेरों माओवादी कार्यकर्ताओं व आदिवासियों की हत्यायें कर दीं। मारे जाने वा
कुछ लोग ऐसे हैं जो रात-दिन संस्कृति की दुहाई देते हैं। रात-दिन इसकी माला जपते हैं। संस्कृति की दुहाई देने वालों का जो सबसे बड़ा ठेकेदार है उसकी तो सारी बात ही संस्कृति से
भारत-पाकिस्तान के बीच छोटी सी सैनिक झड़प ने देश की हिंदू फासीवादी सरकार के कई दावों की पोल खोल दी। इसमें सामरिक और राजनयिक दावे सभी थे। सामरिक तौर पर जहां कमजोर और छोटा सा
युद्ध विराम के बाद अब भारत और पाकिस्तान दोनों के शासक अपनी-अपनी सफलता के और दूसरे को नुकसान पहुंचाने के दावे करने लगे। यही नहीं, सर्वदलीय बैठकों से गायब रहे मोदी, फिर राष्ट्र के संबोधन के जरिए अपनी साख को वापस कायम करने की मुहिम में जुट गए। भाजपाई-संघी अब भगवा झंडे को बगल में छुपाकर, तिरंगे झंडे के तले अपनी असफलताओं पर पर्दा डालने के लिए ‘पाकिस्तान को सबक सिखा दिया’ का अभियान चलाएंगे।
पुरानी कहावत है कि युद्ध का पहला शिकार सच होता है। युद्ध में दोनों पक्ष अपनी जनता और बाकी दुनिया की जनता को अपने पक्ष में करने के लिए हर संभव अर्धसत्य और झूठ का सहारा लेत
इस 7 मई को सरकार ने वर्ष 2021 में देश में हुई मौतों के मेडिकल सर्टिफिकेट की रिपोर्ट जारी की। इससे पहले वर्ष 2020 की रिपोर्ट 25 मई 2022 को जारी हुई थी। इस आधार पर वर्ष 202
आपातकाल के ठीक पहले अमृत नाहटा ने एक फिल्म बनायी थी- ‘किस्सा कुर्सी का’। इस फिल्म को सेंसर बोर्ड द्वारा अनुमति नहीं मिली। कहा जाता है कि आपातकाल के दौरान संजय गांधी ने इस
आजकल राहुल गांधी बहुत मेहनत कर रहे हैं। वे कांग्रेस को एक विचारधारात्मक आधार पर खड़ा करना चाहते हैं। पर कोई राहुल गांधी को जाकर समझाये कि भाई तले हुए अण्डों से चूजे नहीं न
पहलगाम हमले के बाद पूंजीवादी मीडिया, संघी प्रचार मशीनरी के उन्मादी प्रचार से भारतीय समाज को एक विषाक्त समाज में तब्दील किया जा रहा है। एक ऐसा समाज जो सारा विवेक-सारी तर्क
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।