विनोद कुमार शुक्ल के बहाने

Published
Fri, 01/16/2026 - 07:09
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बीते दिसम्बर में विनोद कुमार शुक्ल की मृत्यु के बाद जिस तरह उन पर चर्चा हुई वैसा कम ही होता है, खासकर किसी हिन्दी साहित्यकार के मामले में। हिन्दी ही नहीं, अंग्रेजी के भी प्रचार माध्यमों में उन पर बात हुई। उनकी तारीफ में कसीदे गढ़े गये। ऐसा लगा जैसे तमाम लोगों में अचानक साहित्य में रुचि जाग उठी हो, वह भी हिन्दी साहित्य में। 
    
हिन्दी भाषी क्षेत्र की हमेशा से खासियत रही है कि इसके लोगों की साहित्य में रुचि नहीं रही है। देश की तमाम भाषाओं में सबसे ज्यादा इसे ही बोलने और समझने वाले लोग हैं। साक्षरता बढ़ने के साथ इसे पढ़ने वालों की संख्या भी लगातार बढ़ती गयी है। लेकिन इस सबके बावजूद हिन्दी साहित्य के पाठक बहुत कम रहे हैं। हिन्दी साहित्यकार अपनी किताबों की बिक्री के लिए सरकारी पुस्तकालयों पर निर्भर रहे हैं। शायद ही ऐसे साहित्यकार हों जो केवल अपनी साहित्यिक रचनाओं की बिक्री से जीवन यापन कर पाते हों। उन्हें कोई अन्य व्यवसाय या नौकरी का सहारा लेना पड़ता रहा है। हिन्दी साहित्य के पाठक नहीं हैं, यह शिकायत हिन्दी साहित्यकारों को हमेशा रही है। 
    
कुछ लोग हिन्दी साहित्यकारों की इस शिकायत का जवाब देते हुए इसके लिए स्वयं इन्हीं साहित्यकारों को दोषी ठहराते थे। उनका कहना था कि हिन्दी में लोकप्रिय साहित्य तो लाखों की संख्या में बिक रहा था। जिसे चवन्निया साहित्य कहते थे, उसके पाठक तो लाखों में थे (गुलशन नंदा, सुरेन्द्र मोहन पाठक, इत्यादि)। मनोहर कहानियां जैसी पत्रिकाएं भी लाखों में बिकती थीं। ऐसे में यदि हिन्दी साहित्य की किताबें हजारों में भी नहीं बिकती थीं तो इसका दोष हिन्दी पाठकों को नहीं दिया जा सकता था। हिन्दी साहित्य अपनी ही दुनिया में कैद था और पाठकों की रुचियों से उसका कोई लेना-देना नहीं था। इसके जवाब में हिन्दी साहित्यकार लोकप्रिय साहित्य को छिछला और भदेस मानते हुए स्वयं को उस स्तर पर उतारने से इंकार करते थे। एक मायने में 1970 व 80 के दशक में कला सिनेमा तथा लोकप्रिय सिनेमा के दर्शकों के बारे में बहस भी इसी दिशा में थी। कला सिनेमा के भी दर्शक सीमित थे तथा उसे किसी हद तक सरकारी सहायता पर निर्भर होना पड़ता था। 
    
हिन्दी साहित्य और उसके पाठकों की इस अवस्था को देखते हुए यह स्वाभाविक ही था कि हिन्दी साहित्य की कोई किताब या कोई साहित्यकार आम तौर पर चर्चा का विषय नहीं बनते रहे हैं प्रचार माध्यमों को इनमें रुचि नहीं रही है क्योंकि उन्हें पता होता है कि उनके पाठक इसमें रुचि नहीं लेंगे। 
    
ऐसे में विनोद कुमार शुक्ल के निधन पर इस तरह की व्यापक चर्चा किसी हद तक अप्रत्याशित थी। वह इसलिए भी कि साल भर पहले ज्ञानपीठ पुरुस्कार मिलने तक वे हिन्दी के बहुत सीमित दायरे में ही जाने जाते थे। हिन्दी साहित्य के अत्यन्त सीमित पाठकों में भी वे लगभग अनजान थे। केवल थोड़े से लोग ही उनके साहित्य में रुचि लेते थे। उनके जिन उपन्यासों की आज चर्चा है- ‘नौकर की कमीज’, ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ व ‘खिलेगा तो देखेंगे’ - उन्हें भी अंत तक बहुत थोड़े लोगों ने ही पढ़ा होगा, उनके छोटे आकार के बावजूद।
    
विनोद कुमार शुक्ल पर इस तरह की चर्चा आज के प्रचार माध्यमों की खासियत का भी परिणाम हो सकती है। इन प्रचार माध्यमों की मजबूरी है कि वे लगातार नये विषय को उठायें जिससे वे अपने पाठकों या दर्शकों का ध्यान आकर्षित कर सकें। इसके लिए वे अत्यन्त नीरस विषयों को भी सनसनी की तरह पेश करते हैं जिससे पाठक/दर्शक कम से कम कुछ समय तो उस पर ध्यान दें। 
    
जो भी हो, इसका परिणाम अच्छा ही रहा। इसी बहाने साहित्य पर कुछ बात हुई। फिल्मों और सीरियलों की दुनिया में खोये लोगों में से कुछ ने साहित्य पर एक नजर डाली। हालांकि विनोद कुमार शुक्ल के साहित्य की अपनी विशिष्टता के चलते उनके पल्ले ज्यादा कुछ पड़ा होगा, कहना मुश्किल है। 
    
इसमें दो राय नहीं कि विनोद कुमार शुक्ल हिन्दी में अपनी तरह के विशिष्ट लेखक हैं। उनके ऊपर चिह्नित तीनों उपन्यास अपनी विशिष्ट शैली में हैं जिसे कुछ लोगों ने गैब्रियल गार्सिया मार्खेज के जादुई यथार्थवाद की शैली के अनुरूप पाया है। हिन्दी लेखकों में उदय प्रकाश, कभी-कभी संजीव तथा कुछ अन्य इस तरह की शैली का प्रयोग करते रहे हैं। लेकिन ये उदाहरण केवल समानता दर्शाने के लिए ही हैं। असल में विनोद कुमार की अपनी विशिष्ट शैली है। 
    
विनोद कुमार शुक्ल की शैली को वृहत्तर रूपक (एक्सटेन्डेर मेटाफर) कहा जा सकता है। इसमें कोई साधारण सी कथा लम्बे समय तक या लगभग पूरी ही रूपक में चलती है। प्रस्तुतीकरण में शब्द और मुहावरे सामान्य होते हैं। वाक्य भी छोटे और सरल होते हैं। पर कथा के रूपक में ही चलते जाने के कारण सारे प्रस्तुतीकरण का एकदम असामान्य प्रभाव उत्पन्न हो जाता है। इससे पैदा भावनाएं गूंगे का गुड़ हो जाती हैं जिसमें स्वाद तो आ जाता है पर स्वाद को व्यक्त नहीं किया जा सकता। लेखक की खुद की अभिव्यक्ति ऐसी हो कि पाठक उससे जनित भावनाओं को अभिव्यक्त करने में अक्षम हो जाये यही विनोद कुमार शुक्ल की खासियत है। या शायद उस सारे साहित्य की खासियत है जो वृहत्तर रूपक की शैली का इस्तेमाल करती है। गीतांजलि श्री के रेत समाधि में भी बाद में कथा काफी कुछ रूपक में ही चलती है। इसके पहले कौवों का वृहत्तर रूपक है। 
    
प्लेखानोव ने कभी कहा था कि कला बिम्बों के माध्यम से भावनाओं का संप्रेषण है। बिंब शब्दों से भी रचे जा सकते हैं और चित्रों, मूर्तियों, संगीत या फिर श्रव्य-दृश्य से भी। कला सफल तभी होती है जब पाठक, दर्शक या स्रोता के मन में बिम्बों के माध्यम से अपेक्षित भावनाओं का संचार कर दे। स्पष्ट है कि कलाकार की बिंब रचने की क्षमता, भावनाओं का स्वरूप तथा ग्रहणकर्ता सभी इस सफलता/असफलता में कारक बनते हैं। 
    
मुक्तिबोध की कविताएं जटिल इसलिए हैं कि वे जटिल बिंबों का इस्तेमाल करती हैं। इन बिंबों को रचने में मुक्तिबोध जिस भाषा का इस्तेमाल करते हैं वह भी कठिन होती है। कई बार ये जटिल बिंब वृहत्तर रूपक का रूप भी धारण कर लेते हैं, जैसे ब्रह्मराक्षस में। इसलिए पाठक इन कविताओं का रस तभी ले पाता है जब वह इन बिंबों को ग्रहण कर ले या बिंब उसके दिमाग में उत्पन्न हो जायें। 
    
मुक्तिबोध ने ही पहले विनोद कुमार शुक्ल की कविताई प्रतिभा को पहचाना था। दोनों तब मध्य प्रदेश के राजनाद गांव में रहते थे। मुक्तिबोध ने ही उनकी कविताओं को पहली बार प्रकाशित करवाने में पहल की थी। मुक्तिबोध की पसन्द का कारण शायद वृहत्तर रूपक रहा हो। आखिर उनका अपना उपन्यास ‘सतह से उठता आदमी’ कभी-कभी इस शैली का प्रयोग करता है।
    
मुक्तिबोध से भिन्न, विनोद कुमार शुक्ल की भाषा सरल है। वहां कठिन शब्द और जटिल वाक्य नहीं हैं। लेकिन इससे प्रस्तुत कथ्य का प्रभाव कम नहीं हो जाता। इस तरह के शब्दों और वाक्यों से बुने हुए वृहत्तर रूपक से वह बिंब पैदा हो जाता है जो लेखक चाहता है। फिर इस बिंब से अपेक्षित भावनाएं पैदा हो जाती हैं। 
    
विनोद कुमार शुक्ल ने मुक्तिबोध की तरह लंबी कविताएं नहीं लिखीं। इसलिए वहां उनके उपन्यासों की तरह रूप वृहत्तर रूपक नहीं है। पर उनकी कविताएं भी ज्यादातर रूपक में ही हैं। 
    
विनोद कुमार शुक्ल ने अपने उपन्यासों में वृहत्तर रूपक की जो शैली अपनाई वह अनायास नहीं थी। और इस शैली का जो प्रभाव उत्पन्न हुआ वह भी अनायास नहीं था। ठीक इसी कारण, एक सीमित दायरे में ही सही, उनकी प्रतिष्ठा भी रही। 
    
आजादी के बाद देश में पूंजीवादी विकास के चलते 1980-90 के दशक तक गांवों-कस्बों का जो स्वरूप उभरा वह अत्यन्त अजीबो-गरीब था। वह एक साथ विकास के होने और न होने दोनों को व्यक्त करता था। इसमें सामंती मूल्य-मान्यताएं और आचार-विचार अत्यन्त उलझे हुए तरीके से पूंजीवादी महत्वाकांक्षाओं से तालमेल बैठाये हुए थे। उपभोक्तावादी सामानों से लबरेज दहेज की मांग और पूर्ति इसका उदाहरण है। 
    
इन गांवों और कस्बों का जो यथार्थ था उसे न तो प्रेमचन्द की किस्सागोई शैली में व्यक्त किया जा सकता था और न ही ‘नयी कहानी’ की शैली में। ‘नयी कविता’ और ‘नई कहानी’ ने 1950 व 60 के दशक के गांवों-कस्बों के यथार्थ को व्यक्त किया था। खासकर कस्बों और शहरों के यथार्थ को। यह यथार्थ आजादी के पहले के पूंजीवादी विकास के फलस्वरूप अस्तित्व में आया था। इसकी खासियत थी कि यह पुराने सामंती यथार्थ से सीधा ‘कन्ट्रास्ट’ पैदा करता था। इस यथार्थ का लगभग जस का तस प्रस्तुतीकरण ‘नयी कहानी’ का लक्ष्य था। कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश, धर्मवीर भारती, मन्नू भण्डारी, कृष्णा सोबती, इत्यादि के तब के साहित्य में इसे देखा जा सकता है। 
    
लेकिन प्रेमचंद के जमाने से भिन्नता के बावजूद अभी भी यह यथार्थ किसी हद तक इकहरा था। कस्बाई मन के द्वन्द्व के बावजूद वहां इतनी पेंचीदगी नहीं थी। उहापोह की स्थिति थी लेकिन एक ही धरातल पर। परत-दर-परत उहापोह नहीं थे। इसीलिए इस यथार्थ को अभी वर्णनात्मक शैली में प्रस्तुत किया जा सकता है। कथा ‘फ्लैशबैक’ में जा सकती थी पर रहती वर्णनात्मक ही थी। कथाकार प्रेमचन्द की किस्सागोई शैली पीछे छोड़ आये थे पर कुल मिलाकर वर्णनात्मक शैली बरकरार थी। रेणु जैसे ‘लिरिकल’ कथाकार भी वर्णनात्मक शैली में ही चलते थे। 
    
आज भी हिन्दी के ज्यादातर कथाकार वर्णनात्मक शैली में ही चलते हैं। यथार्थ की जटिलता को पकड़ने के लिए वे अक्सर आगे-पीछे जाते हैं पर रहते वर्णनात्मक ही हैं। 
    
विनोद कुमार शुक्ल ने शायद महसूस किया कि सामान्य वर्णनात्मक शैली में उनके समय के गांवों-कस्बों के यथार्थ को व्यक्त नहीं किया जा सकता। इसीलिए उन्होंने इसके बदले वृहत्तर रूपक की शैली का इस्तेमाल किया। इसमें वर्णन तो होता है पर उसका खास महत्व नहीं होता। कथा का कोई आरंभ और अंत तो होता है पर वे ज्यादा मायने नहीं रखते। ज्यादा मायने रखने वाली वे स्थितियां होती हैं जो इस दौरान रूपकों से उभरती हैं। 
    
इस शैली का फायदा यह होता है कि एक ही वर्णन से कई सारे अर्थ पैदा किये जा सकते हैं। कई भावनाएं जगाई जा सकती हैं। परत-दर-परत उलझे उलटे-पुलटे यथार्थ को प्रस्तुत करने के लिए वर्णन में फिर-फिर लौटने की जरूरत नहीं पड़ती। एक ही वर्णन काफी होता है। पर इसीलिए यह जरूरी है कि वह सटीक वर्णन न हो। वह कुछ इस तरह का हो कि उससे रस्सी का भी मतलब निकले और सांप का भी। बच्चों द्वारा खींची गयी टेड़ी-मेड़ी रेखा का भी मतलब निकल सकता हो या किसी पेड़ की डाल की पड़ रही छाया का भी। यह सब वर्णन को स्वभावतः रूपक मय बना देता है। 
    
विनोद कुमार शुक्ल के तीनों प्रसिद्ध उपन्यासों की पृष्ठभूमि कस्बाई या गंवई है। उनके मुख्य पात्र अध्यापक और बाबू हैं। हाल के समय में ये भारतीय समाज के निरीह प्राणी हैं। वे सबसे गरीब नहीं हैं। बल्कि वे निम्न मध्यवर्गीय हैं। लेकिन तब भी या फिर ठीक इसी कारण वे अत्यन्त निरीह हैं। वैसे इन मास्टरों और बाबुओं की निरीहता जग प्रसिद्ध है। चेखव के ‘एक क्लर्क की मौत’ कहानी का पात्र ऐसा ही निरीह बाबू है। उसके भी पहले के गोगोल के ‘गरम कोट’ का पात्र भी। पर भारत में पूंजीवाद का जिस तरह विकास हुआ है और उसमें कस्बों-गांवों का जो यथार्थ उभरा है, उसमें यह निरीहता और ज्यादा मार्मिक हो उठी है। 
    
विनोद कुमार शुक्ल ने स्वयं इसी तरह का जीवन जिया था। मुक्तिबोध ने भी। मुक्तिबोध इस निरीहता से मुक्ति के लिए छटपटाते रहे- कम से कम अपने साहित्य में। उनका मार्क्सवाद इस कस्बाई लघु मानव की निरीहता से मुक्ति का उपादान है। उनका सारा आत्म-संघर्ष, जो उनकी कविताओं के मूल में है, इस स्थिति से मुक्ति की कोशिश और फिर उसमें डूब जाने में है। ‘सतह से उठता आदमी’ उबर नहीं पाता बल्कि ‘ब्रह्मराक्षस’ की तरह तली में बैठा अपनी आत्मा के मैल छुड़ाने में लगा रहता है। इसीलिए कस्बाई क्रांतिकारियों को मुक्तिबोध बहुत भाते हैं, अगर यह महज फैशनपरस्ती न हो। 
    
विनोद कुमार शुक्ल अपने साहित्य में इस तरह का आत्म-संघर्ष नहीं करते। बल्कि एक तरह से वे इस यथार्थ को स्वीकार कर लेते हैं। फिर वे किसी भावनालोक में पलायन कर इससे तालमेल बैठाने की कोशिश करते हैं। ‘नौकर की कमीज’ के बाबू की निरीहता से मुक्ति ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के रोमांटिक कल्पनालोक में होती है। उसका मास्टर व उसकी पत्नी दीवार की खिड़की से ‘नार्निया’ की तरह ही अलग दुनिया में पहुंच जाते हैं। ‘खिलेगा तो देखेंगे’ का मास्टर यह नहीं कर पाता पर वह समय-समय पर कल्पनालोक में जाता रहता है। 
    
विनोद कुमार शुक्ल की शैली या ज्यादा व्यापक रूप में कहें तो सामान्य वर्णनात्मक शैली से भिन्न कोई शैली विश्व साहित्य के लिए उतनी अजीब चीज नहीं है। बल्कि समूची बीसवीं सदी का विश्व साहित्य इस तरह के भांति-भांति के प्रयोगों से भरा पड़ा है। जेम्स जायस के उलिसिस से लेकर इस साल के नोबेल पुरुस्कार विजेता तक शैली में प्रयोग कर वर्तमान पूंजीवाद के जटिल यथार्थ को पकड़ने का प्रयास करते रहे हैं। चित्रकला में तो यह और भी पहले शुरू हो गया था। बाद में कला सिनेमा में भी इस जटिल यथार्थ को पकड़ने के लिए भांति-भांति की शैली ईजाद की गयी। 
    
पर इस तरह की शैलियों की दिक्कत यह रही है कि वे जटिल यथार्थ को पकड़ने की कोशिश में इतना मशगूल हो जाती हैं कि वे इसकी समालोचना करना भूल जाती हैं। हालांकि इसमें दृष्टि के अभाव की भी बड़ी भूमिका होती है पर अक्सर शैली इस कदर हावी हो जाती है कि यथार्थ की विडंबना से आगे मामला नहीं जा पाता। कई बार तो यथार्थ का आदर्शीकरण होने लगता है। आज पूंजीवाद का जो यथार्थ है उसका किसी भी तरह का आदर्शीकरण मानवता विरोधी हो जाता है, लेखक या कलाकार चाहे या न चाहे। 
    
आज से करीब अस्सी साल पहले टामस मान ने हिटलर के जर्मनी का चित्रण करने के लिए अपना उपन्यास ‘डा. फाउस्ट’ लिखा था जिसमें एक ‘इविल जीनियस’ संगीतकार मुख्य पात्र था। इसमें भी एक वृहत्तर रूपक था। फाउस्ट और मेफिस्टोफिलीस की पुरानी कथा को जर्मन राष्ट्र द्वारा सर्वोच्च शिखर हासिल करने की आकांक्षा के साथ इसमें पिरोया गया था। बिना हिटलर के जिक्र के इसमें तत्कालीन जर्मन राष्ट्र का चित्रण और समालोचना थी। इसमें भी एक वृहत्तर रूपक था। काश कि विनोद कुमार शुक्ल कोई ऐसा उपन्यास लिख पाते जिसमें मोदी कालीन भारत का कुछ वैसा ही चित्र उभरता जैसा टामस मान के ‘डा. फाउस्ट’ में उभरता है। 

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