‘वन्दे मातरम्’ और भाजपा का साम्प्रदायिक एजेण्डा

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केन्द्र की संघी भाजपा सरकार ने 7 नवम्बर, 2025 से अगले एक साल तक बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा रचित गीत ‘वन्दे मातरम्’ की रचना के 150 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में कार्यक्रम किये जाने की घोषणा की है। इसकी शुरूआत नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में विधिवत की। भाजपा सरकार के अनुसार, इन कार्यक्रमों के माध्यम से वर्तमान पीढ़ी को इस गीत के इतिहास और आजादी के आन्दोलन में इसके महत्व के बारे में बताया व शिक्षित किया जायेगा। सच्चाई यह है कि भाजपा सरकार इस गीत के माध्यम से अपने मुस्लिम विरोधी संघी एजेण्डे को साधना चाहती है, जिसके प्रमाण 7 नवम्बर के मोदी के वक्तव्य में ही मिल जाते हैं।
    
पहली बात तो यह कि इस बात के कोई पुख्ता सबूत नहीं मिलते हैं कि ‘वन्दे मातरम्’ गीत ठीक 7 नवम्बर, 1875 को ही लिखा गया, जैसा कि दावा किया जा रहा है। इस तारीख को चुन लिया गया है बस। ताकि इसके इस्तेमाल को एक ऐतिहासिक औचित्य मिल जाये। ‘वन्दे मातरम्’ गीत के इतिहास पर पर्याप्त अध्ययन करने के उपरान्त इतिहासकार सब्यसाची भट्टाचार्य ने अपनी एक पुस्तिका लिखी है- ‘वन्दे मातरम्- द बायोग्राफी आफ अ सान्ग’। इस पुस्तिका में वह कोई निश्चित तारीख या वर्ष नहीं बताते हैं। उनके अनुसार यह गीत 19वीं सदी के आठवें दशक में कभी लिखा गया था। इतना जरूर है कि यह गीत 1872 के बाद कभी लिखा गया होगा, क्योंकि इस गीत के मूल संस्करण में उस समय की बंगाल की जनसंख्या का जिक्र आता है। भारत में पहली बार विधिवत् जनगणना 1872 में हुई थी। भटट्ाचार्य बताते हैं कि यह गीत प्रकाशन के लिए नहीं लिखा गया था। बाद में बंकिमचन्द्र चटर्जी के एक मित्र के अनुरोध पर उन्होंने इसको 1882 में पुस्तक रूप में प्रकाशित अपने उपन्यास ‘आनन्दमठ’ में सम्मिलित कर लिया। ‘बंगदर्शन’ नामक उनके पत्र में प्रकाशित (1881-82) इसके धारावाहिक संस्करण में यह गीत सम्मिलित नहीं था।
    
इस गीत के व्यापक प्रचलित होने और बाद में विवादों में घिर जाने का एक लम्बा इतिहास है। अपने प्रकाशन के लम्बे समय तक यह गीत बंगाल के साहित्यकारों-बुद्धिजीवियों की विचारगोष्ठियों के बीच में ही कभी-कभार गाया जाता था। किसी बड़े आयोजन में पहली बार यह गीत 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता सेशन में रविन्द्रनाथ टैगोर द्वारा गाया गया। इसकी धुन भी उनके द्वारा ही बनायी गयी थी। ‘वन्दे मातरम्’ गीत को व्यापक लोकप्रियता, खासकर बंगाल के अन्दर, 1905 में प्रारम्भ हुए ‘बंग-भंग आन्दोलन’ में मिली। इस आन्दोलन में दो गीत विशेष लोकप्रिय थे- पहला, ‘वन्दे मातरम्’ और दूसरा, टैगोर द्वारा रचित ‘आमार सोनार बांग्ला’। दूसरे गीत की चर्चा शायद ही भाजपा सरकार या संघी कभी करें, क्योंकि आज की तारीख में यह बांग्लादेश का राष्ट्र गान है, और इनकी साम्प्रदायिक राजनीति के लिए फिट नहीं बैठता है। सच्चाई यह है कि दोनों ही गीत इस आन्दोलन में व्यापक प्रचलित थे और दोनों की ही भौगोलिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि तत्कालीन बंगाल था- आज के बांग्लादेश, बिहार और ओडिशा समेत।
    
‘वन्दे मातरम्’ निसंदेह ही देशभक्ति के भाव से लिखा गया गीत है और आजादी के आन्दोलन में देशभक्तों को प्रेरित करने वाला गीत रहा है। लेकिन इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि इस गीत की रचना में इसके लेखक की सोच-समझ और इसके रचनाकाल के समय के अलंकारिक प्रतिबिम्ब एकदम स्पष्ट हैं। इस पृष्ठभूमि को ध्यान में रखे बिना इस गीत से जुड़े विवाद पर कोई भी चर्चा गलत दिशा में ही ले जायेगी।
    
बंकिमचन्द्र चटर्जी पर अपने समय के ‘हिन्दू पुनर्जागरण’ का पर्याप्त प्रभाव था। बंकिमचन्द्र अपनी सामाजिक-राजनीतिक समझ में उस धारा को अभिव्यक्त करते थे, जो एक तरफ अंग्रेजों की गुलामी से दुखी थे तो दूसरी तरफ हिन्दू धर्म की अधोपतन की तत्कालीन अवस्था से। किन्तु यह अधोपतन उनकी दृष्टि में हिन्दू धर्म की अपनी कुरीतियों के कारण से नहीं थी। जैसा कि बंगाल पुनर्जागरण के प्रारम्भिक प्रस्तोता (राजा राममोहन राय, केशवचन्द्र सेन, देवेन्द्रनाथ ठाकुर, आदि) मानते थे। बल्कि यह इसका कारण मध्ययुग में मुस्लिम शासकों और उसके बाद अंग्रेजों को मानते थे। इस प्रकार वे बंगाल में राधाकान्त देब या बंगाल के बाहर आर्य समाज आदि के विचारों से ज्यादा साम्य रखते थे। आर्य समाज से उनकी साम्यता मूर्ति पूजा के प्रश्न पर भले न हो, किन्तु मुस्लिम-ईसाई विरोध के मामले जरूर थी। 1770 के सन्यासी विद्रोह को आधार बनाकर लिखे गए उनके उपन्यास ‘आनन्दमठ’ में उनके यह विचार स्पष्ट दिखाई देते हैं। ‘वन्दे मातरम्’ गीत में भी वह भारतवर्ष की कल्पना देवी के ही रूप में ही करते हैं। उसके रूप सौन्दर्य, समृद्धि, शक्ति का सम्पूर्ण वर्णन एक प्रार्थना के रूप में है और बाद के चरणों में भारतमाता की तुलना सीधे ही दुर्गा व लक्ष्मी से कर दी गई है। मूर्ति पूजा के भाव इस गीत में एकदम स्पष्ट हैं, जिससे कोई इंकार नहीं कर सकता। इस अर्थ में यह गीत कहीं से कहीं तक पंथनिरेपक्षता के विचार के अनुकूल नहीं है, भले ही आजादी के आन्दोलन में इस गीत की प्रेरणादायी भूमिका रही है।
    
भारत के आजादी के आन्दोलन में राष्ट्रीयता और धर्म का घालमेल बहुत ज्यादा रहा है। इस वजह से धर्मनिरेपक्षता का पक्ष बेहद कमजोर रहा। जिसका खामियाजा आजादी के आन्दोलन के आगे-पीछे निरन्तर चलने वाले साम्प्रदायिक दंगों, हिन्दू महासभा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मुस्लिम लीग और अंततः देश के साम्प्रदायिक विभाजन के रूप में हमने देखा। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में धर्म एक महत्वपूर्ण प्रश्न था ही। 19 वीं सदी के उत्तरार्ध में प्रारम्भ हुए आन्दोलनों में धार्मिक सुधारवादियों के साथ-साथ हिन्दू पुनरुत्थानवाद से प्रभावित लोग भी आजादी के आन्दोलन के अगुवा बने। बालगंगाधर तिलक ने गणेश चतुर्थी और शिवाजी उत्सव का राजनीतिकरण कर आजादी के आन्दोलन को मजबूत करने की रणनीति अपनाई। लाला लाजपतराय आजादी के आन्दोलन को लगातार मजबूती देने के साथ-साथ, हिन्दू महासभा के कार्यक्रमों के प्रमुख आयोजकों और भागीदारों में होते थे। आर्य समाज के हिन्दू पुनरुत्थानवाद में उनकी पूर्ण आस्था थी। बीसवीं सदी के पहले दो दशकों के राष्ट्रवादी क्रांतिकारी (जुगान्तर व अनुशीलन समिति, आदि के लोग) भी धार्मिक प्रतीकों मसलन काली मां की पूजा, रक्त अर्पण और पवित्र नदियों में स्नान आदि के आयोजन किया करते थे। बाद के समय में भी देश की सबसे प्रमुख पार्टी कांग्रेस भी हिन्दू मानसिकता से अच्छी-खासी ग्रस्त थी। नेहरू के नेतृत्व में एक छोटा सा ही समूह था जो धर्मनिरपेक्षता का किसी हद तक पालन करता दिखाई देता है। अन्यथा तो महात्मा गांधी साम्प्रदायिक न होते हुए भी स्वयं को गौरवान्वित हिन्दू मानते थे। गोविन्द बल्लभ पंत, राजगोपालाचारी, के. एम. मुंशी, राजेन्द्र प्रसाद, पटेल आदि की हिन्दू-मुस्लिम के प्रश्न पर बहुत से मामलों में हिन्दू महासभा के विचारों से साम्यता थी। कुल मिलाकर, भारत में आजादी का आन्दोलन कभी भी धर्मनिरपेक्षता-पंथनिरपेक्षता के एजेण्डे को व्यापक रूप से ग्रहण और स्थापित नहीं कर पाया। इसका खामियाजा तब भी देश ने भुगता और आज भी हमारा देश इस नुकसान को भुगत रहा है।
    
आजादी के आन्दोलन की उपरोक्त पृष्ठभूमि में ही ‘वन्दे मातरम्’ गीत दोहरे रूप में प्रयुक्त होता रहा, खासकर बीसवीं सदी के चौथे दशक से जब हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक राजनीति ने अपना पूर्ण विकसित स्वरूप ग्रहण कर लिया। हालांकि 1905 के बंग-भंग आन्दोलन के दौरान भी ‘वन्दे मातरम्’ गीत से जुड़े विवाद सामने आने लगे थे। इसी आन्दोलन के दौरान बारिसाल क्षेत्र (वर्तमान बांग्लादेश में) की एक घटना है, जिसमें मस्जिद के आगे से आन्दोलनकारियों का एक समूह नारे लगाते हुए निकल रहा था, जिसका विरोध मुस्लिम समुदाय द्वारा किया गया, क्योंकि वह नमाज का समय था। विरोध के जवाब में आन्दोलनकारी मस्जिद के ही आगे खड़े होकर जोर-जोर से ‘वन्दे मातरम्’ गाने लगे और दूसरी तरफ से भी धार्मिक नारे लगाये जाने लगे। ब्रिटिश अधिकारियों को इस घटना की शिकायत की गई। ब्रिटिश अधिकारियों ने अपनी जांच रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया कि ‘वन्दे मातरम्’ का प्रयोग बहुत जगह पर आन्दोलनकारियों ने साम्प्रदायिक उकसावे के लिए किया था। लेकिन अभी तक यह गीत विवाद का कोई इतना बड़ा मुद्दा नहीं बना था।
    
बाद के समय में भी ‘वन्दे मातरम्’ गीत का प्रयोग राष्ट्रवादी आयोजनों व कांग्रेस के आयोजनों में होता रहा। महात्मा गांधी ने भी 1915 में अपने एक वक्तव्य में इस गीत को समर्थन प्रदान किया, जब उन्होंने बोला कि इस गीत को सुनकर वे रोमान्चित हो जाते हैं। जैसे-जैसे यह गीत प्रचलित होता गया, वैसे-वैसे मुस्लिमों की इस गीत से असहजता और बढ़ती गई। गौरतलब है कि मुस्लिम धर्म में मूर्ति पूजा वर्जनीय है और इस्लाम विरुद्ध है। राष्ट्रवादी आन्दोलनों-आयोजनों में मुस्लिम भागीदारी करते रहे, किन्तु वे ‘वन्दे मातरम्’ गीत से असहज बने रहे। दूसरी तरफ साम्प्रदायिक हिन्दू तत्व ‘वन्दे मातरम्’ गीत को मुस्लिमों की देशभक्ति की परीक्षा का एक हथियार बनाने पर जोर देने लगे। इसने एक बेमतलब के विवाद को जन्म देना शुरू कर दिया, जो कि कोई विवाद ही नहीं बन पाता अगर पंथनिरपेक्षता के पहलू से आजादी का आन्दोलन एक मजबूत जमीन पर खड़ा रहा होता।
    
‘वन्दे मातरम्’ को लेकर विवाद 1937 के साल और ज्यादा गहरा गया। 1937 में चुनाव के बाद प्रान्तीय असेम्बलियों का गठन हुआ था। इन प्रान्तीय असेम्बलियों में पहली बार किसी हद तक सत्ता में भारतीयों को भागीदारी मिली थी। असेम्बलियों की बैठकों के आयोजन के समय किसी प्रकार के राष्ट्रीय गीत की आवश्यकता महसूस हुई तो अपनी लोकप्रियता की वजह से ‘वन्दे मातरम्’ का ही गायन होता था। एक बार फिर से सदनों के मुस्लिम सदस्यों ने इस पर अपनी आपत्तियां दर्ज कराना शुरू कर दिया। मुस्लिम लीग और उनके नेता मुहम्मद अली जिन्ना ने ‘वन्दे मातरम्’ के माध्यम से कांग्रेस द्वारा मुस्लिमों पर अपने हिन्दू बहुसंख्यकवाद को थोपने का आरोप लगाया। मुस्लिमों के बीच में इसे प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया गया कि यदि पाकिस्तान के रूप में मुस्लिमों को अलग राष्ट्र नहीं मिला तो किस प्रकार से हिन्दू बहुसंख्यकवादी अपनी मनमर्जी मुस्लिमों पर चलायेंगे। अंततः कांग्रेस पार्टी ने ‘वन्दे मातरम्’ के प्रश्न पर नेहरू के नेतृत्व में एक कमेटी का गठन किया, जिसको इस गीत के सार्वजनिक प्रयोग के प्रश्न पर निर्णय लेना था। नेहरू इस गीत की ऐतिहासिक भूमिका, धर्मनिरपेक्षता की कसौटी पर इसकी सीमाओं और आधुनिक युग की आवश्यताओं का हवाला देते हुए इस गीत और इससे जुड़े विवादों से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति पा सकते थे, किन्तु उन्होंने बीच-बचाव का रास्ता अपनाया। उनके नेतृत्व वाली कमेटी ने सुझाव दिया कि गीत के छः में से पहले दो चरणों का प्रयोग करते हुए बाकी के हिस्से को छोड़ देना चाहिए, जिसमें मूर्तिपूजक-दैवीय प्रतीक स्पष्ट रूप से प्रयोग हुए हैं। यहीं से हमें ‘वन्दे मातरम्’ गीत का वह स्वरूप प्राप्त हुआ, जिसे हम आज जानते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने इसी घटना का जिक्र करते हुए 7 नवम्बर के अपने भाषण में यह कहा कि नेहरू ने अपनी साम्प्रदायिक सोच के चलते ‘वन्दे मातरम्’ को खंडित कर दिया। यहां नेहरू के ऊपर साम्प्रदायिकता के आरोप से मोदी का मतलब नेहरू के हिन्दू विरोधी व मुस्लिमपरस्त होने से है। विडम्बना देखिये, जिस आरोप से नेहरू 1937 में बचना चाहते थे, ‘वन्दे मातरम्’ गीत को किसी न किसी रूप में स्वीकार कर लेने से, उस आरोप से अंततः वह नहीं बच सके। इसलिए यह बार-बार कहा जाता है कि वैचारिक-राजनैतिक क्षेत्र में साम्प्रदायिक फासीवाद का मुकाबला बीच-बचाव के किसी रास्ते द्वारा नहीं किया जा सकता है।
    
1937 की गलती को 1950 में एक बार फिर से दोहराया गया जब ‘जन-गण-मन’ को राष्ट्रगान निर्धारित करने के साथ-साथ ‘वन्दे मातरम्’ को राष्ट्रगीत की मान्यता प्रदान कर दी गई। हालांकि राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम्’ के बारे में वैसे मानक और परम्परा निर्धारित नहीं की गई, जैसी कि राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ के बारे में की गई। यानी सार्वजनिक आयोजनों में जिस प्रकार राष्ट्रगान को गाने की बाध्यता और नियम निर्धारित हैं, वैसे राष्ट्रगीत के मामले में नहीं हैं, इसे लोगों और आयोजकों की स्वेच्छा पर छोड़ दिया गया।
    
आजादी के बाद से ‘वन्दे मातरम्’ को लेकर होने वाला विवाद किसी हद तक पृष्ठभूमि में चला गया था। इसकी प्रमुख वजह तो यह रही कि मुस्लिम लीग जिसने इस मामले को सबसे ज्यादा मुद्दा बनाया था, पाकिस्तान बनने के बाद वह भारत में कोई विशेष शक्ति नहीं रह गई। दूसरा आजादी के बाद लम्बे समय तक केन्द्र व राज्यों में कांग्रेस की सरकारें रहीं, जिन्होंने ‘वन्दे मातरम्’ के गायन पर कोई विशेष जोर-जबर्दस्ती नहीं रखी। सरकारी-अर्द्ध सरकारी स्कूलों में भी ‘वन्दे मातरम्’ के गायन को कांग्रेस सरकारों ने उस तरह से प्रचलित नहीं किया जिस तरह से राष्ट्रगान को। 
    
इतना समय गुजर जाने के बावजूद भी ‘वन्दे मातरम्’ का मुद्दा और उससे जुड़े विवाद को भाजपा व संघ ने कभी नहीं छोड़ा। भाजपा या संघ द्वारा लम्बे समय से यह झूठ प्रचारित किया जाता रहा है कि ‘जन-गण-मन’ तो रविन्द्रनाथ टैगोर ने जार्ज पंचम की स्तुति और स्वागत में लिखा और गाया था। इस माध्यम से वे राष्ट्रगान को बदनाम करते रहे हैं। भाजपा व संघ के कार्यक्रमों में राष्ट्रगान नहीं गाया जाता रहा है। भाजपा ने हमेशा ही ‘वन्दे मातरम्’ को ‘जन-गण-मन’ से ऊपर रखा है। संघ के आनुषांगिक संगठन ‘विद्या भारती’ द्वारा संचालित स्कूलों में हमेशा ही (राष्ट्रीय दिवसों के आयोजनों को छोड़कर) ‘वन्दे मातरम्’ को ही तरजीह दी जाती रही है। सुबह की प्रार्थना और छुट्टी के समय यही गाया जाता रहा है। 1998 में जब केन्द्र में वाजपेयी सरकार थी और उत्तर प्रदेश में राजनाथ सरकार; उस समय उ.प्र. सरकार ने ‘वन्दे मातरम्’ को सरकारी स्कूलों में आवश्यक रूप से गाये जाने को एक शासनादेश निकाला था जिसके विरोध में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपनी शिकायत दर्ज करवाई थी। जब प्रधानमंत्री वाजपेयी के लखनऊ आगमन पर उनसे इस सम्बन्ध में सवाल पूछा गया तो उन्होंने इससे अपनी जानकारी न होने की बात कहकर उ.प्र. सरकार को अपना इशारा दे दिया था। जिसके बाद राज्य सरकार ने चुपके से पीछे के दरवाजे से उस शासनादेश को ठण्डे बस्ते में डाल दिया।
    
आज की मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार कहीं ज्यादा ताकतवर है। उसके सामने वह मजबूरियां नहीं हैं जो वाजपेयी सरकार के सामने थीं। इसलिए वह अपने सारे साम्प्रदायिक एजेण्डों को खुलकर सामने रखती है। ‘वन्दे मातरम्’ के माध्यम से वह एक बार फिर अपनी साम्प्रदायिक राजनीति को ही आगे बढ़ाना चाहती है। भाजपा और संघ जानते हैं कि अपने धार्मिक बिम्बों और प्रस्तुतिकरण के कारण ‘वन्दे मातरम्’ गीत को किसी भी तरह का बढ़ावा मुस्लिमों के बीच असहजता पैदा करेगा। यह असहजता पैदा करना ही भाजपा का संघी एजेण्डा भी है। वह इस गीत के माध्यम से मुस्लिमों को चिढ़ाना चाहते हैं। और यदि मुस्लिमों की तरफ से कोई भी विरोध या प्रतिकार के स्वर आयेंगे तो यह लोग तुरन्त ही उनको इस माध्यम से राष्ट्रविरोधी साबित करने में लग जायेंगे। यही भाजपा और संघ का एजेण्डा है।
    
इसमें कोई शक नहीं कि ‘वन्दे मातरम्’ गीत ने देश की आजादी के आन्दोलन में आन्दोलनकारियों को प्रेरित करने में एक भूमिका निभाई है। किन्तु हमें यहां ध्यान देना होगा कि ‘प्रेरणा’ एक सापेक्षिक भाव है। इस भाव की अलग-अलग परिस्थितियां और वैचारिक पृष्ठभूमि होती है। यह जरूरी नहीं है कि किसी व्यक्ति, समूह या देश के आगे बढ़ने के लिए जो प्रेरणा एक समय पर रही हो, वही अगले सौ साल बाद भी हो। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि आज हम किन्हीं राष्ट्रीय आन्दोलनों के दौर में नहीं हैं। प्रत्यक्ष उपनिवेशवाद के दौर के समाप्त हो जाने के बाद से राष्ट्रवाद और उसके अधिकांश प्रतीक दरअसल अंधराष्ट्रवादी माहौल बनाने के लिए ही प्रयोग किए जाते रहे हैं और आज भी हो रहे हैं। आज हम अंतर्राष्ट्रीयतावादी चरित्र वाली मजदूर क्रांतियों के दौर में जी रहे हैं। इस कारण से आजादी के आन्दोलन में प्रयुक्त प्रतीक इतिहास की वस्तु बन चुके हैं। यह अब हमारे आन्दोलनों और संघर्षों के प्रतीक नहीं बन सकते हैं। किन्तु भाजपा और संघ प्रतिगामी ताकतें हैं, वे देश को प्रगति की ओर नहीं बल्कि पीछे की ओर ले जाना चाहते हैं। इसलिए वे पुराने विवादों को बार-बार हवा देकर अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं।
 

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