हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है

Published
Sun, 02/01/2026 - 07:00
/har-jor-julm-ki-takkar-mein-struggle-hamaaraa-naaraa-hai

12 फरवरी : आम हड़ताल

रस्मी आयोजन काफी नहीं, जुझारू अनवरत् संघर्ष जरूरी

12 फरवरी को पूरे देश के मजदूर एक बार फिर आम हड़ताल पर होंगे। ये आम हड़ताल केन्द्र सरकार द्वारा थोपी गयी 4 मजदूर विरोधी श्रम संहिताओं के विरोध में केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशनों द्वारा आहूत की गयी है। इन श्रम संहिताओं को रद्द करने के अलावा ढेरों अन्य मजदूर हित की मांगें भी इस हड़ताल में उठायी गयी हैं। मजदूरों के संघर्षों से हासिल तमाम अधिकारों को छीनने वाली इन श्रम संहिताओं को रद्द कराने के लिए जरूरी है कि न केवल इस हड़ताल को सफल बनाया जाये बल्कि पूंजी के इस हमले के खिलाफ मजदूरों के जुझारू अनवरत संघर्ष - अनिश्चितकालीन राजनैतिक हड़ताल की तरफ बढ़ा जाये। 
    
मोदी सरकार के इस हमले ने दिखा दिया कि फासीवादी हमले केवल अल्पसंख्यकों-दलितों- महिलाओं-आदिवासियों पर ही नहीं बोले जा रहे हैं। बल्कि ये इनसे कहीं बढ़कर मजदूर वर्ग पर भी बोले जायेंगे। मजदूर वर्ग पर बोले गये इस फासीवादी हमले ने पूंजीपतियों को ‘रखो और निकालो’ की खुली छूट दे दी है। स्थायी रोजगार का अधिकार खत्म सा कर दिया है। यूनियन बनाना, हड़ताल करना कठिन बना दिया है। काम के घण्टे 12 तक बढ़ाने की छूट दे दी है। महिला मजदूरों से रात की पाली में काम कराने की छूट दे उनकी असुरक्षा को और बढ़ा दिया है। 
    
ऐसे में मजदूर वर्ग को इस फासीवादी हमले का मुंहतोड़ जवाब देने की जरूरत है। सत्तासीन एकाधिकारी पूंजी-संघ के गठजोड़ को चुनौती देने की जरूरत है। यह चुनौती केवल मजदूर वर्ग के नेतृत्व में ही दी जा सकती है। मजदूर वर्ग न केवल भारत का सबसे बड़ा वर्ग है बल्कि इतिहास का सबसे क्रांतिकारी वर्ग है। देश के करोड़ों-करोड़ मजदूर अपने ऊपर बोले गये इस हमले का माकूल जवाब दे सकते हैं। पर इस माकूल जवाब के लिए जरूरी है कि देश का मजदूर वर्ग अपनी क्रांतिकारी एकजुटता कायम करे और संघर्ष के मैदान में उतरे। आज मजदूरों की देशव्यापी वर्गीय एकजुटता में रोड़ा खुद मजदूर वर्ग के नेतृत्व पर काबिज केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशन हैं। तरह-तरह के पूंजीवादी-सुधारवादी तत्वों वाला यह नेतृत्व न तो मजदूरों की संघर्ष क्षमता पर भरोसा करता है और न ही मजदूर वर्ग के ऐतिहासिक मिशन (पूंजीवादी व्यवस्था का खात्मा और समाजवाद-साम्यवाद की ओर बढ़ना) पर मजदूरों को लामबंद करता है। यह अधिक से अधिक कुछ सुधारों की कुछ आर्थिक रस्मी आयोजन काफी नहीं, जुझारू अनवरत् संघर्ष जरूरी

लड़ाईयां लड़कर, साल में एक-दो दिन की रस्मी हड़ताल कर मजदूरों के आक्रोश को पूंजीवादी व्यवस्था के दायरे में ही जाया करता रहता है। यह वास्तविक संघर्ष से कन्नी काटता है और केवल अपना आधार बचाने के लिए ही कुछ संघर्ष करता है। 
    
भाकपा-माकपा-भाकपा (माले) सरीखे सुधारवादी दलों व कांग्रेस तथा अन्य पूंजीवादी दलों से जुड़ी ये केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशनें आज संघर्ष का माद्दा खो चुकी हैं। इनके रस्मी संघर्ष से शासक देशी-विदेशी पूंजीपति वर्ग बखूबी परिचित है। इसीलिए ये ताकतें आज पूंजी के हमलों को रोकने में एकदम विफल हैं। ऐसे में जरूरी है कि मजदूर वर्ग के भीतर से नया क्रांतिकारी नेतृत्व उभर कर सामने आये। अपने ऐतिहासिक मिशन पर खड़े मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी एकजुटता व संघर्ष ही फासीवादी ताकतों के हर हमले का मुंहतोड़ जवाब दे सकता है। 
    
आज पूंजी के हर हमले, फासीवाद के हर हमले का जवाब मजदूरों का क्रांतिकारी संघर्ष ही दे सकता है। एक ऐसा संघर्ष जिसके निशाने पर केवल मजदूर विरोधी 4 श्रम संहितायें ही न हो बल्कि फासीवादी ताकतें और पूंजीवादी व्यवस्था भी उसके निशाने पर हो। जो समाजवादी क्रांति के जरिये पूंजीपति वर्ग का तख्ता उलटने का लक्ष्य लिये हो। केवल ऐसा संघर्ष ही पूंजीपति वर्ग व हिन्दू फासीवादियों को पीछे धकेल सकता है। 
    
आज जब मजदूर वर्ग देशव्यापी पैमाने पर एकजुट नहीं है। पतित नेतृत्व के चंगुल में फंसा हुआ है। तब जरूरी है कि मजदूर वर्ग को सुधारवाद-कानूनवाद के दलदल से बाहर निकाला जाये। उसे उसके क्रांतिकारी मिशन से परिचित कराया जाये। उसमें संघर्ष का जज्बा पैदा किया जाये। उसे उसकी ताकत से परिचित कराया जाये। और यह सब करते हुए मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी एकजुटता कायम की जाये। ऐसी एकजुटता के आगे पूंजीवादी-सुधारवादी नेतृत्व किनारे लग जायेगा या लगा दिया जायेगा। 
    
आज जरूरत है कि 12 फरवरी की आम हड़ताल को रस्मी संघर्ष की जगह वास्तविक संघर्ष में बदल दिया जाये। केन्द्रीय फेडरेशनें आम हड़तालों में निजी क्षेत्र के मजदूरों को नहीं उतारना चाहतीं। ऐसे में सरकारी-निजी, संगठित-असंगठित क्षेत्र के सभी मजदूरों को 12 फरवरी को सड़कों पर उतारा जाये ताकि मोदी सरकार के होश फाख्ता हो जायें। 12 फरवरी की हड़ताल को संघर्षों के नये दौर की शुरूआत बना दिया जाये। 
    
आज फासीवादी हुकूमत मजदूरों को गुलामों में तब्दील करा देना चाहती है। वह चाहती है कि मजदूर पूंजी का मुनाफा कमाने वाले बेजुबान जानवर बन जायें। ऐसे में जरूरी है कि मोदी सरकार-अम्बानी-अडाणी सरीखे पूंजीपतियों को बता दिया जाये कि मजदूर न केवल जुबान रखते हैं बल्कि लुटेरों के लूट के साम्राज्य को भी ध्वस्त करने की ताकत रखते हैं। एक बार फिर यह नारा हकीकत में उतारने की जरूरत है- मजदूर जब भी जागा है इतिहास में करवट बदली है। 

आलेख

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा। 

/ameriki-iimperialism-ka-trade-war-cause-&-ressult

लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?

/iran-par-mandarate-yuddha-ke-badal

इस तरह पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा बना हुआ है। यह खतरा ईरान के लिए प्रत्यक्ष है और यह दूर की बात नहीं है। इस अमरीकी आक्रमणकारी युद्ध के क्षेत्रीय और वैश्विक आयाम हैं। क्षेत्रीय ताकतों के अपने-अपने आपसी अंतरविरोध हैं

/prashant-bhushan-ka-afsos-and-left-liberal-ka-political-divaliyapan

गत 26 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहली पुण्यतिथि थी। सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने इस अवसर पर एक ट्वीट कि